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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

बीसवाँ अध्याय 20/281-289 ] ब्रह्मसंहिता (5/48)में— यस्यैक-निश्श्वसितकालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः। विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ 281 ॥ अनुवाद—ब्रह्माण्डनाथ अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु-महेश, जिनके रोमकूपोंसे जन्म ग्रहण करते हैं और उनके निःश्वास-काल तक अवस्थित रहते हैं, वे महाविष्णु जिनकी कला हैं, उन आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥ 281 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/71 संख्या देखें॥ 281 ॥ समस्त जीवशक्ति और प्रकृतिके कारणरूपमें वे ही अनन्तकोटि धामोंके मूलकर्त्ता :- समस्त ब्रह्माण्डगणेर इँहो अन्तर्यामी। कारणार्ब्धिशायी—सब जगतेर स्वामी ॥ 282 ॥ अनुवाद—महाविष्णु ही समस्त ब्रह्माण्डोंके अन्तर्यामी हैं। कारणसमुद्रमें शयन करनेवाले वे ही समस्त जगत्के स्वामी हैं॥ 282 ॥ (2) प्रद्युम्नरूपी द्वितीय-पुरुषावतार गर्भोदशायीका वर्णन :— एइत कहिलुँ प्रथम पुरुषेर तत्त्व। द्वितीय पुरुषेर एबे शुनह महत्त्व ॥ 283 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने प्रथम पुरुष महाविष्णुके तत्त्वका वर्णन किया। अब तुम द्वितीय पुरुषकी महिमाको श्रवण करो॥ 283 ॥ कारणोदशायी ही ब्रह्माण्डोंमें स्थित गर्भोदशायी :- सेइ पुरुष अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड सृजिया। एकैक-मूर्त्ये प्रवेशिला बहुमूर्ति हञा ॥ 284 ॥ प्रवेश करिया देखे सब—अन्धकार। रहिते नाहिक स्थान, करिला विचार ॥ 285 ॥ अनुवाद—असंख्य ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करके प्रथम पुरुष महाविष्णुने अनेक रूप धारण किये और एक-एक रूपमें (गर्भोदशायी रूपमें) समस्त ब्रह्माण्डोंमें प्रवेश किया। समस्त ब्रह्माण्डोंमें प्रवेश करके उन्होंने देखा कि वहाँ तो सब ओर अन्धकार है और रहनेका कोई स्थान नहीं है। तब वे विचार करने लगे॥ 284-285 ॥ गर्भसमुद्र-प्राकट्य, वहाँ वैकुण्ठमें शेषशय्यापर शयन :- निजाङ्ग-स्वेदजले ब्रह्माण्डार्द्ध भरिल। सेइ जले शेषशय्याय शयन करिल ॥ 286 ॥ अनुवाद—तब उन गर्भोदशायीने अपने पसीनेके जलसे ब्रह्माण्डके आधे भागको भर दिया। फिर उस जलमें वे शेष-शय्यापर लेट गये॥ 286 ॥ अन्तर्यामी गर्भोदशायीसे ही गुणावतारोंका प्राकट्य,- (क) जगत्स्रष्टा ब्रह्माकी उत्पत्ति :— ताँर नाभिद्म हैते उठिल एक पद्म। सेइ पद्मे हइल ब्रह्मार जन्म-सद्म ॥ 287 ॥ सेइ पद्मनाले हइल चौद्दभुवन। तेंहो 'ब्रह्मा' हञा सृष्टि करिला सृजन ॥ 288 ॥ अनुवाद—उन गर्भोदशायीके नाभिकमलसे एक कमल उत्पन्न हुआ और वह कमल ही ब्रह्माका जन्मस्थान बना। उसी कमलकी नालमें ही चौदह भुवन उत्पन्न हुए। तब उन गर्भोदशायीने ही 'ब्रह्मा' बनकर सृष्टिकी रचना की॥ 287-288 ॥ अनुभाष्य— 'सद्म'—गृह, निकेतन, आवास ॥ 287 ॥ (ख) जगत्पालक विष्णुका प्राकट्य; वे सत्त्वके अधिष्ठातृ देवता होनेपर भी स्वयं गुणमायासे अतीत :- 'विष्णु'-रूप हञा करे जगत् पालने। गुणातीत विष्णु—स्पर्श नाहि माया-सने ॥ 289 ॥ अनुवाद—वे द्वितीय पुरुष ही विष्णुरूप होकर प्राकृत जगत्का पालन करते हैं। विष्णु मायाके गुणोंसे । 269

[ 20/289-297 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला परे हैं, इसलिये माया उन्हें स्पर्श भी नहीं कर सकती ॥ 289 ॥ अनुभाष्य-ब्रह्मा और शिवकी भाँति विष्णुमाया विष्णुको आवृत्त नहीं कर सकती। विष्णु गुणातीत वस्तु हैं, इसलिये मायिक गुण उन्हें स्पर्श करनेमें समर्थ नहीं हैं। गुणावतार ब्रह्मा और शिव-मायाके अधीन हैं, किन्तु विष्णु उनके जैसे नहीं हैं; क्योंकि "मायाधीश- मायावश ईश्वरे-जीवे भेद।" अर्थात् मायाधीश ईश्वर और मायावश्य जीवमें भेद है ॥ 289 ॥ (ग) जगत्संहारक रुद्रकी उत्पत्ति :- 'रुद्र'-रूप धरि' करे जगत् संहार। सृष्टि, स्थिति, प्रलय हय इच्छाय याँहार ॥ 290 ॥ अनुवाद-वे द्वितीय पुरुष ही रुद्रका रूप धारण करके जगत्‌का संहार करते हैं। सृष्टि, स्थिति और प्रलय-ये तीनों ही उन द्वितीय पुरुषकी इच्छाके अनुसार होते हैं ॥ 290 ॥ तीन गुणावतारोंमें तीन प्रकारके अधिकार-भाव देना :- ब्रह्मा, विष्णु, शिव-ताँर गुण-अवतार। सृष्टि-स्थिति-प्रलयेर तिनेर अधिकार ॥ 291 ॥ अनुवाद-ब्रह्मा, विष्णु और शिव-ये तीनों द्वितीय पुरुषके गुणावतार हैं। सृष्टि, स्थिति और प्रलयपर क्रमशः इन तीनोंका अधिकार है ॥ 291 ॥ हिरण्यगर्भ अथवा समस्त जीवोंके अन्तर्यामी ये गर्भोदशायी ही ऋक्सूक्तके द्वारा स्तवनीय :- हिरण्यगर्भ-अन्तर्यामी-गर्भोदकशायी। 'सहस्रशीर्षादि' करि' वेदे याँरे गाइ ॥ 292 ॥ अनुवाद-गर्भोदकशायी विष्णु इस ब्रह्माण्डमें हिरण्यगर्भके नामसे कहे जाते हैं और वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके अन्तर्यामी हैं। वेद उनको 'सहस्रशीर्ष आदि' कहकर उनकी स्तुति करते हैं ॥ 292 ॥ अनुभाष्य-ऋक्सूक्त-“सहस्रशीर्ष पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्” [अर्थात् “उन पुरुषके हजारों सिर, नेत्र, चरणादि हैं।"] ॥ 292 ॥ वे भी स्वयं मायाधीश तत्त्व :- एइ त' द्वितीय-पुरुष-ब्रह्माण्डर ईश्वर। माय़ार 'आश्रय' हय, तबु माया-पार ॥ 293 ॥ अनुवाद-ये द्वितीय पुरुष गर्भोदकशायी ही ब्रह्माण्डके ईश्वर हैं। यद्यपि ये मायाके आश्रय हैं, तथापि ये मायाके स्पर्शसे परे हैं ॥ 293 ॥ (3) अनिरुद्धरूपी तृतीय-पुरुषावतार क्षीरोदशायी अथवा गुणावतार विष्णु :- तृतीय-पुरुष विष्णु-'गुण-अवतार'। दुइ अवतार-भितर गणना ताँहार ॥ 294 ॥ अनुवाद-विष्णुके तृतीय पुरुषावतार क्षीरोदकशायी विष्णु हैं। ये जगत् पालनके लिये सत्त्वगुणके नियामकके रूपमें भी अवतीर्ण होते हैं, इसलिये इन्हें गुणावतार भी कहते हैं। इस प्रकार क्षीरोदकशायी विष्णु पुरुषावतार और गुणावतार-इन दोनों अवतारोंमें गिने जाते हैं ॥ 294 ॥ वे ही सभी भूतोंमें अवस्थित अर्थात् विराट अथवा व्यष्टिजीवोंके अन्तर्यामी और पालक :- विराट् व्यष्टि-जीवेर तेंहो अन्तर्यामी। क्षीरोदकशायी, तेंहो-पालनकर्त्ता, स्वामी ॥ 295 ॥ अनुवाद-क्षीरोदकशायी ही भगवान्‌के विराट रूपमें हैं और सभी जीवोंके अन्तर्यामी हैं। वे सभी जीवोंका पालन करनेवाले जगत्‌के स्वामी हैं ॥ 295 ॥ (ख) लीलावतार-वर्णन :- पुरुषावतारेर एइ कैलुँ निरूपण। लीलावतार एबे शुन, सनातन ॥ 296 ॥ अनुवाद-हे सनातन, अब तक मैंने पुरुषावतारोंका निरूपण किया है। अब तुम लीलावतारोंके विषयमें सुनो ॥ 296 ॥ असंख्य लीलावतारोंमें पच्चीस मूर्तियाँ ही मुख्य :- लीलावतार कृष्णेर ना याय गणन। प्रधान करिया कहि दिग्‌दरशन ॥ 297 ॥ 270 |

बीसवाँ अध्याय 20/297-303 ] मत्स्य, कूर्म, रघुनाथ, नृसिंह, वामन। वराहादि—लेखा याँर ना याय गणन ॥ 298 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके लीलावतारोंकी गणना नहीं की जा सकती। उनमेंसे प्रधान-प्रधानके विषयमें कहकर उनका दिग्दर्शन मात्र करूँगा। मत्स्य, कूर्म, रघुनाथ, नृसिंह, वामन, वराहादि अनेक लीलावतार हैं, जिनकी गणना नहीं की जा सकती ॥ 297-298 ॥ शास्त्र प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (10/2/40)में— मत्स्याश्व-कच्छप-नृसिंह-वराह-हंस- राजन्यविप्रविबुधेषु कृतावतारः। त्वं पासि नस्त्रिभुवनञ्च तथाधुनेश भारं भुवो हर यदुत्तम वन्दनं ते ॥ 299 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 299 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आप मत्स्य, हयग्रीव, कच्छप, नृसिंह, वराह, हंस, दाशरथि (राम), परशुराम, वामनादि रूपोंमें विविध अवतार लेकर हम लोगोंकी और तीनों लोकोंका पालन करते हैं; हे यदुत्तम ! हम आपकी वन्दना करते हैं। हे ईश्वर ! अब इस पृथ्वीका भार हरण कीजिये ॥ 299 ॥ अनुभाष्य—देवताओं सहित ब्रह्मा असुरोंके संहारके लिये कंसके कारागारमें स्थित देवकीके गर्भमें विराजमान भगवान् श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं,— हे ईश, त्वं मत्स्याश्वकच्छपवराहनृसिंह-हंसराजन्यविप्रविबुधेषु (मत्स्य-हयग्रीव-कूर्म-वराह-नृसिंह-हंस-दाशरथि-परशुराम-वामनादिषु) [कलारूपेण] कृतावतारः सन् (रूपाणि प्रकाश्य अवतारान् प्रकटयन्, अवतीर्णः सन्) नः (अस्मान् देवान्) त्रिभुवनं (भूर्भुवःस्वरिति स्वर्गमर्त्यपातालान् वा लोकत्रयान्) च (अन्यदा यथा) पासि (रक्षयसि), तथा अधुना [अपि] भुवः (पृथिव्याः) भारम् (अधर्म) हर (नाशय, अस्मान् पाहीत्यर्थः); (अतः) हे यदुत्तम, (यदुकुलश्रेष्ठ,) ते (तुभ्यं) वन्दनं [कूर्मः इति वयं सर्वे त्वां शिरोभिः प्रणमामः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 299 ॥ (ग) तीन गुणावतारोंका वर्णन :- लीलावतारेर कैलुँ दिग्दर्शन। गुणावतारेर एबे शुन विवरण ॥ 300 ॥ अनुवाद—मैंने लीलावतारोंका दिग्दर्शन किया है। अब तुम गुणावतारोंका विवरण सुनो ॥ 300 ॥ तीनजन-तीन कार्योंको करनेवाले :- ब्रह्मा, विष्णु, शिव,—तिन गुण-अवतार। त्रिगुण अङ्गीकरि' करे सृष्ट्यादि-व्यवहार ॥ 301 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 301 ॥ अनुभाष्य—रजः, सत्त्व और तमोगुण—इन तीन गुणोंको अङ्गीकार करके अर्थात् स्वीकार करके जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलयादि कार्यके उद्देश्यसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव,—ये तीन गुणावतार हैं ॥ 301 ॥ (1) रजोगुणमें ब्रह्मा,—कभी तो महत्तम जीवका वैराज-ब्रह्मा होना, कभी तो उस भावमें गर्भोदकशायीका ही हिरण्यगर्भ-ब्रह्मा होना :- भक्तिमिश्रकृतपुण्ये कोन जीवोत्तम। रजोगुणे विभावित करि' ताँर मन ॥ 302 ॥ गर्भोदकशायीद्वारा शक्ति सञ्चारि'। व्यष्टि सृष्टि करे कृष्ण ब्रह्मा-रूप धरि' ॥ 303 ॥ अनुवाद—भक्तिमिश्रित-पुण्यके फलसे किसी उत्तम जीवका मन रजोगुणसे विभावित होता है, तब उस भक्तमें गर्भोदकशायी विष्णु अपनी शक्ति सञ्चार करते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णके एक अवतार ब्रह्मा होकर व्यष्टि सृष्टि करते हैं ॥ 302-303 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वे गर्भोदकशायी पुरुषावतार विष्णु-सत्त्व, रजः और तमोगुणका आश्रय करके विष्णु, ब्रह्मा और शिव—ये तीन गुणावतार प्रकाशित करते हैं। उनमेंसे किसी उत्तम जीवको भक्तिमिश्रित-पुण्यके फलसे रजोगुणमें विभावित करके और उसमें अपनी शक्ति सञ्चार करके 'ब्रह्मरूप'में व्यष्टि-सृष्टि करते हैं ॥ 302-303 ॥ । 271

