श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1717, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/297-303 ] मत्स्य, कूर्म, रघुनाथ, नृसिंह, वामन। वराहादि—लेखा याँर ना याय गणन ॥ 298 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके लीलावतारोंकी गणना नहीं की जा सकती। उनमेंसे प्रधान-प्रधानके विषयमें कहकर उनका दिग्दर्शन मात्र करूँगा। मत्स्य, कूर्म, रघुनाथ, नृसिंह, वामन, वराहादि अनेक लीलावतार हैं, जिनकी गणना नहीं की जा सकती ॥ 297-298 ॥ शास्त्र प्रमाण :- श्रीमद्भागवत (10/2/40)में— मत्स्याश्व-कच्छप-नृसिंह-वराह-हंस- राजन्यविप्रविबुधेषु कृतावतारः। त्वं पासि नस्त्रिभुवनञ्च तथाधुनेश भारं भुवो हर यदुत्तम वन्दनं ते ॥ 299 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 299 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आप मत्स्य, हयग्रीव, कच्छप, नृसिंह, वराह, हंस, दाशरथि (राम), परशुराम, वामनादि रूपोंमें विविध अवतार लेकर हम लोगोंकी और तीनों लोकोंका पालन करते हैं; हे यदुत्तम ! हम आपकी वन्दना करते हैं। हे ईश्वर ! अब इस पृथ्वीका भार हरण कीजिये ॥ 299 ॥ अनुभाष्य—देवताओं सहित ब्रह्मा असुरोंके संहारके लिये कंसके कारागारमें स्थित देवकीके गर्भमें विराजमान भगवान् श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं,— हे ईश, त्वं मत्स्याश्वकच्छपवराहनृसिंह-हंसराजन्यविप्रविबुधेषु (मत्स्य-हयग्रीव-कूर्म-वराह-नृसिंह-हंस-दाशरथि-परशुराम-वामनादिषु) [कलारूपेण] कृतावतारः सन् (रूपाणि प्रकाश्य अवतारान् प्रकटयन्, अवतीर्णः सन्) नः (अस्मान् देवान्) त्रिभुवनं (भूर्भुवःस्वरिति स्वर्गमर्त्यपातालान् वा लोकत्रयान्) च (अन्यदा यथा) पासि (रक्षयसि), तथा अधुना [अपि] भुवः (पृथिव्याः) भारम् (अधर्म) हर (नाशय, अस्मान् पाहीत्यर्थः); (अतः) हे यदुत्तम, (यदुकुलश्रेष्ठ,) ते (तुभ्यं) वन्दनं [कूर्मः इति वयं सर्वे त्वां शिरोभिः प्रणमामः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 299 ॥ (ग) तीन गुणावतारोंका वर्णन :- लीलावतारेर कैलुँ दिग्दर्शन। गुणावतारेर एबे शुन विवरण ॥ 300 ॥ अनुवाद—मैंने लीलावतारोंका दिग्दर्शन किया है। अब तुम गुणावतारोंका विवरण सुनो ॥ 300 ॥ तीनजन-तीन कार्योंको करनेवाले :- ब्रह्मा, विष्णु, शिव,—तिन गुण-अवतार। त्रिगुण अङ्गीकरि' करे सृष्ट्यादि-व्यवहार ॥ 301 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 301 ॥ अनुभाष्य—रजः, सत्त्व और तमोगुण—इन तीन गुणोंको अङ्गीकार करके अर्थात् स्वीकार करके जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलयादि कार्यके उद्देश्यसे ब्रह्मा, विष्णु और शिव,—ये तीन गुणावतार हैं ॥ 301 ॥ (1) रजोगुणमें ब्रह्मा,—कभी तो महत्तम जीवका वैराज-ब्रह्मा होना, कभी तो उस भावमें गर्भोदकशायीका ही हिरण्यगर्भ-ब्रह्मा होना :- भक्तिमिश्रकृतपुण्ये कोन जीवोत्तम। रजोगुणे विभावित करि' ताँर मन ॥ 302 ॥ गर्भोदकशायीद्वारा शक्ति सञ्चारि'। व्यष्टि सृष्टि करे कृष्ण ब्रह्मा-रूप धरि' ॥ 303 ॥ अनुवाद—भक्तिमिश्रित-पुण्यके फलसे किसी उत्तम जीवका मन रजोगुणसे विभावित होता है, तब उस भक्तमें गर्भोदकशायी विष्णु अपनी शक्ति सञ्चार करते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णके एक अवतार ब्रह्मा होकर व्यष्टि सृष्टि करते हैं ॥ 302-303 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वे गर्भोदकशायी पुरुषावतार विष्णु-सत्त्व, रजः और तमोगुणका आश्रय करके विष्णु, ब्रह्मा और शिव—ये तीन गुणावतार प्रकाशित करते हैं। उनमेंसे किसी उत्तम जीवको भक्तिमिश्रित-पुण्यके फलसे रजोगुणमें विभावित करके और उसमें अपनी शक्ति सञ्चार करके 'ब्रह्मरूप'में व्यष्टि-सृष्टि करते हैं ॥ 302-303 ॥ । 271