भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1730, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1730

[ 20/373-381 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— विभूतिमत् (ऐश्वर्ययुक्तं) श्रीमत् (सम्पत्तियुक्तम्) ऊर्ज्जितं (बलप्रभावादिना गुणेनातिशयितं) यत् यत् सत्त्वं (प्राकृतं वस्तु) भवति, तत् तत् एव मम तेजोऽशसम्भवं (प्रभावकलया सिद्धं प्रभावस्यांशेन सम्भूतम् इति) त्वम् अवगच्छ (जानीहि)। श्लोक-भावानुवाद-ऐश्वर्ययुक्त, सम्पत्तियुक्त, बल-प्रभावादि अतिशय गुणोंसे युक्त जो-जो प्राकृत वस्तु है, तुम उसे-उसे ही मेरे तेजसे (प्रभावसे) उत्पन्न जानना॥ 373 ॥ अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ 374 ॥ अनुवाद-अथवा हे अर्जुन! इस पृथक्-पृथक् उपदिष्ट ज्ञानसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? तुम मात्र इतना ही जानो कि मैं अपने एकांशसे इस समस्त जगत्को धारणकर अवस्थित हूँ॥ 374 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/20 संख्या देखें ॥ 374 ॥ श्रीकृष्णस्वरूपके छः प्रकारके विलासोंमेंसे बाकी दो प्रकारकी आयुवालेके रूपमें लीला :- एइत' कहिलुँ शक्त्यावेश-अवतार। बाल्य-पौगण्ड-धर्मेर शुनह विचार ॥ 375 ॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने तुम्हें शक्त्यावेश अवतारोंके विषयमें बतलाया। अब तुम श्रीकृष्णके बाल्य-पौगण्ड अवस्था आदिके लक्षणोंको सुनो ॥ 375 ॥ स्वयं श्रीकृष्णके द्वारा लीला-प्रकट करनेसे पहले गुरुवर्गके रूपमें सेवकगणोंको प्रकटित करना :- किशोरशेखर-धर्मी व्रजेन्द्रनन्दन। प्रकटलीला करिबारे यबे करे मन॥ 376 ॥ आदौ प्रकट कराय माता-पिता-भक्तगणे। पाछे प्रकट हय जन्मादिक-लीलाक्रमे ॥ 377 ॥ अनुवाद-व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण किशोरशेखर हैं। जब उनकी लीलाओंको प्रकट करनेकी इच्छा होती है, तब वे पहले माता-पितादि भक्तोंको प्रकट करते हैं और बादमें क्रमशः स्वयं जन्म-बाल्य-पौगण्ड-कैशोर आदि लीलाओंको प्रकट करते हैं ॥ 376-377 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/63) :- वयसो विविधत्वेऽपि सर्वभक्तिरसाश्रयः। धर्मी किशोर एवात्र नित्यलीला-विलासवान् ॥ 378 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 378 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नित्यलीला-विलासवान् सर्वभक्तिरसाश्रय श्रीकृष्णकी अनेक वयस (अवस्थाएँ) रहनेपर भी किशोर अवस्था ही श्रेष्ठ है॥ 378 ॥ अनुभाष्य- वयसः विविधत्वे (बाल्यपौगण्डकैशोरादिप्रकारभेदे) अपि अत्र सर्वभक्तिरसाश्रयः नित्यलीलाविलासवान् किशोरः एव धर्मी (सर्ववयो-धर्मविशिष्टः पूर्णतमः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 378 ॥ प्रत्येक ब्रह्माण्डमें प्रतिक्षणमें वह विचित्र नवनवायमान चिन्मयी लीला :- पूतना-वधादि यत लीला क्षणे क्षणे। सब लीला नित्य प्रकट करे अनुक्रमे ॥ 379 ॥ अनुवाद-पूतना-वधादि जितनी भी लीलाएँ हैं, वे क्षण-क्षणमें चलती रहती हैं। श्रीकृष्ण समस्त लीलाओंको क्रमशः नित्य प्रकट करते रहते हैं॥ 379 ॥ अनन्त ब्रह्माण्ड, तार नाहिक गणन। कोन लीला कोन ब्रह्माण्डे हय प्रकटन ॥ 380 ॥ अनुवाद-इस जगत्में अनन्त ब्रह्माण्ड हैं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। कोई-न-कोई लीला किसी-न-किसी ब्रह्माण्डमें सदा प्रकटित होती ही रहती है॥ 380 ॥ श्रीकृष्णावतारकी लीलाका दृष्टान्त-जैसे निरन्तर गङ्गाकी धारा :- एइमत सब लीला-येन गङ्गाधार। से-से लीला प्रकट करे व्रजेन्द्रकुमार ॥ 381 ॥ 284 |

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