[ 20/304-308 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ब्रह्मसंहिता (5/49)में :- भास्वान् यथाश्मशकलेषु निजेषु तेजः स्वीयं कियत् प्रकटयत्यपि तद्वदत्र। ब्रह्मा य एष जगदण्डविधानकर्त्ता गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 304 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 304॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सूर्य जिस प्रकार भिन्न-भिन्न पत्थरोंमें (सूर्यकान्त-मणियोंमें) अपने तेजको कुछ परिमाणमें प्रकट करते हैं, उसी प्रकार जो आदिपुरुष गोविन्द किसी जीवमें अपनी शक्ति स्थापित करके 'ब्रह्मा' होकर जगत्की व्यष्टि-सृष्टिका विधान करते हैं, उनका मैं भजन करता हूँ॥ 304॥ अनुभाष्य— यथा भास्वान् (सूर्यः) निजेषु (नित्य-स्वीयत्वेन विख्यातेषु) अश्मशकलेषु अपि (सूर्यकान्ताख्येषु) स्वीयं कियत्तेजः (किञ्चित् प्रभावं) प्रकटयति, तद्वत् यः एषः पुरुषः (गर्भोदशायी) अत्र (ब्रह्माण्डे) ब्रह्मा (सन्) जगदण्डविधानकर्त्ता (ब्रह्माण्डस्य व्यष्टिसृष्टिकर्त्ता,) तं आदिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 304॥ कोन कल्पे यदि योग्य जीव नाहि पाय। आपने ईश्वर तबे अंशे 'ब्रह्मा' हय॥ 305 ॥ अनुवाद—किसी कल्पमें यदि कोई ऐसा योग्य जीव नहीं मिलता, तब गर्भोदशायी विष्णु स्वयं अपने अंशसे 'ब्रह्मा' बन जाते हैं॥ 305॥ अनुभाष्य—'कल्प'—ब्रह्माकी आयुका काल अर्थात् ब्रह्माकी सौ वर्षकी स्थितिका काल। ब्रह्माके एक दिनमें अर्थात् हजार चतुर्युगोंमें 432 करोड़ सौरवर्षोंमें मनुष्यका एक 'कल्प' अर्थात् ब्रह्मदिन होता है। वैसे 360 दिनोंमें एक ब्रह्मवर्ष होता है, वैसे सौ वर्ष ही ब्रह्माकी आयुका काल है॥ 305॥ श्रीमद्भागवत (10/68/37)में :- यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजोऽखिललोकपालै- र्मौल्युत्तमैर्धृतमुपासित-तीर्थतीर्थम्। ब्रह्मा भवोऽहमपि यस्य कलाः कलायाः श्रीश्चोद्वहेम चिरमस्य नृपासनं क्व॥ 306 ॥ अनुवाद—(श्रीबलदेव प्रभुने कहा)—सभी लोकपाल समस्त तीर्थोंकी तीर्थस्वरूप जिन कृष्णकी चरणधूलिको अपने मस्तकपर धारण करते हैं और ब्रह्मा, शिव, मैं बलदेव एवं लक्ष्मी—हम कोई उनके अंश अथवा अंशके अंशरूपमें जिनकी चरणधूलिको चिरकालसे धारण कर रहे हैं, उनके लिये साधारण राजसिंहासनका क्या महत्व है?॥ 306॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/141 संख्या देखें॥ 306॥ (2) तमोगुणमें रुद्र; मायासाङ्गिरूपमें गर्भोदशायीका ही रुद्र बनना :- निजांश-कलाय कृष्ण तमो-गुण अङ्गीकारे। संहारार्थे माया-सङ्गे रुद्र-रूप धरे॥ 307 ॥ श्रीकृष्णके स्वांशरूपमें वस्तुतः अभिन्नांश ईश्वर-कोटि होनेपर भी रुद्र—मायासाङ्गके विकारसे जगत्के संहारकके रूपमें विभिन्नांश जीव :- मायासाङ्ग-विकारे रुद्र-भिन्नाभिन्न रूप। जीवतत्त्व-हय, नहे कृष्णेर 'स्वरूप'॥ 308 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 307-308॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्ण अपने अंशकी कलासे तमोगुण अङ्गीकार करके संहार करनेके उद्देश्यसे मायाके सङ्गमें 'रुद्र'रूप धारण करते हैं। मायासङ्गके विकारसे रुद्र-भेदाभेद प्रकाशरूप तत्त्व हैं; इसलिये वे जीवतत्त्वमें गिने जाते हैं, वे श्रीकृष्णके 'स्वरूप' नहीं हैं॥ 307-308॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण अपने सङ्कर्षणरूपके अंश कारणार्णवशायीकी कला गर्भोदकशायी महाविष्णु बनकर तमोगुणको ग्रहण करके जगत्के संहारके लिये गुणावतार 272 |

बीसवाँ अध्याय 20/307-311 ] रुद्ररूपको धारण करते हैं। विष्णुमें सत्त्वगुणका अधिष्ठान स्वीकृत होनेपर भी उनकी मायाकी अधीनता सम्भवपर नहीं है। जहाँ विष्णुत्वका अभाव है, वहाँ शिवत्व अथवा ब्रह्मत्व है; उनमें मायाका संयोग है। शिवत्व और ब्रह्मत्व-विष्णुमायाके वशीभूत हैं॥ 307 ॥ रुद्रके भेदाभेद-प्रकाश होनेकी उपमा- दूध और दहीका दृष्टान्त :- दुग्ध येन अम्लयोगे दधिरूप धरे। दुग्धान्तर वस्तु नहे, दुग्ध हैते नारे ॥ 309 ॥ अनुवाद-दूध जैसे अम्लके संयोगसे दही बन जाता है और दही दूधसे पृथक् स्वतन्त्र वस्तु नहीं है, परन्तु दही दूध भी नहीं है अर्थात् दूधके स्थानपर उसका प्रयोग नहीं किया जा सकता॥ 309 ॥ अनुभाष्य- 'रुद्र' - विष्णुके साथ भेदाभेदतत्त्व हैं; मायाके सङ्गसे विकार प्राप्त करनेसे विष्णुसे 'भिन्न' हैं और स्वयं वस्तुतः विष्णुके साथ अभिन्न हैं। 'विष्णु'- विष्णुके साथ कभी भी भिन्न नहीं हैं, किन्तु मायाके वशके कारण शिव और ब्रह्मादि-विष्णुसे भिन्न हैं। विष्णु कभी भी विकारी नहीं है। जहाँ ईश्वरत्वमें मायिक विकार दिखलायी देता है, वहाँ विष्णुसे भिन्नरूप-गुणावतार कहलानेवाले शिव अथवा ब्रह्मा हैं। इसलिये रुद्र विकारयुक्त भेदाभेदप्रकाश जीवतत्त्व हैं, वे स्वरूपतः श्रीकृष्णस्वरूप विष्णुत्तत्त्व नहीं, परन्तु वैष्णवतत्त्व हैं। ईश्वररूपी दूध मायारूपी अम्लके संयोगसे दूधकी अवस्थासे दूधके विकार दहीके रूपमें परिवर्तित होनेपर यह दही दूधसे उत्पन्न होनेपर भी उसे कभी भी दूध नहीं कहा जा सकता॥ 308-309 ॥ ब्रह्मसंहिता (5/45) में :- क्षीरं यथा दधि विकारविशेषयोगात् संजायते न तु ततः पृथगस्ति हेतोः। यः शम्भुतामपि तथा समुपैति कार्याद्- गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ 310 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 310 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विशेष विकारके (अम्लके) संयोगसे दूध जिस प्रकार दही बन जाता है, विकारके अतिरिक्त उसमें और कोई कारण नहीं है, उसी प्रकार जो आदिपुरुष गोविन्द कार्यवशतः शम्भुता ग्रहण करते हैं, मैं उनका भजन करता हूँ॥ 310 ॥ अनुभाष्य- क्षीरं (दुग्धं) यथा विकारविशेषयोगात् (अम्लसंयोगेन) दधि संजायते (दधिरूपेण परिणमते), ततः हेतोः (क्षीरात् अपि तु) न पृथक् (भिन्नम्) अस्ति; तथा कार्यात् (प्राकृत-विश्वसंहारार्थं गुणमायासाङ्गज-विकारात्) यः पुरुषः (गर्भोदकशायी विष्णुः) शम्भुतां (रुद्रत्वम्) अपि समुपैति (गृह्णाति) तम् आदिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजे। श्लोक-भावानुवाद-दूध जिस प्रकार अम्लके संयोगसे दही बन जाता है, तथापि दही दूधसे भिन्न भी नहीं है, उसी प्रकार प्राकृत विश्वके संहारके लिये मायाके सङ्गरूप विकारके द्वारा जो गर्भोदकशायी विष्णु शम्भुता (रुद्रत्व) ग्रहण करते हैं, मैं उन आदिपुरुष गोविन्दका भजन करता हूँ॥ 310 ॥ रुद्र और विष्णुमें भेद :- 'शिव'-मायाशक्तिसङ्गी, तमोगुणावेश । मायातीत, गुणातीत 'विष्णु'-परमेश ॥ 311 ॥ अनुवाद-शिव मायाशक्तिके सङ्गी हैं और उनमें तमोगुणका आवेश होता है। किन्तु विष्णु मायातीत और गुणातीत होनेके कारण परमेश्वर हैं॥ 311 ॥ अनुभाष्य- 'भगवान् विष्णु'-त्रिगुणातीत और अपनी मायाके द्वारा कभी भी परास्त न होनेवाले स्वतन्त्र परमेश्वर वस्तु हैं। शिव स्वरूपतः भागवत होनेपर भी त्रिगुणमेंसे एक तमोगुणके अधीश्वर होकर मायासे सम्बन्धयुक्त और मायाशक्तिके सङ्गबलसे उससे जुड़े हुए हैं। भगवान् विष्णुमें मायाका अस्तित्व नहीं है; मायाके अस्तित्वकी अनुभूतिमें ही शिवकी सत्ता है, इसलिये रुद्र विष्णुत्तत्त्व नहीं होकर मायासे घनिष्टरूपसे | 273

