श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1718, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/304-308 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ब्रह्मसंहिता (5/49)में :- भास्वान् यथाश्मशकलेषु निजेषु तेजः स्वीयं कियत् प्रकटयत्यपि तद्वदत्र। ब्रह्मा य एष जगदण्डविधानकर्त्ता गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 304 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 304॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सूर्य जिस प्रकार भिन्न-भिन्न पत्थरोंमें (सूर्यकान्त-मणियोंमें) अपने तेजको कुछ परिमाणमें प्रकट करते हैं, उसी प्रकार जो आदिपुरुष गोविन्द किसी जीवमें अपनी शक्ति स्थापित करके 'ब्रह्मा' होकर जगत्की व्यष्टि-सृष्टिका विधान करते हैं, उनका मैं भजन करता हूँ॥ 304॥ अनुभाष्य— यथा भास्वान् (सूर्यः) निजेषु (नित्य-स्वीयत्वेन विख्यातेषु) अश्मशकलेषु अपि (सूर्यकान्ताख्येषु) स्वीयं कियत्तेजः (किञ्चित् प्रभावं) प्रकटयति, तद्वत् यः एषः पुरुषः (गर्भोदशायी) अत्र (ब्रह्माण्डे) ब्रह्मा (सन्) जगदण्डविधानकर्त्ता (ब्रह्माण्डस्य व्यष्टिसृष्टिकर्त्ता,) तं आदिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 304॥ कोन कल्पे यदि योग्य जीव नाहि पाय। आपने ईश्वर तबे अंशे 'ब्रह्मा' हय॥ 305 ॥ अनुवाद—किसी कल्पमें यदि कोई ऐसा योग्य जीव नहीं मिलता, तब गर्भोदशायी विष्णु स्वयं अपने अंशसे 'ब्रह्मा' बन जाते हैं॥ 305॥ अनुभाष्य—'कल्प'—ब्रह्माकी आयुका काल अर्थात् ब्रह्माकी सौ वर्षकी स्थितिका काल। ब्रह्माके एक दिनमें अर्थात् हजार चतुर्युगोंमें 432 करोड़ सौरवर्षोंमें मनुष्यका एक 'कल्प' अर्थात् ब्रह्मदिन होता है। वैसे 360 दिनोंमें एक ब्रह्मवर्ष होता है, वैसे सौ वर्ष ही ब्रह्माकी आयुका काल है॥ 305॥ श्रीमद्भागवत (10/68/37)में :- यस्याङ्घ्रिपङ्कजरजोऽखिललोकपालै- र्मौल्युत्तमैर्धृतमुपासित-तीर्थतीर्थम्। ब्रह्मा भवोऽहमपि यस्य कलाः कलायाः श्रीश्चोद्वहेम चिरमस्य नृपासनं क्व॥ 306 ॥ अनुवाद—(श्रीबलदेव प्रभुने कहा)—सभी लोकपाल समस्त तीर्थोंकी तीर्थस्वरूप जिन कृष्णकी चरणधूलिको अपने मस्तकपर धारण करते हैं और ब्रह्मा, शिव, मैं बलदेव एवं लक्ष्मी—हम कोई उनके अंश अथवा अंशके अंशरूपमें जिनकी चरणधूलिको चिरकालसे धारण कर रहे हैं, उनके लिये साधारण राजसिंहासनका क्या महत्व है?॥ 306॥ अनुभाष्य—आदिलीला 5/141 संख्या देखें॥ 306॥ (2) तमोगुणमें रुद्र; मायासाङ्गिरूपमें गर्भोदशायीका ही रुद्र बनना :- निजांश-कलाय कृष्ण तमो-गुण अङ्गीकारे। संहारार्थे माया-सङ्गे रुद्र-रूप धरे॥ 307 ॥ श्रीकृष्णके स्वांशरूपमें वस्तुतः अभिन्नांश ईश्वर-कोटि होनेपर भी रुद्र—मायासाङ्गके विकारसे जगत्के संहारकके रूपमें विभिन्नांश जीव :- मायासाङ्ग-विकारे रुद्र-भिन्नाभिन्न रूप। जीवतत्त्व-हय, नहे कृष्णेर 'स्वरूप'॥ 308 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 307-308॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्ण अपने अंशकी कलासे तमोगुण अङ्गीकार करके संहार करनेके उद्देश्यसे मायाके सङ्गमें 'रुद्र'रूप धारण करते हैं। मायासङ्गके विकारसे रुद्र-भेदाभेद प्रकाशरूप तत्त्व हैं; इसलिये वे जीवतत्त्वमें गिने जाते हैं, वे श्रीकृष्णके 'स्वरूप' नहीं हैं॥ 307-308॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण अपने सङ्कर्षणरूपके अंश कारणार्णवशायीकी कला गर्भोदकशायी महाविष्णु बनकर तमोगुणको ग्रहण करके जगत्के संहारके लिये गुणावतार 272 |