भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1735

बीसवाँ अध्याय 20/403-404 ] श्रीकृष्णस्वरूप-कीर्त्तन-श्रवणसे तत्त्वज्ञान-स्फूर्त्ति-प्राप्ति :- इहा येइ सुने, पड़े, सेइ भाग्यवान्। कृष्णेर स्वरूपतत्त्वेर हय किछु ज्ञान ॥ 403 ॥ अनुवाद-इसे जो भी सुनता है, पढ़ता है, वही भाग्यवान् है। उसे इससे श्रीकृष्णके स्वरूपतत्त्वका कुछ ज्ञान हो सकता है॥ 403॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 404 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे स्वरूपतत्त्वरूप- श्रीभगवत्-स्वरूपभेदविचारो नाम विंशतितमः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 404॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें स्वरूपतत्त्वरूप- श्रीभगवत्-स्वरूपभेदविचार नामक बीसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 289