[ 20/311-315 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सम्बन्धित विशेष तत्त्व हैं। अपनी भागवत-सत्तानुभूतिमें शिवकी मायापति अथवा मायाभोक्ता माननेवाली बुद्धिके दूर होनेपर ही उनका हरिजन होनेका गुण प्रकट होता है॥ 311 ॥ व्यावहारिक रूपसे रुद्र सदैव गुणमायासे मिलित :- श्रीमद्भागवत (10/88/3, 5)में- शिवः शक्तियुक्तः शश्वत् त्रिलिङ्गो गुणसंवृतः। वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिधा ॥ 312 ॥ विष्णुका गुण-मायासे अतीत और अधोक्षज होना :- हरिर्हि निर्गुणः साक्षात् पुरुषः प्रकृतेः परः। स सर्वदृगुपद्रष्टा तं भजन्निर्गुणो भवेत् ॥ 313 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 312-313 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैकारिक, तैजस और तामस,- इन तीन प्रकारके अहङ्कारोंके द्वारा आच्छादित और सदा मायाशक्तियुक्त तत्त्व ही 'शिव' हैं। 'श्रीहरि'-प्रकृतिसे अतीत साक्षात् निर्गुण पुरुष हैं; वे सभी वस्तुओंको भीतर और बाहरसे देखनेवाले हैं, इसलिये वे सबके साक्षी हैं; उनका भजन करनेसे जीव निर्गुण होता है॥ 312-313 ॥ अनुभाष्य-रुद्र और विष्णुके उपासकोंकी विरुद्ध गतिके विषयमें जिज्ञासा करनेपर परीक्षितके प्रति श्रीशुकदेवकी निम्नलिखित दो उक्तियाँ- शिवः शश्वत् (नित्यं) शक्तियुतः (स्वेच्छा-गृहीतया गुणसाम्यावस्थया मायाशक्त्या समन्वितः) वैकारिकः (सात्त्विकः) तैजसः (राजसः) तामसः च इति अहं (अहङ्कार-तत्त्वं)-त्रिधा (अन्योऽन्योपमर्द्देन तमसबैविध्यात्) त्रिलिङ्गः (गुणत्रयोपाधिविशिष्टः) गुणसंवृतः (प्रकटैश्च सद्भिः तैः गुणैः दूरतः संवृतः तदधिष्ठाता)। हरिः हि (खलु) प्रकृते परः (न तु ब्रह्माशिवादिवत् प्राकृतगुणमिश्रः, अधोक्षजत्वात्) साक्षात् (अनावृतः) निर्गुणः (सङ्कल्पेनैव सत्त्वस्य प्रवर्त्तनात्) पुरुषः (पुरुषोत्तमः); सः (हरिः) सर्वदृक् (सर्वेषां ब्रह्माशिवादीनां दृक् मोक्षहेतुर्ज्ञानं यस्मात् सः, सर्वं पश्यतीति वा, अतः) उपद्रष्टा (सन्निधौ मुक्तान् पश्यति, मुक्तगम्यः, आदिसाक्षी वा अतः) तं (हरिं) भजन् निर्गुणो (स्वरूपस्थः) भवेत्। श्लोक-भावानुवाद-शिव नित्य ही अपनी इच्छासे ग्रहण की गयी गुणसाम्यावस्थावाली मायाशक्तिसे युक्त हैं, वे सात्त्विक, राजस और तामस, इन तीन प्रकारके अहं-तत्त्वोंसे युक्त हैं। यह तमोगुण अन्यान्य गुणोंको दबाते हुए तीन प्रकारका होता है, इस प्रकार शिव त्रिगुण उपाधिसे विशिष्ट हैं और प्रकटरूपमें दिखनेवाले (सद्भिः) इन गुणोंसे दूर रहते हुए उनके अधिष्ठाता हैं (संवृतः)। किन्तु भगवान् श्रीहरि प्रकृतिसे परे हैं (वे शिव-ब्रह्मादिकी भाँति प्राकृत गुणोंसे मिश्रित नहीं होते हैं, क्योंकि वे अधोक्षज हैं)। वे तमोगुणसे आवृत नहीं होनेके कारण साक्षात् हैं तथा सत्त्वगुणका सङ्कल्पमात्रसे प्रवर्तन करनेके कारण निर्गुण भी हैं। वे पुरुषोत्तम (पुरुष) हैं तथा ब्रह्मा-शिवादि सभीको मोक्षरूप ज्ञान देनेके कारण सर्वदृक् हैं अथवा सब कुछ देखनेवाले हैं। अपने निकट मुक्तजनोंके ऊपर भी अनुग्रह करनेके कारण वे मुक्तगम्य अथवा साक्षी हैं, अतः उपद्रष्टा कहलाते हैं। उन हरिका भजन करते हुए साधक (भक्त) निर्गुण (अपने स्वरूपमें स्थित) हो जाता है॥ 312-313 ॥ (3) सत्त्वगुणमें विष्णु गर्भोदशायीके ही विलास, श्रीकृष्णकी कला :- पालनार्थ स्वांश विष्णुरूपे अवतार। सत्त्वगुण दृष्टान्त, ताते गुणमाया-पार ॥ 314 ॥ स्वरूप-ऐश्वर्यपूर्ण, कृष्णसम प्राय। कृष्ण अंशी, तेंहो अंश, वेदे हेन गाय ॥ 315 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 314-315 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-[ब्रह्मा शक्त्यावेश होनेपर भी गुणावतार हैं। रुद्र भेदाभेद होनेपर भी गुणावतार हैं।] किन्तु विष्णु स्वांशरूपमें गुणावतार होनेपर भी उनके 274 |

बीसवाँ अध्याय 20/314-319 ] शुद्धसत्त्वरूपी गुणके दर्शनसे उन्हें मायाके गुणोंके अतीत कहना होगा। विष्णु अंश हैं और श्रीकृष्ण उनके अंशी है, इसलिये श्रीकृष्णके जैसे विष्णु स्वरूप-ऐश्वर्यसे पूर्ण हैं—[वेद इस प्रकार वर्णन करते हैं] ॥ 314-315॥ दीपकका दृष्टान्त :- ब्रह्मसंहिता (5/46)में- दीपार्च्चिरेव हि दशान्तरमभ्युपेत्य दीपायते विवृतहेतुसमानधर्मा। यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभाति गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ 316॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 316॥ अमृतप्रवाह भाष्य-दीपककी किरण जिस प्रकार दूसरे आधारमें पृथक् दीपककी भाँति कार्य करती हैं अर्थात् पहलेवाले दीपककी भाँति समान धर्मसे युक्त होती है, उसी प्रकार जो आदिपुरुष गोविन्द 'विष्णु' होकर प्रकाशित हो रहे हैं, उनका मैं भजन करता हूँ॥ 316॥ अनुभाष्य- [यतः] हि दीपार्च्चिः (प्रदीपशिखा) एव दशान्तरं (महादीपात् क्रमपरम्परया अन्यदीपम्) अभ्युपेत्य विवृतहेतुसमानधर्मा (प्राकट्य-कारण-मूलदीपेन सह समधर्मयुक्तः अर्थात् ज्योतीरूपत्वांशे यथा तेन सह समः) दीपायते (भाति), तादृक् एव यः पुरुषः हि विष्णुतया (गर्भोदशायिनः विलासरूप-क्षीरोदशायित्वेन) च विभाति (दिव्यति) तम् आदिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 316॥ ब्रह्मा और शिव-वश्य-तत्त्व और श्रीकृष्णसे भिन्न-आकृति; विष्णु-ईश-तत्त्व और श्रीकृष्णके समान आकृतिवाले :- ब्रह्मा, शिव-आज्ञाकारी भक्त-अवतार। पालनार्थे विष्णु-कृष्णेर स्वरूप-आकार॥ 317॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 317 ॥ अनुभाष्य-पालनशक्तिसे युक्त विष्णु श्रीकृष्णसे भिन्न वस्तु नहीं हैं; वे श्रीकृष्णस्वरूप ही हैं, परन्तु ब्रह्मा अथवा शिव उनके आज्ञाकारी भक्तावतार दास हैं॥ 317॥ श्रीमद्भागवत (2/6/32)में :- सृजामि तन्नियुक्तोऽहं हरो हरति तद्वशः। विश्वं पुरुषरूपेण परिपाति त्रिशक्तिधृक् ॥ 318॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 318॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ब्रह्माने कहा-हरिके द्वारा नियुक्त होनेपर ही मैं सृष्टि करता हूँ, उनकी आज्ञासे ही शिव नाश करते हैं, (अन्तरङ्गा, बहिरङ्गा और तटस्था) तीन शक्तियोंको धारण करनेवाले वे हरि ही पुरुषरूपमें विश्वका पालन करते हैं॥ 318॥ अनुभाष्य-देवर्षि नारदके द्वारा अपने गुरु ब्रह्मासे उनके भी आराध्य सर्वश्रेष्ठ-तत्त्व परमात्मा श्रीहरिके सम्बन्धमें जाननेकी इच्छा करनेपर, ब्रह्मा उनको भगवान्‌के विश्वरूपका वर्णन करनेके बाद अद्वयज्ञान विष्णुके परमेश्वर होनेका वर्णन कर रहे हैं- अहं (ब्रह्मा) तन्नियुक्तः (तेन प्रयोजितः सन् तस्य हरेः अनुज्ञया विश्वं) सृजामि; हरः (शिवः) तद्वशः (तन्नियुक्तः सन् तस्य हरेरनुज्ञया विश्वं) हरति (विनाशयति); त्रिशक्तिधृक् (त्रिशक्तिः त्रिगुण-मायाशक्तिः, अन्तरङ्गा, बहिरङ्गा, तटस्था- शक्तिः वा, तां धरति यः सः ईश्वरः स्वयंम् एव) पुरुषरूपेण (क्षीरोदशायि-विष्णुरूपेण) परिपाति (पालयति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 318॥ (घ) मन्वन्तरावतार वर्णन :- मन्वन्तरावतार एबे, शुन सनातन। असंख्य गणन ताँर, शुनह कारण॥ 319॥ अनुवाद-हे सनातन, अब मन्वन्तरावतारके विवरणको सुनो। वे असंख्य हैं, कोई उनकी गणना नहीं कर सकता। उनके प्रकट होनेके विषयमें सुनो॥ 319॥ अनुभाष्य-'मन्वन्तरावतार'-आदिलीला 2/97 संख्याका । 275

[ 20/319–328 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य और आदिलीला 3/7-9 संख्याका अनुभाष्य तथा मध्यलीला 20/167 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 319 ॥ मन्वन्तरावतारका काल :- ब्रह्मार एकदिने हय चौद्द मन्वन्तर। ए चौद्द अवतार ताँहा करेन ईश्वर ॥ 320 ॥ अनुवाद-ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मन्वन्तर होते हैं अर्थात् क्रमश: चौदह मनुओंका अधिकार काल होता है। इन चौदह मन्वन्तरोंमें भगवान् चौदह अवतार ग्रहण करते हैं ॥ 320 ॥ संख्या-निर्देश :- चौद्द एक दिने, मासे चारिशत बिश। ब्रह्मार वत्सरे पञ्चसहस्र चल्लिश ॥ 321 ॥ शतेक वत्सर हय 'जीवन' ब्रह्मार। पञ्चलक्ष चारिसहस्र मन्वन्तरावतार ॥ 322 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 321-322 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'मन्वन्तरावतार'-ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मन्वन्तर होते हैं और उनमें चौदह अवतार होते हैं। ब्रह्माके एक मासमें चार सौ बीस और एक वर्ष (तीन सौ साठ दिनों)में पाँच हजार चालीस अवतार तथा ब्रह्माके जीवनमें पाँच लाख चालीस हजार मन्वन्तरावतार होते हैं ॥ 321-322 ॥ कारणाब्धिशायीके सांस छोड़नेसे लेकर सांस भीतर लेने तक ही ब्रह्माका जीवन :- अनन्त ब्रह्माण्डे ऐछे करह गणन। महाविष्णु एकश्वासे ब्रह्मार जीवन ॥ 323 ॥ अनुवाद-यह तो मैंने एक ब्रह्माण्डमें मन्वन्तर अवतारोंकी गणना बतलायी, इसी प्रकार अनन्त ब्रह्माण्डोंमें होनेवाले ऐसे अवतारोंकी गणनाकी कल्पना करो। कारणाब्धिशायी महाविष्णुके एक सांस छोड़नेसे सांस ग्रहण करनेके समय तक ही ये ब्रह्मा और ब्रह्माण्ड रहते हैं ॥ 323 ॥ महाविष्णुर्निश्वासेर नाहिक पर्यन्त। एक मन्वन्तरावतारेर देख लेखा अन्त ॥ 324 ॥ अनुवाद-महाविष्णुके निश्वासोंकी कोई सीमा नहीं है। देखो, मन्वन्तरावतारोंके विषयमें बतलाना ही कितना कठिन है ॥ 324 ॥ चौदह मन्वन्तरावतारोंके नाम :- स्वायम्भुवे 'यज्ञ', स्वारोचिषे 'विभु' नाम। उत्तमे 'सत्यसेन', तामसे 'हरि' अभिधान ॥ 325 ॥ रैवते 'वैकुण्ठ', चाक्षुषे 'अजित', वैवस्वते 'वामन'। सावर्ण्ये 'सार्वभौम', दक्षसावर्ण्ये 'ऋषभ' गणन ॥ 326 ॥ ब्रह्मसावर्ण्ये 'विष्वक्सेन', 'धर्मसेतु' धर्मसावर्ण्ये। रुद्रसावर्ण्ये 'सुधामा', 'योगेश्वर' देवसावर्ण्ये ॥ 327 ॥ इन्द्रसावर्ण्ये 'बृहद्भानु' अभिधान। एक चौद्द मन्वन्तरे चौद्द 'अवतार' नाम ॥ 328 ॥ अनुवाद-चौदह मन्वन्तरोंमें चौदह अवतारोंके ये नाम हैं-स्वायम्भुव मन्वन्तरमें 'यज्ञ', स्वरोचिष मन्वन्तरमें 'विभु', उत्तम मन्वन्तरमें 'सत्यसेन', तामस मन्वन्तरमें 'हरि', रैवत मन्वन्तरमें 'वैकुण्ठ', चाक्षुष मन्वन्तरमें 'अजित', वैवस्वत मन्वन्तरमें 'वामन', सावर्ण्य मन्वन्तरमें 'सार्वभौम', दक्षसावर्ण्यमें 'ऋषभ', ब्रह्मसावर्ण्यमें 'विष्वक्सेन', धर्मसावर्ण्यमें 'धर्मसेतु', रुद्रसावर्ण्यमें 'सुधामा', देवसावर्ण्यमें 'योगेश्वर' और इन्द्रसावर्ण्यमें 'बृहद्भानु' ॥ 325-328 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'स्वायम्भुवेमं'-स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें 'यज्ञ'-अवतार, स्वरोचिष-मन्वन्तरमें 'विभु' आदि चौदह मन्वन्तरोंमें चौदह अवतार हैं ॥ 325 ॥ अनुभाष्य-मनुगण-जैसे (1) स्वायम्भुव,-स्वयम्भु ब्रह्माके पुत्र; (2) स्वारोचिष,-स्वरोचिः अथवा अग्निके पुत्र; (3) उत्तम-प्रियव्रतके पुत्र; (4) तामस-उत्तमके 276 ।

