श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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[ 20/396–402 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— श्रीकृष्ण व्रजमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रकाशित करते हैं, इसलिये व्रजेन्द्रनन्दन 'पूर्णतम' हैं। द्वारका और मथुरा—इन दोनों पुरियोंमें श्रीकृष्ण व्रजकी अपेक्षा न्यूनरूपमें सभी ऐश्वर्योंको प्रकाशित करते हैं, इसलिये वहाँ वे—'पूर्णतर' हैं। परव्योम वैकुण्ठमें श्रीकृष्ण दोनों पुरियोंकी अपेक्षा भी न्यून (स्वल्परूपमें) सब प्रकारके ऐश्वर्योंको प्रकाश करते हैं, इसलिये वहाँ वे—'पूर्ण' हैं॥ 396 ॥ गोस्वामि-वचन :— भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/221-223)— हरिः पूर्णतमः पूर्णतरः पूर्ण इति त्रिधा। श्रेष्ठमध्यादिभिः शब्दैर्नाट्ये यः परिकीर्तितः॥ 397 ॥ प्रकाशिताखिलगुणः स्मृतः पूर्णतमो बुधैः। असर्वव्यञ्जकः पूर्णतरः पूर्णोऽल्पदर्शकः॥ 398 ॥ कृष्णस्य पूर्णतमता व्यक्ताभूद्गोकुलान्तरे। पूर्णता पूर्णतरता द्वारका-मथुरादिषु ॥ 399 ॥ अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 397–399 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— श्रेष्ठ-मध्यादि—शब्दके द्वारा नाट्य शास्त्रमें जिनका कीर्तन है, वही भगवान् हरि—पूर्ण, पूर्णतर और पूर्णतम—इन तीन प्रकारके हैं। अल्पगुणोंके प्रकाशक हरि—पूर्ण हैं; सभी गुणोंके स्वल्पप्रकाशक हरि—पूर्णतर हैं; और जिनमें समस्त गुण प्रकाशित हैं, वे हरि—पूर्णतम हैं; पण्डितजन यही कहते हैं। गोकुलमें श्रीकृष्णकी पूर्णतमता, द्वारका-मथुरामें पूर्णतरता और वैकुण्ठमें पूर्णता व्यक्त होती है॥ 397–399 ॥ बीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— नाट्ये (नाट्यशास्त्रे) श्रेष्ठमध्यादिभिः शब्दैः यः [कीर्तितः, सः] हरिः पूर्णतमः पूर्णतरः पूर्णः इति त्रिधा परिकीर्तितः। प्रकाशिताखिलगुणः (प्रकाशिताः अखिलाः गुणाः यस्मिन् सः, प्रकटित-समग्रगुणः हरिः)—पूर्णतमः; सर्वव्यञ्जकः (स्वल्प-प्रकटित-सर्वगुणः हरिः)—पूर्णतरः; अल्पदर्शकः (प्रकटित-स्वल्पगुणः हरिः) पूर्णः इति बुधैः स्मृतः। गोकुलान्तरे कृष्णस्य पूर्णतमता; द्वारका-मथुरादिषु पूर्णतरता; [परव्योमे] पूर्णता व्यक्ताभूत्। श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 397–399 ॥ एइ कृष्ण—व्रजे ‘पूर्णतम’ भगवान्। आर सब स्वरूप—‘पूर्णतर’, ‘पूर्ण’ नाम ॥ 400 ॥ अनुवाद— श्रीकृष्ण व्रजमें ‘पूर्णतम’ भगवान् हैं और उनके अन्य सभी स्वरूप ‘पूर्णतर’ तथा ‘पूर्ण’ नाम धारण करते हैं॥ 400 ॥ अनुभाष्य— भगवान् व्रजेन्द्रनन्दन—‘पूर्णतम’ प्रकाश हैं, द्वारकानाथ-मथुरेश—पूर्णतर प्रकाश हैं और वैकुण्ठनाथ—‘पूर्ण’ प्रकाश हैं॥ 400 ॥ श्रीकृष्णके स्वरूपका विचार अति संक्षेपमें वर्णित; स्वयं शेषकी भी उसके सम्पूर्ण वर्णनमें असमर्थता :— संक्षेपे कहिलूँ कृष्णेर स्वरूप-विचार। ‘अनन्त’ कहिते नारे इहार विस्तार ॥ 401 ॥ अनुवाद— मैंने संक्षेपमें श्रीकृष्णके स्वरूप-विचारका वर्णन किया है, ‘अनन्त’ भी इसका विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं कर सकते॥ 401 ॥ ग्रन्थकारका दैन्य; शाखा-चन्द्र-न्यायसे वर्णन :— अनन्त स्वरूप कृष्णेर नाहिक गणन। शाखा-चन्द्र-न्याये करि दिग्दरशन ॥” 402 ॥ अनुवाद— श्रीकृष्णके अनन्त स्वरूपोंकी गणना नहीं की जा सकती। मैंने उसका शाखा-चन्द्र-न्यायसे दिग्दर्शन कराया है॥ 402 ॥ अनुभाष्य— ‘शाखा-चन्द्र-न्याय’—मध्यलीला 20/248 संख्या देखें॥ 402 ॥ बीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। 288 ।