भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1733

बीसवाँ अध्याय 20/379-396 ]

है। उस समय अन्यान्य लीलाएँ अन्य ब्रह्माण्डोंमें प्रकट होती हैं, इसलिये किसी एक ब्रह्माण्डमें एक ही समयमें उसका नित्यत्व दिखलायी नहीं देता। वास्तवमें लीला नित्य है; चौदह मन्वन्तर अर्थात् कल्पके निर्दिष्ट कालमें किसी एक ब्रह्माण्डमें क्रमपूर्वक श्रीकृष्णलीला- मण्डल पुनः घूमता है; इसलिये लीला अनित्य नहीं है। अन्य किसी ब्रह्माण्डमें चल रही नित्यलीला हमें दिखलायी नहीं पड़ती, यह कहकर इस ब्रह्माण्डके लोग नित्यलीलाकी उपलब्धि करनेमें समर्थ नहीं होते। इसलिये वेद-पुराणादि नित्यलीलाकी बात ही कहते हैं। गोलोककी नित्य विहारस्थली क्रमशः ब्रह्माण्डोंमें प्रकट होती है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती-ठाकुरने स्वरचित 'रागवर्त्म-चन्द्रिका'के द्वितीय प्रकाशमें उज्ज्वलनीलमणिके 'तद्भावबद्धरागा ये जनास्ते' श्लोककी टीकामें लिखा है—

“अनुरागौघं रागानुगाभजनौत्कण्ठयं, न त्वनुरागस्थायिनं, साधकदेहेऽनुरागोत्पत्त्यसम्भवात्। व्रजेऽभवन्निति अवतारसमये नित्यप्रियाद्या यथा आविर्भवन्ति, तथैव गोपिकागर्भे साधनसिद्धा अपि आविर्भवन्ति। ततश्च गोपिकादेहे उत्पद्यन्ते, पूर्वजन्मनि साधकदेहे तेषां (स्नेहमानप्रणयरागानुरागमहाभावानाम्) उत्पत्त्य- सम्भवात्। ×× साधक-देहभङ्गसमये एव तस्मै प्रेमवते भक्ताय ×× चिदानन्दमयी गोपिकातनुश्च दीयते। सैव तनुर्योगमायया वृन्दावनीयप्रकटप्रकाशे कृष्णपरिवारप्रादुर्भावसमये गोपीगर्भादुद्भाव्यते। नात्र कालविलम्बगन्धोऽपि; प्रकटलीलाया अपि विच्छेदाभावात्। यस्मिन्नेव ब्रह्माण्डे तदानीं वृन्दावनीयलीलानां प्राकट्यं, तत्रैवास्यामेव व्रजभूमौ, अतः साधकप्रेमिभक्तदेहभङ्गसमकालेऽपि सपरिकर श्रीकृष्णप्रादुर्भावः सदैववास्ति, इति भो भो महानुरागिसोत्कण्ठभक्ताः, मा भैष्ट, सुस्थिरास्तिष्ठत, स्वस्त्येवास्ति भवद्भव्यः इति।”

एक साथ समय-समयपर व्रजभूमिमें आविर्भूत होते हैं।” यहाँपर 'अनुरागौघं' अर्थात् रागानुग-भजनोचित उत्कण्ठा-स्थायीभावगत अनुराग नहीं है, क्योंकि साधककी देहमें अनुरागकी उत्पत्ति असम्भव है। 'व्रजेऽभवन्' - व्रजमें आविर्भूत हुए थे, इसका अर्थ यह है कि श्रीकृष्णके अवतार-कालमें नित्यप्रियाएँ जिस प्रकारसे आविर्भूत होती हैं, उसी प्रकार साधनसिद्धगण भी गोपियोंके गर्भसे आविर्भूत होते हैं। उसके बाद (नित्यसिद्धाओंके सङ्गकी महिमासे) उक्त गोपीदेहमें स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, महाभाव समूह उत्पन्न होते हैं, क्योंकि पूर्वजन्ममें (उक्त साधकदेहमें) उनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं होती। साधकदेहके नष्ट होनेके समय ही उस प्रेमवान् भक्तको चिदानन्दमयी गोपी देह प्रदान की जाती है। उसी सिद्धदेहमें ही योगमाया वृन्दावनकी लीलाके 'प्रकट' प्रकाशके समय श्रीकृष्ण परिकरोंके आविर्भावके समय उस भक्तको गोपीके गर्भसे उत्पन्न कराती हैं। यहाँपर कालके विलम्बकी गन्धमात्र भी नहीं है, क्योंकि प्रकट-लीलाका भी विच्छेद नहीं है अर्थात् वह निरन्तर है। जिस किसी ब्रह्माण्डमें ही उनकी वृन्दावनकी लीलाका प्राकट्य हुआ करता है, उसी व्रजभूमिमें ही गोपीके गर्भसे साधनसिद्ध गणोंका आविर्भाव हुआ करता है। इसलिये साधक-प्रेमीभक्तके देहके नष्ट होनेके समयमें भी सपरिकर श्रीकृष्णका आविर्भाव सदा ही हुआ करता है। इसलिये, हे महानुरागी उत्कण्ठायुक्त भक्तगण ! भयभीत मत होना, सुस्थिर होओ, आपका कल्याण निश्चित है ।] ॥ 379-395 ॥

[उज्ज्वलनीलमणि (3/49-50)- “तद्भावबद्धरागा ये जनास्ते साधने रताः। तद्योग्यमनुरागौघं प्राप्योत्कण्ठानुसारतः ॥ ता एकशोऽथवा द्वित्राः काले काले व्रजेऽभवन्।” अर्थात् “जो व्रजवासियोंके विशेष भावमें अनुरक्त होकर साधनमें रत होते हैं, वे उत्कण्ठाके अनुरूप उसके योग्य अनुरागको प्राप्त करके अकेले अथवा दो-तीन जन

व्रजमें श्रीकृष्ण-पूर्णतम, मथुरा और द्वारकामें पूर्णतर, तथा परव्योममें पूर्णविग्रह-रूपमें प्रकाशित :- व्रजे कृष्ण-सर्वैश्वर्यप्रकाशे 'पूर्णतम' । पुरीद्वये, परव्योमे- 'पूर्णतर', 'पूर्ण' ॥ 396 ॥

अनुवाद-व्रजमें श्रीकृष्णके समस्त ऐश्वर्यका 'पूर्णतम' प्रकाश है, मथुरा और द्वारकामें 'पूर्णतर' तथा परव्योम वैकुण्ठमें 'पूर्ण' प्रकाश है ॥ 396 ॥

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