बीसवाँ अध्याय 20/325-333 ] भ्राता; (5) रैवत-तामसके सहोदर; (6) चाक्षुष-चक्षुके पुत्र; (7) वैवस्वत-विवस्वान् सूर्यके पुत्र; (8) सावर्णि- सूर्यके औरससे छायाके गर्भसे उत्पन्न पुत्र; (9) दक्षसावर्णि-वरुणके पुत्र; (10) ब्रह्मसावर्णि-उपश्लोकके पुत्र; (11-14) रुद्रसावर्णि (रुद्रके पुत्र), धर्मसावर्णि (रुचिके पुत्र), देवसावर्णि (सत्यसाहाके पुत्र) और इन्द्रसावर्णि (भूतिके पुत्र) हैं॥ 325-328 ॥ (ङ) युगावतार-वर्णन :- युगावतार एबे शुन, सनातन। सत्य-त्रेता-द्वापर-कलि-युगेर गणन ॥ 329 ॥ अनुवाद-हे सनातन, अब युगावतारोंके विषयमें श्रवण करो। सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग-ये चार युग हैं॥ 329 ॥ चारों युगोंमें चार वर्णोंके अवतार :- शुक्ल-रक्त-कृष्ण-पीत-क्रमे चारि वर्ण। चारिवर्ण धरि' कृष्ण करेन युगधर्म ॥ 330 ॥ अनुवाद-सत्य, त्रेता, द्वापर और कलिमें क्रमशः शुक्ल (श्वेत), रक्त (लाल), कृष्ण (काला) और पीत (पीला) वर्ण धारण करके श्रीकृष्ण युगधर्मकी स्थापना करते हैं॥ 330 ॥ अनुभाष्य-सत्ययुगमें-शुक्लवर्ण युगावतार, त्रेतायुगमें-रक्तवर्ण युगावतार, द्वापरयुगमें-कृष्णवर्ण युगावतार और कलियुगमें-पीतवर्ण युगावतार; इन चार प्रकारके वर्णोंको धारण करके श्रीकृष्ण युगावतार-धर्मकी रक्षा करते हैं॥ 330 ॥ श्रीमद्भागवत (10/8/13)में :- आसन् वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृह्णतोऽनुयुगं तनुः। शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः॥ 331 ॥ अनुवाद-[गर्गाचार्यने श्रीनन्द महाराजसे कहा-] तुम्हारा यह बालक अन्य तीन युगोंमें शुक्ल, रक्त और पीतवर्ण धारण करता है। अभी द्वापर युगमें इसने कृष्णवर्ण धारण किया है॥ 331 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 3/36 संख्या देखें ॥ 331 ॥ सत्यमें ब्रह्मचारी वेशमें शुक्लवर्णके चतुर्भुज भगवान् और त्रेतामें रक्तवर्णवाले चतुर्भुज भगवान् :- सत्ययुगे ध्यान-कर्म कराय 'शुक्ल'-मूर्त्ति धरि'। कर्द्दमके वर दिला यें'हो कृपा करि' ॥ 332 ॥ कृष्ण-'ध्यान' करे लोक ज्ञान-अधिकारी। त्रेतार धर्म 'यज्ञ' कराय 'रक्त'-वर्ण धरि' ॥ 333 ॥ अनुवाद-सत्ययुगमें भगवान् 'शुक्ल'-वर्ण धारण करके ध्यान-कर्मको संस्थापित करते हैं। उन्होंने ही कृपा करके कर्द्दम ऋषिको वर प्रदान किया था। ज्ञानके अधिकारी व्यक्ति सत्ययुगमें श्रीकृष्णका 'ध्यान' करते हैं। त्रेतायुगमें भगवान् 'रक्त'-वर्ण धारण करके त्रेताके युगधर्म 'यज्ञ'को स्थापित करते हैं॥ 332-333 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'कर्द्दम'-प्रजापति, जिन्होंने मनुकी कन्या देवहूतिसे विवाह किया और जिनके पुत्र कपिलदेव हैं। उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्ने शुक्ल-मूर्तिमें उन्हें दर्शन दिया था॥ 332 ॥ अनुभाष्य-(भाः 11/5/21)- "कृते शुक्लश्चतुर्बाहुर्जटिलोवल्कलाम्बरः। कृष्णाजिनोपवीताक्षान् विभ्रद्दण्डं कमण्डलुम्॥" [अर्थात् “सत्ययुगमें भगवान्के श्रीविग्रहका रङ्ग श्वेत होता है। उनकी चार भुजाएँ और सिरपर जटा होती है तथा वे वल्कलका ही वस्त्र पहनते हैं। वे काले मृगका चर्म, यज्ञोपवीत, माला, दण्ड और कमण्डलु धारण करते हैं। उनका ब्रह्मचारी वेश होता है।"] भाः 3/21/16, 35, 51, 3/22/19, 3/23/23, 5/10/16 देखें। (भाः 11/5/24)- "त्रेतायां रक्तवर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रिमेखलः। हिरण्यकेशस्त्रय्यात्मा स्रुक्स्रुवाद्युपलक्षणः॥" । 277

[ 20/332–340 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

[अर्थात् “त्रेतायुगमें भगवान्‌का श्रीविग्रह लाल रङ्गका होता है। उनके चार भुजाएँ होती हैं और कटिभागमें वे तीन मेखला धारण करते हैं। उनके केश सुनहले होते हैं और वे वेदप्रतिपादित यज्ञके रूपमें रहकर स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञ-पात्रोंको धारण किया करते हैं।”] भाः 11/5/26 श्लोक देखें॥ 332–333 ॥ द्वापरमें श्यामवर्ण द्विभुज भगवान् :— ‘कृष्णपदार्चन’ हय द्वापरेर धर्म। ‘कृष्ण’-वर्णे कराय लोके कृष्णाच्चर्न-कर्म ॥ 334 ॥ अनुवाद—द्वापरयुगका धर्म श्रीकृष्णके चरणोंका अर्चन करना है। भगवान् द्वापरमें श्रीकृष्ण कृष्णवर्ण धारण करके लोगोंसे अपना अर्चन करवाते हैं॥ 334 ॥ श्रीमद्भागवत (11/5/27, 29)में :— द्वापरे भगवान् श्यामः पीतवासा निजायुधः। श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च लक्षणैरुपलक्षितः ॥ 335 ॥ अनुवाद—द्वापरयुगमें भगवान् श्यामवर्ण, पीताम्बर और वंशी आदि निज-आयुधधारी, श्रीवत्सादि चिह्नोंसे युक्त—इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त होते हैं॥ 335 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/39 संख्या देखें। ‘श्याम’—अतसी-कुसुम-सङ्काश वर्ण अर्थात् अतसी-पुष्पके समान वर्ण। सभी द्वापरयुगोंमें स्वयंरूप श्रीकृष्णमूर्तिका अवतार नहीं होता। श्रीविष्णुपुराणमें, श्रीहरिवंशमें और महाभारत आदिमें कहा गया है कि कृष्णावतारके पूर्ववर्ती अन्यान्य द्वापरयुगोंमें भगवान् शुकपत्र-वर्ण अर्थात् हरा-वर्ण आदि ग्रहण करके अंशरूपमें अवतीर्ण हुए थे॥ 335 ॥ नमस्ते वासुदेवाय नमः सङ्कर्षणाय च। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय तुभ्यं भगवते नमः ॥ 336 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 336 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान् वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धको नमस्कार है॥ 336 ॥

अनुभाष्य—‘किस युगमें किस वर्णको धारण करके किस विधिके द्वारा भगवान् पूजित होते हैं?’—विदेहराज निमिके इस प्रकार जिज्ञासा करनेपर नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक करभाजन-ऋषि द्वापरयुगके अवतारका प्रणाम मन्त्र बतला रहे हैं— [चतुर्व्यूहात्मकस्य भगवतः नामान्याह—] भगवते वासुदेवाय ते (तुभ्यं) नमः; सङ्कर्षणाय नमः प्रद्युम्नाय अनिरुद्धाय च तुभ्यं नमः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 336 ॥ एइ मन्त्रे द्वापरे करे कृष्णाच्चर्न। ‘कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन’—कलियुगेर धर्म ॥ 337 ॥ अनुवाद—उपरोक्त मन्त्रके द्वारा द्वापरमें लोग श्रीकृष्णका अर्चन करते हैं। कलियुगका धर्म श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तन है॥ 337 ॥ कलियुगमें पीतवर्ण नाम-प्रेम-प्रचारक द्विभुज भगवान् :— ‘पीत’-वर्ण धरि’ तबे कैला प्रवर्त्तन। प्रेमभक्ति दिला लोके लञा भक्तगण ॥ 338 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 338 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णने पीतवर्ण धारण करके कलियुगेके धर्म श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तनका प्रवर्तन एवं भक्तोंके साथ लेकर लोगोंको श्रीकृष्ण-प्रेमभक्ति प्रदान की॥ 338 ॥ कलिमें स्वयं श्रीकृष्ण ही अवतारीके रूपमें अवतीर्ण :— धर्म प्रवर्त्तन करे व्रजेन्द्रनन्दन। प्रेमे गाय, नाचे लोक, करे सङ्कीर्त्तन ॥ 339 ॥ अनुवाद—व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही कलियुगके धर्मका प्रवर्त्तन करते हैं। वे प्रेमसे गाते और नृत्य करते हैं तथा सभी उनके साथ गाते हुए सङ्कीर्तन करते हैं॥ 339 ॥ श्रीमद्भागवत (11/5/32)में :— कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्। यज्ञैः सङ्कीर्त्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥ 340 ॥

