भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1716, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1716

[ 20/289-297 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला परे हैं, इसलिये माया उन्हें स्पर्श भी नहीं कर सकती ॥ 289 ॥ अनुभाष्य-ब्रह्मा और शिवकी भाँति विष्णुमाया विष्णुको आवृत्त नहीं कर सकती। विष्णु गुणातीत वस्तु हैं, इसलिये मायिक गुण उन्हें स्पर्श करनेमें समर्थ नहीं हैं। गुणावतार ब्रह्मा और शिव-मायाके अधीन हैं, किन्तु विष्णु उनके जैसे नहीं हैं; क्योंकि "मायाधीश- मायावश ईश्वरे-जीवे भेद।" अर्थात् मायाधीश ईश्वर और मायावश्य जीवमें भेद है ॥ 289 ॥ (ग) जगत्संहारक रुद्रकी उत्पत्ति :- 'रुद्र'-रूप धरि' करे जगत् संहार। सृष्टि, स्थिति, प्रलय हय इच्छाय याँहार ॥ 290 ॥ अनुवाद-वे द्वितीय पुरुष ही रुद्रका रूप धारण करके जगत्‌का संहार करते हैं। सृष्टि, स्थिति और प्रलय-ये तीनों ही उन द्वितीय पुरुषकी इच्छाके अनुसार होते हैं ॥ 290 ॥ तीन गुणावतारोंमें तीन प्रकारके अधिकार-भाव देना :- ब्रह्मा, विष्णु, शिव-ताँर गुण-अवतार। सृष्टि-स्थिति-प्रलयेर तिनेर अधिकार ॥ 291 ॥ अनुवाद-ब्रह्मा, विष्णु और शिव-ये तीनों द्वितीय पुरुषके गुणावतार हैं। सृष्टि, स्थिति और प्रलयपर क्रमशः इन तीनोंका अधिकार है ॥ 291 ॥ हिरण्यगर्भ अथवा समस्त जीवोंके अन्तर्यामी ये गर्भोदशायी ही ऋक्सूक्तके द्वारा स्तवनीय :- हिरण्यगर्भ-अन्तर्यामी-गर्भोदकशायी। 'सहस्रशीर्षादि' करि' वेदे याँरे गाइ ॥ 292 ॥ अनुवाद-गर्भोदकशायी विष्णु इस ब्रह्माण्डमें हिरण्यगर्भके नामसे कहे जाते हैं और वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके अन्तर्यामी हैं। वेद उनको 'सहस्रशीर्ष आदि' कहकर उनकी स्तुति करते हैं ॥ 292 ॥ अनुभाष्य-ऋक्सूक्त-“सहस्रशीर्ष पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्” [अर्थात् “उन पुरुषके हजारों सिर, नेत्र, चरणादि हैं।"] ॥ 292 ॥ वे भी स्वयं मायाधीश तत्त्व :- एइ त' द्वितीय-पुरुष-ब्रह्माण्डर ईश्वर। माय़ार 'आश्रय' हय, तबु माया-पार ॥ 293 ॥ अनुवाद-ये द्वितीय पुरुष गर्भोदकशायी ही ब्रह्माण्डके ईश्वर हैं। यद्यपि ये मायाके आश्रय हैं, तथापि ये मायाके स्पर्शसे परे हैं ॥ 293 ॥ (3) अनिरुद्धरूपी तृतीय-पुरुषावतार क्षीरोदशायी अथवा गुणावतार विष्णु :- तृतीय-पुरुष विष्णु-'गुण-अवतार'। दुइ अवतार-भितर गणना ताँहार ॥ 294 ॥ अनुवाद-विष्णुके तृतीय पुरुषावतार क्षीरोदकशायी विष्णु हैं। ये जगत् पालनके लिये सत्त्वगुणके नियामकके रूपमें भी अवतीर्ण होते हैं, इसलिये इन्हें गुणावतार भी कहते हैं। इस प्रकार क्षीरोदकशायी विष्णु पुरुषावतार और गुणावतार-इन दोनों अवतारोंमें गिने जाते हैं ॥ 294 ॥ वे ही सभी भूतोंमें अवस्थित अर्थात् विराट अथवा व्यष्टिजीवोंके अन्तर्यामी और पालक :- विराट् व्यष्टि-जीवेर तेंहो अन्तर्यामी। क्षीरोदकशायी, तेंहो-पालनकर्त्ता, स्वामी ॥ 295 ॥ अनुवाद-क्षीरोदकशायी ही भगवान्‌के विराट रूपमें हैं और सभी जीवोंके अन्तर्यामी हैं। वे सभी जीवोंका पालन करनेवाले जगत्‌के स्वामी हैं ॥ 295 ॥ (ख) लीलावतार-वर्णन :- पुरुषावतारेर एइ कैलुँ निरूपण। लीलावतार एबे शुन, सनातन ॥ 296 ॥ अनुवाद-हे सनातन, अब तक मैंने पुरुषावतारोंका निरूपण किया है। अब तुम लीलावतारोंके विषयमें सुनो ॥ 296 ॥ असंख्य लीलावतारोंमें पच्चीस मूर्तियाँ ही मुख्य :- लीलावतार कृष्णेर ना याय गणन। प्रधान करिया कहि दिग्‌दरशन ॥ 297 ॥ 270 |