श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1714, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/275-280 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—महात्मा विदुरके द्वारा श्रीमैया ऋषिसे श्रीहरिके पुरुषावतार-लीला-कथाकी जिज्ञासा करनेपर श्रीमैया ऋषि पुरुषावतारकी मायाके द्वारा विश्वकी सृष्टि करनेका वर्णन करनेके बाद उनसे जीवसर्गके उत्पन्न होनेका वर्णन कर रहे हैं,— वीर्यवान् (चिच्छक्तिमान्) अधोक्षजः (अतीन्द्रियः महावैकुण्ठनाथः भगवान्) आत्मभूतेन (स्वांशेन) पुरुषेण (प्रकृत्यधिष्ठातृरूपेण कारणब्धिशायिना) कालवृत्त्या (निमित्तभूतया कालशक्तया) गुणमयां (क्षुभितगुणायां) मायायां वीर्यं (चिदाभास-जीवाख्य- शक्तिम्) आधत्त (आदधौ)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 275 ॥ ब्रह्माण्डके उपादान-समूह—महत्तत्त्वसे ‘तीन-अहङ्कार’ :— तबे महत्तत्त्व हैते त्रिविध अहङ्कार। याहा हैते देवतेन्द्रियभूतेर प्रचार॥ 276 ॥ अनुवाद-प्रकृतिकी परिणतिसे प्रथम-तत्त्व महत्तत्त्व उत्पन्न होता है। फिर महत्तत्त्वसे तीन प्रकारके अहङ्कारोंकी उत्पत्ति होती है। पुनः इन्हीं अहङ्कारोंसे देवता, इन्द्रियाँ और पञ्चभूत प्रकाशित होते हैं॥ 276 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘त्रिविध अहङ्कार'–वैकारिक, तैजस और तामस॥ 276 ॥ अनुभाष्य-चित्स्वरूपमें महत्तत्त्वका अवस्थान है, जिसके अधिष्ठातृदेव-वासुदेव हैं (भाः 3/26/21); महत्तत्त्वके विकारसे (1) वैकारिक अर्थात् सात्त्विक अहङ्कार उत्पन्न होता है, उससे ग्यारहवीं इन्द्रिय अर्थात् मन उत्पन्न होता है, जिसके अधिष्ठातृदेव-अनिरुद्ध हैं (भाः 3/26/27-28); (2) तैजस अर्थात् राजस अहङ्कारसे 'बुद्धि' (जिसके अधिष्ठातृदेव-प्रद्युम्न) हैं एवं इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं (भाः 3/26/30-31); (3) तामस अहङ्कारसे शब्द-तन्मात्रा और उससे आकाश तथा श्रवणेन्द्रिय आदिकी उत्पत्ति होती है (भाः 3/26/32); इन तीन प्रकारके अहङ्कारोंके अधिष्ठातृदेव-सङ्कर्षण हैं (भाः 3/26/25)। सांख्यकारिकामें— “सात्त्विक एकादशकः प्रवर्त्तते वैकृतादहङ्कारात्-भूतादेस्तन्मात्रं तामसस्तैजसादुभयम्।” [अर्थात् “वैकारिक अहङ्कारसे सात्त्विक अहङ्कार-रूप ग्यारह इन्द्रियाँ प्रकाशित होती हैं; तैजस अहङ्कारसे भूतादिकी तन्मात्राएँ और तामस अहङ्कार, दोनों ही प्रकाशित होते हैं॥ 276 ॥ अट्ठाईस तत्त्वोंसे युक्त अनन्त ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि :— सर्वतत्त्व मिलि' सृजिल ब्रह्माण्डेर गण। अनन्त ब्रह्माण्ड, तार नाहिक गणन॥ 277 ॥ अनुवाद-सभी तत्त्वोंको मिलाकर भगवान्ने ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि की। इन ब्रह्माण्डोंकी संख्या अनन्त है, उनकी गिनती नहीं की जा सकती॥ 277 ॥ ये ही महत्तत्त्वकी सृष्टि करनेवाले महाविष्णु; इनके लोमकूपोंमें ही अनन्त चित्परमाणु-जीव :— इँहो महत्तस्रष्टा पुरुष—'महाविष्णु' नाम। अनन्त ब्रह्माण्ड ताँर लोमकूपे धाम॥ 278 ॥ अनुवाद-ये महत्तत्त्वके (समस्त मायाशक्तिके) सृष्टा प्रथम पुरुषावतार हैं, इनका नाम 'महाविष्णु' है। अनन्त ब्रह्माण्ड उनके रोमकूपोंमें वास करते हैं॥ 278 ॥ अनुभाष्य—महत्तत्त्वके सृष्टिकर्त्ता आदिपुरुषावतारका नाम 'महाविष्णु' है। महाविष्णुके रोमकूपोंमें अनन्त ब्रह्माण्ड आश्रित हैं॥ 278 ॥ उनके श्वास छोड़नेसे ब्रह्माण्डोंकी ‘सृष्टि’, सांस भीतर लेनेसे ‘प्रलय' :— गवाक्षे उड़िया यैछे रेणु आसे याय। पुरुष-निश्वास-सह ब्रह्माण्ड बाहिराय॥ 279 ॥ पुनरपि निश्वास-सह याय अभ्यन्तर। अनन्त ऐश्वर्य ताँर, सब—माया-पार॥ 280 ॥ अनुवाद-जिस प्रकार झरोखेमेंसे उड़कर धूलिकण आते-जाते हैं, उसी प्रकार महाविष्णुके श्वास छोड़नेके साथ ब्रह्माण्ड बाहर निकलते हैं और पुनः उनके श्वास भीतर लेनेके साथ भीतर चले जाते हैं। महाविष्णुका ऐश्वर्य अनन्त है और यह सब मायातीत है॥ 279-280 ॥ 268 ।