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बीसवाँ अध्याय 20/340-345 ] अनुवाद—जिनके मुखमें सदा श्रीकृष्ण-वर्ण अर्थात् (कलियुगस्य) एकः महान् गुणः अस्ति; हि (यतः) कृष्णस्य श्रीकृष्णनाम और जिनकी अङ्गकान्ति अकृष्ण अर्थात् कीर्त्तनात् (श्रीहरेः तदीयानां च नामरूपगुणलीलाद्यनुवादात्) एव गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र और पार्षदोंसे मुक्तसङ्गः (अन्याभिलाषवर्जितः ज्ञानकर्माद्यनावृतः च सन्) परं परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय (पञ्चम्-पुरुषार्थं कृष्णप्रेम) व्रजेत् (लभेत)। कृते (सत्ययुगे) यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं॥ 340 ॥ विष्णुं ध्यायतः (हरिध्यानपरस्य जनस्य), त्रेतायां मखैः (यज्ञादिभिः) अनुभाष्य—आदिलीला 3/51 संख्या देखें॥ 340 ॥ यजतः (वैदिकविधानेन अनुष्ठानरतः जनस्य), द्वापरे परिचर्यायां कलियुग-धर्म नामकीर्तनका माहात्म्य :— (पाञ्चरात्रिक-विधानेन अर्चनायां) [यत् फलं लब्धं] तत् (सर्वं) आर तिनयुगे ध्यानादिते येइ फल हय। कलौ हरिकीर्त्तनात् एव [प्राप्नोति]। कलियुगे कृष्णनामे सेइ फल पाय॥ 341 ॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 342-343 ॥ अनुवाद—अन्य तीन युगोंमें ध्यानादिके द्वारा लोग विष्णुपुराण (6/2/17)में, पाद्मोत्तर-खण्ड (72/25)में, जो फल प्राप्त करते हैं, कलियुगमें लोग श्रीकृष्णनामका बृहन्नारदीय (38/97)में :— कीर्तन करनेसे वही फल प्राप्त कर लेते हैं॥ 341 ॥ ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। कलियुगकी प्रशंसा :— यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ 344 ॥ श्रीमद्भागवत (12/3/51-52)में— अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 344 ॥ कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः। अनुभाष्य— कीर्त्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥ 342 ॥ कृते (सत्ययुगे) ध्यायन् (ध्यानानुष्ठानेन), त्रेतायां यज्ञैः कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः। यजन् (यज्ञेश्वरं परितोषयन्), द्वापरे अर्चयन् (श्रीमूर्त्यादिकं द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्त्तनात्॥ 343 ॥ पूजयन्) यत् (फलम्) आप्नोति (लभते) कलौ केशवं अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 342-343 ॥ सङ्कीर्त्य (बहुभिर्मिलित्वा कीर्त्तयन्) तत् [सर्वम् एव भगवत्तोषणरूप- अमृतप्रवाह भाष्य—हे राजन्, दोषोंकी निधि कलिका फलम्] आप्नोति। एक महान् गुण है; कलियुगमें श्रीकृष्ण-कीर्तनसे ही श्लोक-भावानुवाद—सत्ययुगमें ध्यानके अनुष्ठानके जीव प्रगाढ़ बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करता है। सत्ययुगमें द्वारा, त्रेतायुगमें यज्ञके द्वारा यज्ञेश्वरके सन्तोषके विधानके विष्णुका ध्यान करके, त्रेतायुगमें यज्ञके द्वारा याजन द्वारा और द्वापरयुगमें श्रीमूर्तिकी पूजाके द्वारा जो फल करके और द्वापरयुगमें अर्चनादि करके जो फल प्राप्त मिलता है, कलियुगमें केवल भगवान् श्रीकेशवके होता है, कलिकालमें हरिकीर्तनसे वह सब फल प्राप्त सङ्कीर्तन करनेसे वह सब फल अर्थात् भगवद्- होता है॥ 342-343 ॥ सन्तोषरूपी फल प्राप्त हो जाता है॥ 344 ॥ अनुभाष्य—परीक्षितके द्वारा पापमय कलियुगमें मनुष्योंके श्रीमद्भागवत (11/5/36)में :— धर्म और अनर्थोंके नाशके उपायकी जिज्ञासा करनेपर कलिं सभाजयन्त्यार्या गुणज्ञाः सारभागिनः। श्रीशुकदेवने सत्य, त्रेता और द्वापर युगके धर्मका वर्णन यत्र सङ्कीर्त्तनेनैव सर्वस्वार्थोऽभिलभ्यते॥ 345 ॥ एवं कलियुगके असंख्य दोष बतलानेके बाद अध्यायके अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 345 ॥ अन्तमें उसके गुणोंका वर्णन कर रहे हैं— अमृतप्रवाह भाष्य—सभी गुणज्ञ सारग्राही आर्यपुरुष हे राजन्, दोषनिधेः (दोषाणां आधारस्य अपि) कलेः कलिको इसलिये 'धन्य' कहते हैं, क्योंकि सङ्कीर्तनके द्वारा ही कलिकालमें सब प्रकारके स्वार्थोंकी (पुरुषार्थोंकी) प्राप्ति होती है॥ 345 ॥ । 279

[ 20/345-353 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—विदेहराज निमिके द्वारा 'किस युगमें किस वर्णको धारण करके किस-किस विधिके द्वारा श्रीभगवान् पूजित होते हैं?'-इस विषयमें जिज्ञासा करनेपर नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक करभाजन-ऋषि कलियुगमें भावी अवतारी श्रीगौरसुन्दरको प्रणाम करके कलियुगके गुण और माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं— यत्र (कलौ) सङ्कीर्त्तनेन (कीर्त्तनाख्य-भक्त्यनुष्ठानेन) एव सर्वः स्वार्थः (सर्वपुरुषार्थः) अभिलभ्यते (सर्वतोभावेन प्राप्यते) [अतः इति] गुणज्ञाः (कलेर्गुणं जानन्ति ये ते) आर्याः (महात्मानः) सारभागिनः (गुणांशग्राहिणः) [तं] कलिं सभाजयन्ति (अर्चयन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 345 ॥ पूर्ववत् लिखि यबे गुणावतारगण। असंख्य संख्या ताँर, ना हय गणन ॥ 346 ॥ अनुवाद—जैसा कि मैंने गुणावतारोंका वर्णन करते हुए कहा था, वैसे ही युगावतारोंको भी असंख्य मानना चाहिये, इनकी भी गणना नहीं की जा सकती ॥ 346 ॥ श्रीगौरलीला-तत्त्वज्ञ, श्रीकृष्णभजनमें चतुर सनातन :— चारियुगावतारे एइ त' गणन।” शुनि' भङ्गि करि' ताँरे पुछे सनातन ॥ 347 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने चारों युगोंके अवतारोंका वर्णन किया है।” महाप्रभुकी बातें सुनकर श्रीसनातन गोस्वामीने परोक्षरूपमें इङ्गित करते हुए उनसे पूछा ॥ 347 ॥ स्वयं महाप्रभुके श्रीमुखसे महाप्रभुके अवतारके उद्देश्यकी निर्भीक जिज्ञासा :— राजमन्त्री सनातन-बुद्धये बृहस्पति। प्रभुर कृपाते पुछे असङ्कोच-मति ॥ 348 ॥ “अति क्षुद्र जीव मुञि नीच, नीचाचार। केमने जानिब कलिते कोन् अवतार?” ॥ 349 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी राजमन्त्री थे, वे देवताओंके गुरु बृहस्पतिके समान बुद्धिमान थे। महाप्रभुकी कृपासे उन्होंने निःसङ्कोच होकर महाप्रभुसे पूछा,-“मैं अत्यन्त क्षुद्र जीव हूँ, नीच हूँ और नीच आचरण करनेवाला हूँ। मैं कैसे जानूँगा कि कलियुगमें कौन अवतार है?” ॥ 348-349 ॥ महाप्रभुके द्वारा कलियुगके अवतारका परिचय देना :— प्रभु कहे,-“अन्यावतार शास्त्रद्वारा जानि। कलिते अवतार तैछे शास्त्रद्वारा मानि ॥ 350 ॥ शास्त्रके आलोकमें ही भगवद्-ज्ञानकी प्राप्ति :— सर्वज्ञ मुनिर वाक्य—शास्त्र-'प्रमाण'। आमा-सबा जीवेर हय शास्त्रद्वारा 'ज्ञान' ॥ 351 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, - “जिस प्रकार शास्त्रके द्वारा अन्य युगोंके अवतारोंके विषयमें जाना जाता है, उसी प्रकार कलियुगके अवतारके विषयमें भी शास्त्रके वचनोंके द्वारा ही जानना चाहिये। सर्वज्ञ मुनि (श्रीव्यासदेव) के द्वारा प्रकाशित शास्त्र ही प्रमाण हैं। शास्त्रोंके द्वारा ही सब जीवोंको ज्ञानकी प्राप्ति होती है ॥ 350-351 ॥ परोक्षवाद ही अवतारको प्रिय; लक्षणोंके द्वारा तत्त्वको जाननेवालोंके द्वारा वस्तु-निर्देश :— अवतार नाहि कहे,–‘आमि अवतार’। मुनि सब जानि' करे लक्षण-विचार ॥ 352 ॥ अनुवाद—अवतार स्वयं नहीं कहते,-'मैं अवतार हूँ।' श्रीव्यासमुनि सबकुछ जानते हैं, इसलिये उन्होंने अवतारोंके लक्षणोंका शास्त्रोंमें वर्णन किया है ॥ 352 ॥ जीवके लिये दुःसाध्य; अतिशय वीर्यके द्वारा विष्णुत्तत्त्वकी उपलब्धि :— श्रीमद्भागवत (10/10/34)में— यस्यावतारा ज्ञायन्ते शरीरिष्वशरीरिणः। तैस्तैस्तुल्यातिशयैर्वीर्यैर्देहिष्वसङ्गतैः ॥ 353 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 353 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्राकृत-शरीररहित अप्राकृत शरीरी परमेश्वरका अवतार-तत्त्व जीवोंके लिये दुःसाध्य है; अतुल, अतिशय और अलौकिक वीर्यके द्वारा ही उस 280 |

बीसवाँ अध्याय 20/353-358 ] प्रकार आपके अवतारोंके विषयमें कुछ ज्ञान होता है॥ 353 ॥ अनुभाष्य-जब श्रीकृष्णने कृपा प्रकाशित करते हुए अर्जुनके युगल वृक्षोंको गिरा दिया, तब कुबेरके दो पुत्र नलकुबेर और मणिग्रीव श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं- देहिषु (जीवेषु) असङ्गतैः (दुष्प्राप्यैः) अतुल्यातिशयैः (नास्ति तुल्यम् अतिशयम् आधिक्यं येभ्यः तैः) तैः तैः वीर्यैः (विभवैः) शरीरिषु (प्रपञ्चे देहिषु जीवेषु मध्ये) अशरीरिणः (प्राकृतशरीरवर्जितस्य अपि) यस्य (तव) अवताराः ज्ञायन्ते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 353 ॥ स्वरूप और तटस्थ लक्षणकी संज्ञा :- 'स्वरूप'-लक्षण, आर 'तटस्थ-लक्षण'। एइ दुइ लक्षणे 'वस्तु' जाने मुनिगण ॥ 354 ॥ आकृति, प्रकृति, स्वरूप, स्वरूप-लक्षण। कार्यद्वारा ज्ञान,-एइ तटस्थ-लक्षण ॥ 355 ॥ अनुवाद- 'स्वरूप'-लक्षण और 'तटस्थ'-लक्षण-इन दो लक्षणोंके द्वारा मुनिगण 'वस्तु'के विषयमें जानते हैं। आकृति, प्रकृति और स्वरूप-ये स्वरूप लक्षण हैं तथा कार्यके द्वारा जो ज्ञान होता है, उसे तटस्थ-लक्षण कहते हैं ॥ 354-355 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'आकृति'-आकार; 'प्रकृति'- स्वभाव; 'स्वरूप'-मूर्ति; 'स्वरूपलक्षण'-उस विग्रहका व्यवहार; 'तटस्थ लक्षण'-कार्यके द्वारा ज्ञान ॥ 355 ॥ अनुभाष्य-आकृति, प्रकृति और स्वरूप,-ये तीन ही 'स्वरूप' अथवा 'मुख्य' लक्षण हैं। कार्यके द्वारा ज्ञान ही 'तटस्थ' अथवा 'गौण' लक्षण है ॥ 355 ॥ श्रीमद्भागवतमें (1/1/1) श्लोकके मङ्गलाचरणके प्रारम्भमें स्वरूप और तटस्थ लक्षणसे परमेश्वर श्रीकृष्णका निरूपण :- भागवतारम्भे व्यास मङ्गलाचरणे। 'परमेश्वर' निरूपिल एइ दुइ लक्षणे ॥ 356 ॥ अनुवाद- श्रीमद्भागवतके आरम्भमें श्रीव्यासदेवने मङ्गलाचरणमें इन लक्षणोंके आधारपर ही 'परमेश्वर'का निरूपण किया है ॥ 356 ॥ अनुभाष्य-भागवतके 'जन्माद्यस्य' श्लोकमें 'सत्यं' और 'परं' नामक दो शब्द स्वरूप-लक्षण एवं विश्व-सृष्टि-स्थिति-लय, ब्रह्माके हृदयमें वस्तुज्ञान प्रकट करना और अर्थाभिज्ञता आदि तटस्थ लक्षण व्यक्त करके परमेश्वरका निरूपण किया गया है ॥ 356 ॥ श्रीमद्भागवत (1/1/1)में :- जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः। तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ 357 ॥ अनुवाद-इस विश्वका जन्म, स्थिति और लय जिससे होता है, ऐसा कहनेसे जो तत्त्व निश्चित हुआ है, अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा विचार करनेपर जो समस्त अर्थ अथवा कार्यमें एकमात्र परम 'ज्ञ-तत्त्व' अर्थात् 'स्वरूपतत्त्व' कहलाकर स्थिर होते हैं; जो दृश्यमान जगत्में एकमात्र स्वराट् अर्थात् स्वतन्त्र राजा हैं; जिन्होंने आदिकवि ब्रह्माको अन्तर्यामीके रूपमें ब्रह्मतत्त्वकी शिक्षा दी है; जिनके विषयमें समस्त बुद्धिमान पण्डितोंमें बारम्बार मोह उत्पन्न होता है; जिनसे अग्नि, जल और मिट्टी आदि भूतोंका विनिमय अर्थात् पृथक् रूपमें सत्ता है; जिनसे तीन प्रकारकी सृष्टि अर्थात् चिद्-उदयरूप सृष्टि, जीव-प्रकाट्यरूप सृष्टि और मायिक-ब्रह्माण्डरूप सृष्टि-सत्यरूपमें वर्तमान है; स्वरूपशक्तिके द्वारा नित्य-कपट-शून्य परमसत्य-तत्त्वरूप उन श्रीकृष्णका हम ध्यान करते हैं ॥ 357 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/266 संख्या देखें ॥ 357 ॥ इस प्रथम श्लोकमें परमेश्वरका (1) स्वरूप लक्षण :- एइ श्लोके 'परं'-शब्दे 'कृष्ण'-निरूपण। 'सत्यं' शब्दे कहे ताँर स्वरूप-लक्षण ॥ 358 ॥ । 281

