श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1715, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/281-289 ] ब्रह्मसंहिता (5/48)में— यस्यैक-निश्श्वसितकालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः। विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ 281 ॥ अनुवाद—ब्रह्माण्डनाथ अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु-महेश, जिनके रोमकूपोंसे जन्म ग्रहण करते हैं और उनके निःश्वास-काल तक अवस्थित रहते हैं, वे महाविष्णु जिनकी कला हैं, उन आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥ 281 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/71 संख्या देखें॥ 281 ॥ समस्त जीवशक्ति और प्रकृतिके कारणरूपमें वे ही अनन्तकोटि धामोंके मूलकर्त्ता :- समस्त ब्रह्माण्डगणेर इँहो अन्तर्यामी। कारणार्ब्धिशायी—सब जगतेर स्वामी ॥ 282 ॥ अनुवाद—महाविष्णु ही समस्त ब्रह्माण्डोंके अन्तर्यामी हैं। कारणसमुद्रमें शयन करनेवाले वे ही समस्त जगत्के स्वामी हैं॥ 282 ॥ (2) प्रद्युम्नरूपी द्वितीय-पुरुषावतार गर्भोदशायीका वर्णन :— एइत कहिलुँ प्रथम पुरुषेर तत्त्व। द्वितीय पुरुषेर एबे शुनह महत्त्व ॥ 283 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने प्रथम पुरुष महाविष्णुके तत्त्वका वर्णन किया। अब तुम द्वितीय पुरुषकी महिमाको श्रवण करो॥ 283 ॥ कारणोदशायी ही ब्रह्माण्डोंमें स्थित गर्भोदशायी :- सेइ पुरुष अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड सृजिया। एकैक-मूर्त्ये प्रवेशिला बहुमूर्ति हञा ॥ 284 ॥ प्रवेश करिया देखे सब—अन्धकार। रहिते नाहिक स्थान, करिला विचार ॥ 285 ॥ अनुवाद—असंख्य ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करके प्रथम पुरुष महाविष्णुने अनेक रूप धारण किये और एक-एक रूपमें (गर्भोदशायी रूपमें) समस्त ब्रह्माण्डोंमें प्रवेश किया। समस्त ब्रह्माण्डोंमें प्रवेश करके उन्होंने देखा कि वहाँ तो सब ओर अन्धकार है और रहनेका कोई स्थान नहीं है। तब वे विचार करने लगे॥ 284-285 ॥ गर्भसमुद्र-प्राकट्य, वहाँ वैकुण्ठमें शेषशय्यापर शयन :- निजाङ्ग-स्वेदजले ब्रह्माण्डार्द्ध भरिल। सेइ जले शेषशय्याय शयन करिल ॥ 286 ॥ अनुवाद—तब उन गर्भोदशायीने अपने पसीनेके जलसे ब्रह्माण्डके आधे भागको भर दिया। फिर उस जलमें वे शेष-शय्यापर लेट गये॥ 286 ॥ अन्तर्यामी गर्भोदशायीसे ही गुणावतारोंका प्राकट्य,- (क) जगत्स्रष्टा ब्रह्माकी उत्पत्ति :— ताँर नाभिद्म हैते उठिल एक पद्म। सेइ पद्मे हइल ब्रह्मार जन्म-सद्म ॥ 287 ॥ सेइ पद्मनाले हइल चौद्दभुवन। तेंहो 'ब्रह्मा' हञा सृष्टि करिला सृजन ॥ 288 ॥ अनुवाद—उन गर्भोदशायीके नाभिकमलसे एक कमल उत्पन्न हुआ और वह कमल ही ब्रह्माका जन्मस्थान बना। उसी कमलकी नालमें ही चौदह भुवन उत्पन्न हुए। तब उन गर्भोदशायीने ही 'ब्रह्मा' बनकर सृष्टिकी रचना की॥ 287-288 ॥ अनुभाष्य— 'सद्म'—गृह, निकेतन, आवास ॥ 287 ॥ (ख) जगत्पालक विष्णुका प्राकट्य; वे सत्त्वके अधिष्ठातृ देवता होनेपर भी स्वयं गुणमायासे अतीत :- 'विष्णु'-रूप हञा करे जगत् पालने। गुणातीत विष्णु—स्पर्श नाहि माया-सने ॥ 289 ॥ अनुवाद—वे द्वितीय पुरुष ही विष्णुरूप होकर प्राकृत जगत्का पालन करते हैं। विष्णु मायाके गुणोंसे । 269