भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1732, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1732

[ 20/391-395 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णावतार-लीलाकी उपमा-जैसे, अलातचक्र-भ्रमण :- अलातचक्रप्राय सेइ लीलाचक्र फिरे। सब लीला ब्रह्माण्डे क्रमे उदय करे॥ 391॥ अनुवाद—जलती हुई मशालको तेजीसे घुमानेपर जैसे एक अटूट अलातचक्र (अग्निका चक्र) दिखलायी देता है, उसी प्रकार ही श्रीकृष्णकी लीलाओंका चक्र चलता है। समस्त लीलाएँ समस्त ब्रह्माण्डोंमें क्रमशः उदित होती रहती हैं॥ 391॥ जन्मसे लेकर मूसल-लीला तककी लीलाएँ :- जन्म, बाल्य, पौगण्ड, कैशोर प्रकाश। पूतना वधादि करि' मौषलान्त विलास ॥ 392॥ असंख्य ब्रह्माण्डोंमें किसी-न-किसी ब्रह्माण्डमें नित्य ही एक-ना-एक लीला वर्तमान, इसलिये लीलाकी 'नित्यता' :- कोन ब्रह्माण्डे कोन लीलार हय अवस्थान। ताते लीला 'नित्य' कहे निगम-पुराण ॥ 393॥ अनुवाद—जन्म, बाल्य, पौगण्ड और कैशोर-अवस्थाको प्रकाशित करते हुए क्रमशः पूतना-वधादि करनेसे लेकर मूसल-लीला (यदुवंशके विनाश) तक श्रीकृष्णकी जितनी लीलाएँ हैं, किसी-न-किसी ब्रह्माण्डमें इनमेंसे कोई-न-कोई लीला चलती ही रहती है, इसलिये वेद और पुराण श्रीकृष्णलीलाको नित्य कहते हैं॥ 392-393॥ सङ्कर्षणके चिद्-वैभव समस्त विष्णुधाम ही विष्णुके समान और हरिके साथ प्रपञ्चमें अवतीर्ण :- गोलोक, गोकुल-धाम- 'विभु' कृष्णसम। कृष्णेच्छाय ब्रह्माण्डगणे ताहार संक्रम॥ 394 ॥ अनुवाद—चिन्मय गोलोक और गोकुल-धाम भी श्रीकृष्णकी भाँति सर्वव्यापक और ऐश्वर्यशाली हैं। श्रीकृष्णकी इच्छासे चिन्मय गोलोक और गोकुल धाम ब्रह्माण्डोंमें श्रीकृष्णके साथ क्रमशः प्रकाशित होते रहते हैं॥ 394॥ ब्रह्माण्डसमूहोंमें अवतारीके साथ उनका गोलोकधाम भी अवतीर्ण :- अतएव गोलोकस्थाने नित्य विहार। ब्रह्माण्डगणे क्रमे प्रकट ताहार ॥ 395॥ अनुवाद—इसलिये श्रीकृष्णकी लीलाएँ नित्य चिन्मय गोलोक-धाममें होती हैं। वही लीलाएँ भौतिक ब्रह्माण्डोंमें क्रमशः प्रकट होती रहती हैं॥ 395॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीला नित्य प्रकट रहती है। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें समय-समयपर क्रमशः नित्यलीला प्रकट होती है। एक ब्रह्माण्डमें श्रीकृष्णजन्म-लीलासे आरम्भ करके 125 वर्षों तक मूसल-लीलाके अन्त तक प्रकट होकर उस ब्रह्माण्डमें लीला अप्रकट हो जाती है। श्रीकृष्णकी एक क्षणकी लीला जब एक ब्रह्माण्डमें समाप्त होती है, तब वही लीला एक अन्य ब्रह्माण्डमें आरम्भ होती है और इस ब्रह्माण्डमें दूसरे क्षणकी लीला आरम्भ हो जाती है। इसी प्रकार असंख्य अनन्त ब्रह्माण्डोंमें प्रतिक्षणसे सम्बन्धित लीला प्रकट होकर अन्य ब्रह्माण्डमें फिर उसी क्षणसे सम्बन्धित लीलाका उदय होता है। इसके उदाहरणमें सूर्यके भ्रमणमार्ग अर्थात् ज्योतिषचक्रमें भ्रमण कहा गया है। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें श्रीकृष्णकी असंख्य लीलाएँ क्रमशः उदित होकर अप्रकट हो रही हैं। जीवके ज्ञानसे उस अनन्त लीलाकी उपलब्धि सम्भव नहीं है। गङ्गाकी धारा जिस प्रकार निरन्तर है, अलातचक्र-भ्रमण जिस प्रकार निरन्तर और व्यापक होता है, उसी प्रकार श्रीकृष्णलीलाका भी निरन्तर प्रकट होना भिन्न-भिन्न ब्रह्माण्डोंमें उपलब्ध होता है। श्रीकृष्णकी जन्म, बाल्य और पौगण्ड-कैशोरादि लीलाएँ नित्यकाल ही संघटित हो रही हैं। किसी एक ब्रह्माण्डमें रहनेवाले जीवोंको श्रीकृष्णलीलाकी नित्य प्रकट होनेकी अनुभूति नहीं होनेपर भी उनकी लीलाकी नित्यता है। सभी लीलाओंके एक समयमें नित्य प्राकट्यका नाम ही 'नित्यलीला' है; किन्तु प्रपञ्चमें क्रमपूर्वक ही लीलाओंका प्राकट्य होता 286 ।

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