भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1712

[ 20/266-270 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीमद्भागवत (1/3/1)में— जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभिः । सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया ॥ 266 ॥ अनुवाद—भगवान्ने लोकसृष्टि करनेकी इच्छासे महत्तत्त्वादिके साथ और सोलह कलायुक्त 'पुरुष' कहलाने वाले रूपको धारण किया ॥ 266 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/84 देखें ॥ 266 ॥ श्रीमद्भागवत (2/6/42)में— आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य कालः स्वभावः सदसन्मनश्च । द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि विराट् स्वराट् स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः ॥ 267 ॥ अनुवाद—कारणाब्धिशायी पुरुष ही भगवान्के आदि अवतार हैं। काल, स्वभाव, कार्य-कारणरूप प्रकृति, मनादि महत्तत्त्व, महाभूतादि अहङ्कार, सत्त्वादि गुण, इन्द्रियसमूह, विराट्, स्वराट्, स्थावर और जङ्गम प्राणी, सभी उनके विभूतिरूप हैं ॥ 267 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/83 संख्या देखें ॥ 267 ॥ (1) अपने वैकुण्ठमें शेष-शय्यापर कारणार्णव अथवा विरजाशायी-प्रकृतिके अन्तर्यामी ब्रह्माण्ड-कारण-स्रष्टा :— सेइ पुरुष विरजाते करेन शयन। 'कारणाब्धिशायी' नाम—जगतकारण ॥ 268 ॥ विरजा अथवा कारणाब्धिके एक ओर तुरीय परव्योम अथवा चिद्-वैभव वैकुण्ठ, दूसरी ओर मायाविलास अथवा अचिद्-वैभव प्राकृत देवीधाम :— कारणाब्धि-पारे मायार नित्य अवस्थिति। विरजार पारे परव्योमे नाहि गति ॥ 269 ॥ अनुवाद—वे पुरुष अर्थात् सङ्कर्षण (अप्राकृत और प्राकृत जगत्के मध्य) विरजा-नदीमें (कारण-समुद्रमें) शयन करते हैं। उनका नाम ही 'कारणाब्धिशायी' है और वे भौतिक जगत्की सृष्टिके मूल कारण हैं। कारण-समुद्रके एक ओर मायाकी नित्य स्थिति है। विरजा अर्थात् कारण-समुद्रके दूसरी ओर स्थित परव्योममें मायाका प्रवेश नहीं है ॥ 268-269 ॥ वैकुण्ठका माहात्म्य :— श्रीमद्भागवत (2/9/10)में— प्रवर्त्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वञ्च मिश्रं न च कालविक्रमः । न यत्र माया किमुतापरे हरे- रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ 270 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 270 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उस वैकुण्ठमें रज-तमः अथवा उनके साथ मिश्रसत्त्व अथवा कालका प्रभाव नहीं है और वहाँ माया तक भी नहीं है, औरोंकी तो बात ही क्या ? देवताओं और दैत्योंके द्वारा अर्चित एवं श्रीकृष्णके प्रति पूर्ण समर्पित पार्षद-भक्तगण वहाँ वास करते हैं ॥ 270 ॥ अनुभाष्य—'शुद्ध जीवात्माका किस प्रकार देहसे सम्बन्ध होता है?'—राजा परीक्षितके इस प्रश्नके उत्तरमें श्रीशुकदेवने उनको भगवान्के द्वारा ब्रह्माको चतुःश्लोकीमें कहे गये तत्त्वज्ञानके उपदेशके प्रसङ्गको बतलानेसे पहले सृष्टिके प्रारम्भमें भगवद्-दर्शनके लिये ब्रह्माकी दिव्य एक हजार वर्षों तककी तपस्याके फलसे भगवान्ने ब्रह्माको जिस वैकुण्ठधामका दर्शन कराया था, उस वैकुण्ठका वर्णन कर रहे हैं,— यत्र (वैकुण्ठे) रजः, तमः, तयोः मिश्रं (ताभ्यां युक्तं) सत्त्वं च [न प्रवर्त्तते, परन्तु विशुद्धमेव सत्त्वं प्रवर्त्तते], कालविक्रमः (नाशः च न प्रवर्त्तते), यत्र (वैकुण्ठे), माया न प्रवर्त्तते (नास्ति), अपरे (मायासम्बन्धिनः राग-लोभादयः) न [सन्ति इति] किमुत (किं वक्तव्यम् ?) यत्र (वैकुण्ठे) सुरासुरार्चिताः (देव-दैत्यैः सर्वैः अपि पूजिताः) हरेः अनुव्रताः (पार्षदाः) [वर्त्तन्ते]। श्लोक-भावानुवाद—वैकुण्ठमें रज-तमः और दोनोंसे मिश्रित सत्त्वगुण भी नहीं है, परन्तु वहाँ विशुद्ध-सत्त्व ही सदा विराजमान है। वहाँ कालका भी कोई विक्रम 266 |