भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1713

बीसवाँ अध्याय 20/270-275 ] नहीं है अर्थात् किसी भी वस्तुका नाश नहीं होता। वैकुण्ठमें जब मायाका भी प्रवेश नहीं है, तब मायासम्बन्धी राग-लोभादिके प्रवेशके विषयमें क्या कहें? वैकुण्ठमें देवताओं-दैत्यों सभीके पूजित श्रीकृष्णके पार्षद वास करते हैं॥ 270 ॥ मायाकी दो रूपोंमें दो प्रकारकी वृत्ति-(क) माया अथवा प्रकृति और (ख) प्रधानका कार्य :- मायार ये दुइ वृत्ति—'माया' आर 'प्रधान'। 'माया' निमित्तहेतु, 'प्रधान' विश्वेर उपादान॥ 271 ॥ अनुवाद—मायाकी दो प्रकारकी वृत्ति है—एक 'माया' और दूसरी 'प्रधान'। माया जगत्का निमित्त-कारण और 'प्रधान' विश्वका उपादान है॥ 271 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/58 संख्या देखें॥ 271 ॥ प्रकृतिके प्रति कारणोदशायीका ईक्षण :- सेइ पुरुष माया-पाने करे अवधान। प्रकृति क्षोभित करि' करे वीर्येर आधान॥ 272 ॥ स्वयं शुद्ध होनेपर भी अशुद्धकी भाँति प्रतीत; सङ्कल्पमात्रसे ही प्रकृति-स्पर्श और प्रकृतिकी योनिमें लोमकूपोंमें रहनेवाले अनन्त चित्परमाणु जीवशक्तिको स्थापित करना :- स्वाङ्ग-विशेषाभासरूपे प्रकृति-स्पर्शन। जीव-रूप 'बीज' ताते कैला समर्पण॥ 273 ॥ अनुवाद—वे पुरुष (कारणब्धिशायी) मायाके प्रति दृष्टिपात करके उसे क्षोभित कर देते हैं और फिर उसमें वीर्यको (जीवरूपी बीजको) स्थापित करते हैं। कारणब्धिशायी मायाको साक्षात् स्पर्श नहीं करते हैं, अपितु अपने विशेष अङ्ग नेत्रोंके आभासके द्वारा (ईक्षणके द्वारा) ही प्रकृतिका स्पर्श करते हैं। इस प्रकार वे क्षुब्ध प्रकृतिमें अपने विभिन्नांश जीवरूपी 'बीज'को स्थापित करते हैं॥ 272-273 ॥ अनुभाष्य—ब्रह्मसंहितामें पाँचवें अध्यायके 10-13 श्लोक देखें॥ 272-273 ॥ जीव और उसके भोगोंके सत्ताइस तत्त्वोंकी उत्पत्तिका इतिहास; प्रकृतिका आदि परिणाम और विश्वाङ्कुर चित्तरूपी 'महत्तत्त्व'की उत्पत्तिका कारण :- श्रीमद्भागवत (3/26/19)में— दैवात् क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ परः पुमान्। आधत्त वीर्यं साऽसूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम्॥ 274 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 274 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वे श्रेष्ठ पुरुष अनादिकालसे अपनी त्रिगुणमयी मायाके तीनों गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न करके प्रकृतिमें जीवोंको स्थापित करते हैं। तब माया हिरण्मय महत्तत्त्वको जन्म देती है॥ 274 ॥ अनुभाष्य—देवहूतिके द्वारा पुरुष और प्रकृतिके लक्षणोंकी जिज्ञासा करनेपर भगवान् कपिलदेवने उनको महदादि अट्ठाईस-तत्त्वोंका वर्णन करके उनके अधीश्वर-तत्त्व पुरुषावतार भगवान् और उनसे जीवोंके प्रकट होनेका वर्णन कर रहे हैं— दैवात् (कालात्) क्षुभितधर्मिण्यां (क्षुभिताः धर्माः गुणाः यस्यां तस्यां) [स्वकीयायां] योनौ (अभिव्यक्तिस्थाने प्रकृतौ) परः पुमान् (परमपुरुषः भगवान् कारणार्णवशायी) वीर्यं (जीवशक्तिम्) आधत्त (आहितवान्); सा (प्रकृतिः) हिरण्मयं (प्रकाशबहुलं) महत्तत्त्वम् असूत। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 274 ॥ जीवशक्तिके प्रकट होनेका इतिहास :- श्रीमद्भागवत (3/5/26)में— कालवृत्त्या तु मायायां गुणमयामधोक्षजः। पुरुषेणात्मभूतेन वीर्यमाधत्त वीर्यवान्॥ 275 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कालवृत्तिके द्वारा (अर्थात् समय आनेपर) गुणमयी (क्षुभिता) मायामें वीर्यवान् (चिद्- शक्तिमान्) अधोक्षजके (महावैकुण्ठनाथके) आत्मांशस्वरूप पुरुष अर्थात् प्रकृतिके अधिष्ठाता आदि-पुरुषके (कारणाब्धिशायीके) द्वारा वीर्य (चित्परमाणुपुञ्ज जीवशक्ति)को स्थापित किया गया था॥ 275 ॥ । 267