[ 20/358-366 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इस श्लोकमें 'परं' शब्दके द्वारा श्रीकृष्णका निरूपण और 'सत्यं' शब्दके द्वारा उनके स्वरूप लक्षणको बतलाया गया है॥358॥ (2) तटस्थ लक्षण :- विश्वसृष्ट्यादि कैल, वेद ब्रह्माके पड़ाइल। अर्थाभिज्ञता, स्वरूपशक्त्ये माया दूर कैल॥359॥ एइसब कार्य—ताँर तटस्थ-लक्षण। अन्य अवतार ऐछे जाने मुनिगण॥360॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण विश्वकी सृष्टि-स्थिति-प्रलयादि करते हैं, उन्होंने ब्रह्माको वेद पढ़ाया, उन्हें पूर्ण प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ज्ञान है तथा उन्होंने स्वरूपशक्तिके प्रभावसे मायाको दूर रखा है—ये सब कार्य उनके तटस्थ लक्षण हैं। मुनिगण इन्हीं स्वरूप और तटस्थ लक्षणोंके द्वारा श्रीकृष्ण और अन्यान्य सभी अवतारोंके विषयमें भी जान लेते हैं॥359-360॥ जाननेवालोंके द्वारा उक्त दो लक्षणोंके द्वारा ही सभी अवतारोंका निर्णय :- अवतारकाले हय जगतेर गोचर। एइ दुइ लक्षणे केह जानेन ईश्वर॥”361॥ अनुवाद—भगवान् जब अवतार लेते हैं तो वे जगत्में जीवोंके दृष्टिगोचर तो होते हैं, परन्तु उपरोक्त स्वरूप और तटस्थ, इन दो लक्षणोंके द्वारा कुछ भक्त ही उन्हें ईश्वरके रूपमें जान पाते हैं॥”361॥ भजनमें चतुर भक्तोंके निकट भगवान्‌का गुप्त स्वभाव व्यक्त :- सनातन कहे,—“याते ईश्वर-लक्षण। पीतवर्ण, कार्य—प्रेमदान-सङ्कीर्त्तन॥362॥ सनातनके द्वारा महाप्रभुकी लीलाकी व्याख्याको श्रवण करनेकी अभिलाषा :- कलिकाले सेइ 'कृष्णावतार' निश्चय। सुदृढ़ करिया कह, याउक संशय॥”363॥ अनुवाद—श्रीसनातनने कहा,—“जिनमें ईश्वरके लक्षण हैं, वे पीतवर्णके हैं और जो श्रीकृष्णनाम सङ्कीर्त्तनके द्वारा जीवोंमें श्रीकृष्णप्रेमका दान करते हैं, कलिकालमें वह श्रीकृष्णकावतार अवश्य ही होगा। आप मुझे निश्चित रूपसे बतलाइये, जिससे मेरे सभी संशय दूर हो जाँय॥”362-363॥ अनुभाष्य—कलिकालमें युगावतारका स्वरूप- लक्षण—पीतवर्ण आकार है, तटस्थ-लक्षण—प्रेमदान और सङ्कीर्त्तनरूपी कार्य है॥362॥ भक्तकी जीत, भगवान्‌की पराजय :- प्रभु कहे,—“चतुरालि छाड़, सनातन। शक्त्यावेशावताररे शुन विवरण॥364॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन, अपनी चतुरायी छोड़ो और अब शक्त्यावेशावतारोंका वर्णन सुनो॥364॥ अनुभाष्य—'चतुरालि'—कौशलसे मनोगत अभिप्रायको स्थापित करना, निपुणता-प्रदर्शित करना, बुद्धिमत्ता प्रकाशित करना॥364॥ श्रीकृष्णके छः प्रकारके विलास और तीन प्रकारके रूपोंमेंसे एक (ग) शक्त्यावेशावतारका वर्णन :- शक्त्यावेशावतार कृष्णेर असंख्य गणन। दिग्दर्शन करि मुख्य मुख्य जन॥365॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके असंख्य शक्त्यावेशावतार हैं, मैं केवल मुख्य-मुख्य शक्त्यावेशावतारोंका वर्णन करके उनका दिग्दर्शन कराऊँगा॥365॥ दो प्रकारके शक्त्यावेश—साक्षात् शक्त्याविष्ट मुख्य- 'अवतार' और शक्त्याभासाविष्ट गौण-'विभूति' संज्ञा :- शक्त्यावेश दुइरूप—'मुख्य', 'गौण' देखि। साक्षात्शक्त्ये 'अवतार', आभासे 'विभूति' लिखि॥366॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥366॥ 282 ।

बीसवाँ अध्याय 20/366-373 ] अमृतप्रवाह भाष्य—'शक्त्यावेश'—ये गौण और मुख्यके भेदसे दो प्रकारके होते हैं। जिनमें साक्षात् शक्तिका अवतार होता है,—वे मुख्यशक्त्यावेश-अवतार हैं। और जिनमें शक्तिका आभासमात्र विभूतिके रूपमें देखा जाता है, वे गौणशक्त्यावेश-अवतार हैं॥ 366॥

  1. मुख्यावेशावतारोंके नाम :- 'सनकादि', 'नारद', 'पृथु', 'परशुराम'। जीवरूप 'ब्रह्मा' आवेशावतार-नाम॥ 367॥ अनुवाद—सनकादि, नारद, पृथु, परशुराम और जीवरूप ब्रह्मा शक्त्यावेश-अवतार कहलाते हैं॥ 367॥ वैकुण्ठे 'शेष'—धरा धरये 'अनन्त'। एइ मुख्यावेशावतार—विस्तारे नाहि अन्त॥ 368॥ अनुवाद—वैकुण्ठमें 'शेष' और अपने फणोंपर धरतीको धारण करनेवाले 'अनन्त'—ये मुख्य शक्त्यावेशावतार हैं। मुख्य शक्त्यावेशावतारोंकी भी संख्याका कोई अन्त नहीं है॥ 368॥ मुख्यशक्तिके भेदसे मुख्य-आवेशावतारगण :- सनकाद्ये 'ज्ञान'-शक्ति, नारदे शक्ति 'भक्ति'। ब्रह्माय 'सृष्टि'-शक्ति, अनन्ते 'भू-धारण'-शक्ति॥ 369॥ शेषे 'स्व-सेवन'-शक्ति, पृथुते 'पालन'। परशुरामे 'दुष्टनाश-वीर्यसञ्चारण'॥ 370॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने सनकादि चतुःसनमें 'ज्ञान'-शक्तिका, नारदमें 'भक्ति'-शक्तिका, ब्रह्मामें 'सृष्टि'-शक्तिका, अनन्तमें 'भू-धारण'-शक्तिका, शेषमें 'अपनी-सेवा'-शक्तिका, पृथुमें पृथ्वीकी 'पालन'-शक्तिका और परशुराममें 'दुष्ट-विनाशक'-शक्तिका आवेश किया है॥ 369-370॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'शेषे स्व-सेवन'-शक्ति'—शेषरूपी भगवदवतारमें अपनी सेवारूपी शक्ति अर्पित हुई है॥ 370॥ आवेशावतारकी संज्ञा :- लघुभागवतामृत (1/1/18)के आवेशप्रकरणमें— ज्ञानशक्त्यादिकलया यत्राविष्टो जनार्दनः। त आवेशा निगद्यन्ते जीवा एव महत्तमाः॥ 371॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 371॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानशक्ति आदि कलाके द्वारा जिनमें भगवद्-आवेश है, उन सभी महत्तम (महान व्यक्तियोंमें श्रेष्ठ) जीवोंकी 'आवेश-अवतार'के रूपमें गणना की जाती है॥ 371॥ अनुभाष्य— यत्र (महत्तमेषु जीवेषु) ज्ञानशक्त्यादिकलया (ज्ञान-भक्ति- सृष्टि-सेवन-पालन-धारण-विनाशनादि-भागेन) जनार्दनः आविष्टः, ते महत्तमाः जीवाः एव 'आवेशाः' (आवेशावताराः) निगद्यन्ते (कथ्यन्ते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 371॥ (2) गीतामें विभूतिका वर्णन :- 'विभूति' कहिये यैछे गीता-एकादशे। जगत् व्यापिल कृष्णशक्त्याभासावेशे॥ 372॥ अनुवाद—गीताके ग्यारहवें अध्यायमें वर्णित श्रीकृष्णके सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्तरूपमें भगवान्की जिन विभूतियोंका वर्णन किया गया है, उनको 'विभूति' कहते हैं। श्रीकृष्णके शक्त्याभासावेशसे ही जगत् व्याप्त है॥ 372॥ अनुभाष्य—भाः 2/7/39 श्लोकमें मायाकी विभूतियोंका परिचय देखें॥ 372॥ श्रीमद्भगवद्गीता (10/41-42)में :- यद्यद्विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥ 373॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 373॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो सब जीव-विभूतिमान् और श्रीमान् हैं, उन्हें मेरे तेजके अंशसे उत्पन्न जानना॥ 373॥ । 283

