श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1731, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/381-390 ] अनुवाद-इस प्रकार श्रीब्रजेन्द्रनन्दन समस्त लीलाओंको गङ्गाकी धाराकी भाँति निरन्तर प्रकट करते रहते हैं॥381॥ किशोर श्रीकृष्णकी ही व्रजलीला :- क्रमे बाल्य-पौगण्ड-कैशोरता प्राप्ति। रास-आदि लीला करे, कैशोरे नित्यस्थिति॥382॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण सर्वप्रथम बाल्य, उसके पश्चात् पौगण्ड और फिर किशोरावस्थाको प्राप्त करते हैं और उनके अनुरूप लीलाएँ करते हैं। कैशोरावस्था आनेपर श्रीकृष्ण सदा उसी अवस्थामें वर्तमान रहते हैं अर्थात् वे कभी भी यौवन, वृद्धावस्थाको प्राप्त नहीं करते। कैशोर अवस्थामें वे रास-लीलादि प्रकाशित करते हैं॥382॥ श्रीकृष्णलीलाके नित्य होनेकी व्याख्या :- 'नित्यलीला' कृष्णेर सर्वशास्त्रे कय। बुझिते ना पारे लीला केमने 'नित्य' हय॥383॥ अनुवाद-सभी शास्त्र कहते हैं कि श्रीकृष्णकी समस्त लीलाएँ 'नित्यलीला' हैं। किन्तु लोग नहीं समझ पाते कि वे कैसे 'नित्य' चलती रहती हैं॥383॥ ज्योतिषचक्र (प्रकाशके गोले)का उदाहरण :- दृष्टान्त दिया कहि, तबे लोक सब जाने। कृष्णलीला-नित्य, ज्योतिश्चक्र-प्रमाणे॥384॥ ज्योतिश्चक्रे सूर्य येन फिरे रात्रि-दिने। सप्तद्वीपाम्बुधि लङ्घि' फिरे क्रमे क्रमे॥385॥ रात्रि-दिने हय षष्ठिदण्ड-परिमाण। तिनसहस्र छयशत 'पल' तार मान॥386॥ अनुवाद-इसलिये मैं एक दृष्टान्त देता हूँ, जिससे लोग उसे जान पायेंगे। ज्योतिषचक्रकी (राशिचक्रकी) भाँति श्रीकृष्णलीला नित्य है। ज्योतिषचक्रमें सूर्य जिस प्रकार रात-दिन घूमता रहता है और सातों द्वीपोंके मध्य समुद्रोंको क्रमशः लाँघता हुआ चलता जाता है। रात और दिनमें कुल मिलाकर साठ दण्ड होते हैं तथा उसमें तीन हजार छः सौ 'पल' होते हैं॥384-386॥ सूर्योदय हैते षष्ठिपल-क्रमोदय। सेइ एक दण्ड, अष्ट दण्डे 'प्रहर' हय॥387॥ अनुवाद-सूर्योदयसे लेकर सूर्य साठ पलके परिमाण समयमें क्रमशः ऊपर उठता जाता है। साठ पलका एक दण्ड होता है और आठ दण्डका एक 'प्रहर' होता है॥387॥ एक-दुइ-तिन-चारि प्रहरे अस्त हय। चारिप्रहर रात्रि गेले पुनः सूर्योदय॥388॥ अनुवाद-एक-दो-तीन-चार प्रहर चलते हुए सूर्य अस्त होता है। चार प्रहर रातके बीत जानेपर पुनः सूर्योदय होता है॥388॥ चौदह मन्वन्तरोंमें समस्त ब्रह्माण्डोंमें अवतार-लीला :- ऐछे कृष्णेर लीला-मण्डल चौद्द मन्वन्तरे। ब्रह्माण्डमण्डल व्यापि' क्रमे क्रमे फिरे॥389॥ अनुवाद-सूर्यके एक मण्डलमें घूमनेके समान श्रीकृष्णकी लीलाका भी एक मण्डल है जिसमें श्रीकृष्णकी लीलाएँ क्रमशः प्रकट होती रहती हैं। चौदह मन्वन्तर-कालमें यह मण्डल सभी ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त होकर क्रमशः घूमता रहता है अर्थात् श्रीकृष्णकी लीलाएँ एकके बाद एक ब्रह्माण्डमें क्रमशः प्रकट होती रहती हैं॥389॥ श्रीकृष्णकी प्रकट-लीलाका समय :- सओयाशत वत्सर कृष्णेर प्रकट-प्रकाश। ताहा यैछे व्रज-पुरे करिला विलास॥390॥ अनुवाद-एक सौ पचीस वर्षों तक श्रीकृष्णकी लीलाका प्रकट-प्रकाश होता है। व्रज और पुर अर्थात् मथुरा एवं द्वारकामें वे प्रकट लीलाका आस्वादन करते हैं॥390॥ । 285