[ 20/373-381 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— विभूतिमत् (ऐश्वर्ययुक्तं) श्रीमत् (सम्पत्तियुक्तम्) ऊर्ज्जितं (बलप्रभावादिना गुणेनातिशयितं) यत् यत् सत्त्वं (प्राकृतं वस्तु) भवति, तत् तत् एव मम तेजोऽशसम्भवं (प्रभावकलया सिद्धं प्रभावस्यांशेन सम्भूतम् इति) त्वम् अवगच्छ (जानीहि)। श्लोक-भावानुवाद-ऐश्वर्ययुक्त, सम्पत्तियुक्त, बल-प्रभावादि अतिशय गुणोंसे युक्त जो-जो प्राकृत वस्तु है, तुम उसे-उसे ही मेरे तेजसे (प्रभावसे) उत्पन्न जानना॥ 373 ॥ अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ 374 ॥ अनुवाद-अथवा हे अर्जुन! इस पृथक्-पृथक् उपदिष्ट ज्ञानसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? तुम मात्र इतना ही जानो कि मैं अपने एकांशसे इस समस्त जगत्को धारणकर अवस्थित हूँ॥ 374 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/20 संख्या देखें ॥ 374 ॥ श्रीकृष्णस्वरूपके छः प्रकारके विलासोंमेंसे बाकी दो प्रकारकी आयुवालेके रूपमें लीला :- एइत' कहिलुँ शक्त्यावेश-अवतार। बाल्य-पौगण्ड-धर्मेर शुनह विचार ॥ 375 ॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने तुम्हें शक्त्यावेश अवतारोंके विषयमें बतलाया। अब तुम श्रीकृष्णके बाल्य-पौगण्ड अवस्था आदिके लक्षणोंको सुनो ॥ 375 ॥ स्वयं श्रीकृष्णके द्वारा लीला-प्रकट करनेसे पहले गुरुवर्गके रूपमें सेवकगणोंको प्रकटित करना :- किशोरशेखर-धर्मी व्रजेन्द्रनन्दन। प्रकटलीला करिबारे यबे करे मन॥ 376 ॥ आदौ प्रकट कराय माता-पिता-भक्तगणे। पाछे प्रकट हय जन्मादिक-लीलाक्रमे ॥ 377 ॥ अनुवाद-व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण किशोरशेखर हैं। जब उनकी लीलाओंको प्रकट करनेकी इच्छा होती है, तब वे पहले माता-पितादि भक्तोंको प्रकट करते हैं और बादमें क्रमशः स्वयं जन्म-बाल्य-पौगण्ड-कैशोर आदि लीलाओंको प्रकट करते हैं ॥ 376-377 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/63) :- वयसो विविधत्वेऽपि सर्वभक्तिरसाश्रयः। धर्मी किशोर एवात्र नित्यलीला-विलासवान् ॥ 378 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 378 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नित्यलीला-विलासवान् सर्वभक्तिरसाश्रय श्रीकृष्णकी अनेक वयस (अवस्थाएँ) रहनेपर भी किशोर अवस्था ही श्रेष्ठ है॥ 378 ॥ अनुभाष्य- वयसः विविधत्वे (बाल्यपौगण्डकैशोरादिप्रकारभेदे) अपि अत्र सर्वभक्तिरसाश्रयः नित्यलीलाविलासवान् किशोरः एव धर्मी (सर्ववयो-धर्मविशिष्टः पूर्णतमः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 378 ॥ प्रत्येक ब्रह्माण्डमें प्रतिक्षणमें वह विचित्र नवनवायमान चिन्मयी लीला :- पूतना-वधादि यत लीला क्षणे क्षणे। सब लीला नित्य प्रकट करे अनुक्रमे ॥ 379 ॥ अनुवाद-पूतना-वधादि जितनी भी लीलाएँ हैं, वे क्षण-क्षणमें चलती रहती हैं। श्रीकृष्ण समस्त लीलाओंको क्रमशः नित्य प्रकट करते रहते हैं॥ 379 ॥ अनन्त ब्रह्माण्ड, तार नाहिक गणन। कोन लीला कोन ब्रह्माण्डे हय प्रकटन ॥ 380 ॥ अनुवाद-इस जगत्में अनन्त ब्रह्माण्ड हैं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। कोई-न-कोई लीला किसी-न-किसी ब्रह्माण्डमें सदा प्रकटित होती ही रहती है॥ 380 ॥ श्रीकृष्णावतारकी लीलाका दृष्टान्त-जैसे निरन्तर गङ्गाकी धारा :- एइमत सब लीला-येन गङ्गाधार। से-से लीला प्रकट करे व्रजेन्द्रकुमार ॥ 381 ॥ 284 |

बीसवाँ अध्याय 20/381-390 ] अनुवाद-इस प्रकार श्रीब्रजेन्द्रनन्दन समस्त लीलाओंको गङ्गाकी धाराकी भाँति निरन्तर प्रकट करते रहते हैं॥381॥ किशोर श्रीकृष्णकी ही व्रजलीला :- क्रमे बाल्य-पौगण्ड-कैशोरता प्राप्ति। रास-आदि लीला करे, कैशोरे नित्यस्थिति॥382॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण सर्वप्रथम बाल्य, उसके पश्चात् पौगण्ड और फिर किशोरावस्थाको प्राप्त करते हैं और उनके अनुरूप लीलाएँ करते हैं। कैशोरावस्था आनेपर श्रीकृष्ण सदा उसी अवस्थामें वर्तमान रहते हैं अर्थात् वे कभी भी यौवन, वृद्धावस्थाको प्राप्त नहीं करते। कैशोर अवस्थामें वे रास-लीलादि प्रकाशित करते हैं॥382॥ श्रीकृष्णलीलाके नित्य होनेकी व्याख्या :- 'नित्यलीला' कृष्णेर सर्वशास्त्रे कय। बुझिते ना पारे लीला केमने 'नित्य' हय॥383॥ अनुवाद-सभी शास्त्र कहते हैं कि श्रीकृष्णकी समस्त लीलाएँ 'नित्यलीला' हैं। किन्तु लोग नहीं समझ पाते कि वे कैसे 'नित्य' चलती रहती हैं॥383॥ ज्योतिषचक्र (प्रकाशके गोले)का उदाहरण :- दृष्टान्त दिया कहि, तबे लोक सब जाने। कृष्णलीला-नित्य, ज्योतिश्चक्र-प्रमाणे॥384॥ ज्योतिश्चक्रे सूर्य येन फिरे रात्रि-दिने। सप्तद्वीपाम्बुधि लङ्घि' फिरे क्रमे क्रमे॥385॥ रात्रि-दिने हय षष्ठिदण्ड-परिमाण। तिनसहस्र छयशत 'पल' तार मान॥386॥ अनुवाद-इसलिये मैं एक दृष्टान्त देता हूँ, जिससे लोग उसे जान पायेंगे। ज्योतिषचक्रकी (राशिचक्रकी) भाँति श्रीकृष्णलीला नित्य है। ज्योतिषचक्रमें सूर्य जिस प्रकार रात-दिन घूमता रहता है और सातों द्वीपोंके मध्य समुद्रोंको क्रमशः लाँघता हुआ चलता जाता है। रात और दिनमें कुल मिलाकर साठ दण्ड होते हैं तथा उसमें तीन हजार छः सौ 'पल' होते हैं॥384-386॥ सूर्योदय हैते षष्ठिपल-क्रमोदय। सेइ एक दण्ड, अष्ट दण्डे 'प्रहर' हय॥387॥ अनुवाद-सूर्योदयसे लेकर सूर्य साठ पलके परिमाण समयमें क्रमशः ऊपर उठता जाता है। साठ पलका एक दण्ड होता है और आठ दण्डका एक 'प्रहर' होता है॥387॥ एक-दुइ-तिन-चारि प्रहरे अस्त हय। चारिप्रहर रात्रि गेले पुनः सूर्योदय॥388॥ अनुवाद-एक-दो-तीन-चार प्रहर चलते हुए सूर्य अस्त होता है। चार प्रहर रातके बीत जानेपर पुनः सूर्योदय होता है॥388॥ चौदह मन्वन्तरोंमें समस्त ब्रह्माण्डोंमें अवतार-लीला :- ऐछे कृष्णेर लीला-मण्डल चौद्द मन्वन्तरे। ब्रह्माण्डमण्डल व्यापि' क्रमे क्रमे फिरे॥389॥ अनुवाद-सूर्यके एक मण्डलमें घूमनेके समान श्रीकृष्णकी लीलाका भी एक मण्डल है जिसमें श्रीकृष्णकी लीलाएँ क्रमशः प्रकट होती रहती हैं। चौदह मन्वन्तर-कालमें यह मण्डल सभी ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त होकर क्रमशः घूमता रहता है अर्थात् श्रीकृष्णकी लीलाएँ एकके बाद एक ब्रह्माण्डमें क्रमशः प्रकट होती रहती हैं॥389॥ श्रीकृष्णकी प्रकट-लीलाका समय :- सओयाशत वत्सर कृष्णेर प्रकट-प्रकाश। ताहा यैछे व्रज-पुरे करिला विलास॥390॥ अनुवाद-एक सौ पचीस वर्षों तक श्रीकृष्णकी लीलाका प्रकट-प्रकाश होता है। व्रज और पुर अर्थात् मथुरा एवं द्वारकामें वे प्रकट लीलाका आस्वादन करते हैं॥390॥ । 285

[ 20/391-395 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णावतार-लीलाकी उपमा-जैसे, अलातचक्र-भ्रमण :- अलातचक्रप्राय सेइ लीलाचक्र फिरे। सब लीला ब्रह्माण्डे क्रमे उदय करे॥ 391॥ अनुवाद—जलती हुई मशालको तेजीसे घुमानेपर जैसे एक अटूट अलातचक्र (अग्निका चक्र) दिखलायी देता है, उसी प्रकार ही श्रीकृष्णकी लीलाओंका चक्र चलता है। समस्त लीलाएँ समस्त ब्रह्माण्डोंमें क्रमशः उदित होती रहती हैं॥ 391॥ जन्मसे लेकर मूसल-लीला तककी लीलाएँ :- जन्म, बाल्य, पौगण्ड, कैशोर प्रकाश। पूतना वधादि करि' मौषलान्त विलास ॥ 392॥ असंख्य ब्रह्माण्डोंमें किसी-न-किसी ब्रह्माण्डमें नित्य ही एक-ना-एक लीला वर्तमान, इसलिये लीलाकी 'नित्यता' :- कोन ब्रह्माण्डे कोन लीलार हय अवस्थान। ताते लीला 'नित्य' कहे निगम-पुराण ॥ 393॥ अनुवाद—जन्म, बाल्य, पौगण्ड और कैशोर-अवस्थाको प्रकाशित करते हुए क्रमशः पूतना-वधादि करनेसे लेकर मूसल-लीला (यदुवंशके विनाश) तक श्रीकृष्णकी जितनी लीलाएँ हैं, किसी-न-किसी ब्रह्माण्डमें इनमेंसे कोई-न-कोई लीला चलती ही रहती है, इसलिये वेद और पुराण श्रीकृष्णलीलाको नित्य कहते हैं॥ 392-393॥ सङ्कर्षणके चिद्-वैभव समस्त विष्णुधाम ही विष्णुके समान और हरिके साथ प्रपञ्चमें अवतीर्ण :- गोलोक, गोकुल-धाम- 'विभु' कृष्णसम। कृष्णेच्छाय ब्रह्माण्डगणे ताहार संक्रम॥ 394 ॥ अनुवाद—चिन्मय गोलोक और गोकुल-धाम भी श्रीकृष्णकी भाँति सर्वव्यापक और ऐश्वर्यशाली हैं। श्रीकृष्णकी इच्छासे चिन्मय गोलोक और गोकुल धाम ब्रह्माण्डोंमें श्रीकृष्णके साथ क्रमशः प्रकाशित होते रहते हैं॥ 394॥ ब्रह्माण्डसमूहोंमें अवतारीके साथ उनका गोलोकधाम भी अवतीर्ण :- अतएव गोलोकस्थाने नित्य विहार। ब्रह्माण्डगणे क्रमे प्रकट ताहार ॥ 395॥ अनुवाद—इसलिये श्रीकृष्णकी लीलाएँ नित्य चिन्मय गोलोक-धाममें होती हैं। वही लीलाएँ भौतिक ब्रह्माण्डोंमें क्रमशः प्रकट होती रहती हैं॥ 395॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीला नित्य प्रकट रहती है। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें समय-समयपर क्रमशः नित्यलीला प्रकट होती है। एक ब्रह्माण्डमें श्रीकृष्णजन्म-लीलासे आरम्भ करके 125 वर्षों तक मूसल-लीलाके अन्त तक प्रकट होकर उस ब्रह्माण्डमें लीला अप्रकट हो जाती है। श्रीकृष्णकी एक क्षणकी लीला जब एक ब्रह्माण्डमें समाप्त होती है, तब वही लीला एक अन्य ब्रह्माण्डमें आरम्भ होती है और इस ब्रह्माण्डमें दूसरे क्षणकी लीला आरम्भ हो जाती है। इसी प्रकार असंख्य अनन्त ब्रह्माण्डोंमें प्रतिक्षणसे सम्बन्धित लीला प्रकट होकर अन्य ब्रह्माण्डमें फिर उसी क्षणसे सम्बन्धित लीलाका उदय होता है। इसके उदाहरणमें सूर्यके भ्रमणमार्ग अर्थात् ज्योतिषचक्रमें भ्रमण कहा गया है। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें श्रीकृष्णकी असंख्य लीलाएँ क्रमशः उदित होकर अप्रकट हो रही हैं। जीवके ज्ञानसे उस अनन्त लीलाकी उपलब्धि सम्भव नहीं है। गङ्गाकी धारा जिस प्रकार निरन्तर है, अलातचक्र-भ्रमण जिस प्रकार निरन्तर और व्यापक होता है, उसी प्रकार श्रीकृष्णलीलाका भी निरन्तर प्रकट होना भिन्न-भिन्न ब्रह्माण्डोंमें उपलब्ध होता है। श्रीकृष्णकी जन्म, बाल्य और पौगण्ड-कैशोरादि लीलाएँ नित्यकाल ही संघटित हो रही हैं। किसी एक ब्रह्माण्डमें रहनेवाले जीवोंको श्रीकृष्णलीलाकी नित्य प्रकट होनेकी अनुभूति नहीं होनेपर भी उनकी लीलाकी नित्यता है। सभी लीलाओंके एक समयमें नित्य प्राकट्यका नाम ही 'नित्यलीला' है; किन्तु प्रपञ्चमें क्रमपूर्वक ही लीलाओंका प्राकट्य होता 286 ।

बीसवाँ अध्याय 20/379-396 ]

है। उस समय अन्यान्य लीलाएँ अन्य ब्रह्माण्डोंमें प्रकट होती हैं, इसलिये किसी एक ब्रह्माण्डमें एक ही समयमें उसका नित्यत्व दिखलायी नहीं देता। वास्तवमें लीला नित्य है; चौदह मन्वन्तर अर्थात् कल्पके निर्दिष्ट कालमें किसी एक ब्रह्माण्डमें क्रमपूर्वक श्रीकृष्णलीला- मण्डल पुनः घूमता है; इसलिये लीला अनित्य नहीं है। अन्य किसी ब्रह्माण्डमें चल रही नित्यलीला हमें दिखलायी नहीं पड़ती, यह कहकर इस ब्रह्माण्डके लोग नित्यलीलाकी उपलब्धि करनेमें समर्थ नहीं होते। इसलिये वेद-पुराणादि नित्यलीलाकी बात ही कहते हैं। गोलोककी नित्य विहारस्थली क्रमशः ब्रह्माण्डोंमें प्रकट होती है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती-ठाकुरने स्वरचित 'रागवर्त्म-चन्द्रिका'के द्वितीय प्रकाशमें उज्ज्वलनीलमणिके 'तद्भावबद्धरागा ये जनास्ते' श्लोककी टीकामें लिखा है—

“अनुरागौघं रागानुगाभजनौत्कण्ठयं, न त्वनुरागस्थायिनं, साधकदेहेऽनुरागोत्पत्त्यसम्भवात्। व्रजेऽभवन्निति अवतारसमये नित्यप्रियाद्या यथा आविर्भवन्ति, तथैव गोपिकागर्भे साधनसिद्धा अपि आविर्भवन्ति। ततश्च गोपिकादेहे उत्पद्यन्ते, पूर्वजन्मनि साधकदेहे तेषां (स्नेहमानप्रणयरागानुरागमहाभावानाम्) उत्पत्त्य- सम्भवात्। ×× साधक-देहभङ्गसमये एव तस्मै प्रेमवते भक्ताय ×× चिदानन्दमयी गोपिकातनुश्च दीयते। सैव तनुर्योगमायया वृन्दावनीयप्रकटप्रकाशे कृष्णपरिवारप्रादुर्भावसमये गोपीगर्भादुद्भाव्यते। नात्र कालविलम्बगन्धोऽपि; प्रकटलीलाया अपि विच्छेदाभावात्। यस्मिन्नेव ब्रह्माण्डे तदानीं वृन्दावनीयलीलानां प्राकट्यं, तत्रैवास्यामेव व्रजभूमौ, अतः साधकप्रेमिभक्तदेहभङ्गसमकालेऽपि सपरिकर श्रीकृष्णप्रादुर्भावः सदैववास्ति, इति भो भो महानुरागिसोत्कण्ठभक्ताः, मा भैष्ट, सुस्थिरास्तिष्ठत, स्वस्त्येवास्ति भवद्भव्यः इति।”

एक साथ समय-समयपर व्रजभूमिमें आविर्भूत होते हैं।” यहाँपर 'अनुरागौघं' अर्थात् रागानुग-भजनोचित उत्कण्ठा-स्थायीभावगत अनुराग नहीं है, क्योंकि साधककी देहमें अनुरागकी उत्पत्ति असम्भव है। 'व्रजेऽभवन्' - व्रजमें आविर्भूत हुए थे, इसका अर्थ यह है कि श्रीकृष्णके अवतार-कालमें नित्यप्रियाएँ जिस प्रकारसे आविर्भूत होती हैं, उसी प्रकार साधनसिद्धगण भी गोपियोंके गर्भसे आविर्भूत होते हैं। उसके बाद (नित्यसिद्धाओंके सङ्गकी महिमासे) उक्त गोपीदेहमें स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, महाभाव समूह उत्पन्न होते हैं, क्योंकि पूर्वजन्ममें (उक्त साधकदेहमें) उनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं होती। साधकदेहके नष्ट होनेके समय ही उस प्रेमवान् भक्तको चिदानन्दमयी गोपी देह प्रदान की जाती है। उसी सिद्धदेहमें ही योगमाया वृन्दावनकी लीलाके 'प्रकट' प्रकाशके समय श्रीकृष्ण परिकरोंके आविर्भावके समय उस भक्तको गोपीके गर्भसे उत्पन्न कराती हैं। यहाँपर कालके विलम्बकी गन्धमात्र भी नहीं है, क्योंकि प्रकट-लीलाका भी विच्छेद नहीं है अर्थात् वह निरन्तर है। जिस किसी ब्रह्माण्डमें ही उनकी वृन्दावनकी लीलाका प्राकट्य हुआ करता है, उसी व्रजभूमिमें ही गोपीके गर्भसे साधनसिद्ध गणोंका आविर्भाव हुआ करता है। इसलिये साधक-प्रेमीभक्तके देहके नष्ट होनेके समयमें भी सपरिकर श्रीकृष्णका आविर्भाव सदा ही हुआ करता है। इसलिये, हे महानुरागी उत्कण्ठायुक्त भक्तगण ! भयभीत मत होना, सुस्थिर होओ, आपका कल्याण निश्चित है ।] ॥ 379-395 ॥

[उज्ज्वलनीलमणि (3/49-50)- “तद्भावबद्धरागा ये जनास्ते साधने रताः। तद्योग्यमनुरागौघं प्राप्योत्कण्ठानुसारतः ॥ ता एकशोऽथवा द्वित्राः काले काले व्रजेऽभवन्।” अर्थात् “जो व्रजवासियोंके विशेष भावमें अनुरक्त होकर साधनमें रत होते हैं, वे उत्कण्ठाके अनुरूप उसके योग्य अनुरागको प्राप्त करके अकेले अथवा दो-तीन जन

व्रजमें श्रीकृष्ण-पूर्णतम, मथुरा और द्वारकामें पूर्णतर, तथा परव्योममें पूर्णविग्रह-रूपमें प्रकाशित :- व्रजे कृष्ण-सर्वैश्वर्यप्रकाशे 'पूर्णतम' । पुरीद्वये, परव्योमे- 'पूर्णतर', 'पूर्ण' ॥ 396 ॥

अनुवाद-व्रजमें श्रीकृष्णके समस्त ऐश्वर्यका 'पूर्णतम' प्रकाश है, मथुरा और द्वारकामें 'पूर्णतर' तथा परव्योम वैकुण्ठमें 'पूर्ण' प्रकाश है ॥ 396 ॥

। 287

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (transcription) दिया गया है:

[ 20/396–402      श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— श्रीकृष्ण व्रजमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रकाशित करते हैं, इसलिये व्रजेन्द्रनन्दन 'पूर्णतम' हैं। द्वारका और मथुरा—इन दोनों पुरियोंमें श्रीकृष्ण व्रजकी अपेक्षा न्यूनरूपमें सभी ऐश्वर्योंको प्रकाशित करते हैं, इसलिये वहाँ वे—'पूर्णतर' हैं। परव्योम वैकुण्ठमें श्रीकृष्ण दोनों पुरियोंकी अपेक्षा भी न्यून (स्वल्परूपमें) सब प्रकारके ऐश्वर्योंको प्रकाश करते हैं, इसलिये वहाँ वे—'पूर्ण' हैं॥ 396 ॥ गोस्वामि-वचन :— भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/221-223)— हरिः पूर्णतमः पूर्णतरः पूर्ण इति त्रिधा। श्रेष्ठमध्यादिभिः शब्दैर्नाट्ये यः परिकीर्तितः॥ 397 ॥ प्रकाशिताखिलगुणः स्मृतः पूर्णतमो बुधैः। असर्वव्यञ्जकः पूर्णतरः पूर्णोऽल्पदर्शकः॥ 398 ॥ कृष्णस्य पूर्णतमता व्यक्ताभूद्गोकुलान्तरे। पूर्णता पूर्णतरता द्वारका-मथुरादिषु ॥ 399 ॥ अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 397–399 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— श्रेष्ठ-मध्यादि—शब्दके द्वारा नाट्य शास्त्रमें जिनका कीर्तन है, वही भगवान् हरि—पूर्ण, पूर्णतर और पूर्णतम—इन तीन प्रकारके हैं। अल्पगुणोंके प्रकाशक हरि—पूर्ण हैं; सभी गुणोंके स्वल्पप्रकाशक हरि—पूर्णतर हैं; और जिनमें समस्त गुण प्रकाशित हैं, वे हरि—पूर्णतम हैं; पण्डितजन यही कहते हैं। गोकुलमें श्रीकृष्णकी पूर्णतमता, द्वारका-मथुरामें पूर्णतरता और वैकुण्ठमें पूर्णता व्यक्त होती है॥ 397–399 ॥ बीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— नाट्ये (नाट्यशास्त्रे) श्रेष्ठमध्यादिभिः शब्दैः यः [कीर्तितः, सः] हरिः पूर्णतमः पूर्णतरः पूर्णः इति त्रिधा परिकीर्तितः। प्रकाशिताखिलगुणः (प्रकाशिताः अखिलाः गुणाः यस्मिन् सः, प्रकटित-समग्रगुणः हरिः)—पूर्णतमः; सर्वव्यञ्जकः (स्वल्प-प्रकटित-सर्वगुणः हरिः)—पूर्णतरः; अल्पदर्शकः (प्रकटित-स्वल्पगुणः हरिः) पूर्णः इति बुधैः स्मृतः। गोकुलान्तरे कृष्णस्य पूर्णतमता; द्वारका-मथुरादिषु पूर्णतरता; [परव्योमे] पूर्णता व्यक्ताभूत्। श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 397–399 ॥ एइ कृष्ण—व्रजे ‘पूर्णतम’ भगवान्। आर सब स्वरूप—‘पूर्णतर’, ‘पूर्ण’ नाम ॥ 400 ॥ अनुवाद— श्रीकृष्ण व्रजमें ‘पूर्णतम’ भगवान् हैं और उनके अन्य सभी स्वरूप ‘पूर्णतर’ तथा ‘पूर्ण’ नाम धारण करते हैं॥ 400 ॥ अनुभाष्य— भगवान् व्रजेन्द्रनन्दन—‘पूर्णतम’ प्रकाश हैं, द्वारकानाथ-मथुरेश—पूर्णतर प्रकाश हैं और वैकुण्ठनाथ—‘पूर्ण’ प्रकाश हैं॥ 400 ॥ श्रीकृष्णके स्वरूपका विचार अति संक्षेपमें वर्णित; स्वयं शेषकी भी उसके सम्पूर्ण वर्णनमें असमर्थता :— संक्षेपे कहिलूँ कृष्णेर स्वरूप-विचार। ‘अनन्त’ कहिते नारे इहार विस्तार ॥ 401 ॥ अनुवाद— मैंने संक्षेपमें श्रीकृष्णके स्वरूप-विचारका वर्णन किया है, ‘अनन्त’ भी इसका विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं कर सकते॥ 401 ॥ ग्रन्थकारका दैन्य; शाखा-चन्द्र-न्यायसे वर्णन :— अनन्त स्वरूप कृष्णेर नाहिक गणन। शाखा-चन्द्र-न्याये करि दिग्दरशन ॥” 402 ॥ अनुवाद— श्रीकृष्णके अनन्त स्वरूपोंकी गणना नहीं की जा सकती। मैंने उसका शाखा-चन्द्र-न्यायसे दिग्दर्शन कराया है॥ 402 ॥ अनुभाष्य— ‘शाखा-चन्द्र-न्याय’—मध्यलीला 20/248 संख्या देखें॥ 402 ॥ बीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। 288