श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1725, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/340-345 ] अनुवाद—जिनके मुखमें सदा श्रीकृष्ण-वर्ण अर्थात् (कलियुगस्य) एकः महान् गुणः अस्ति; हि (यतः) कृष्णस्य श्रीकृष्णनाम और जिनकी अङ्गकान्ति अकृष्ण अर्थात् कीर्त्तनात् (श्रीहरेः तदीयानां च नामरूपगुणलीलाद्यनुवादात्) एव गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र और पार्षदोंसे मुक्तसङ्गः (अन्याभिलाषवर्जितः ज्ञानकर्माद्यनावृतः च सन्) परं परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय (पञ्चम्-पुरुषार्थं कृष्णप्रेम) व्रजेत् (लभेत)। कृते (सत्ययुगे) यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं॥ 340 ॥ विष्णुं ध्यायतः (हरिध्यानपरस्य जनस्य), त्रेतायां मखैः (यज्ञादिभिः) अनुभाष्य—आदिलीला 3/51 संख्या देखें॥ 340 ॥ यजतः (वैदिकविधानेन अनुष्ठानरतः जनस्य), द्वापरे परिचर्यायां कलियुग-धर्म नामकीर्तनका माहात्म्य :— (पाञ्चरात्रिक-विधानेन अर्चनायां) [यत् फलं लब्धं] तत् (सर्वं) आर तिनयुगे ध्यानादिते येइ फल हय। कलौ हरिकीर्त्तनात् एव [प्राप्नोति]। कलियुगे कृष्णनामे सेइ फल पाय॥ 341 ॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 342-343 ॥ अनुवाद—अन्य तीन युगोंमें ध्यानादिके द्वारा लोग विष्णुपुराण (6/2/17)में, पाद्मोत्तर-खण्ड (72/25)में, जो फल प्राप्त करते हैं, कलियुगमें लोग श्रीकृष्णनामका बृहन्नारदीय (38/97)में :— कीर्तन करनेसे वही फल प्राप्त कर लेते हैं॥ 341 ॥ ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। कलियुगकी प्रशंसा :— यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ 344 ॥ श्रीमद्भागवत (12/3/51-52)में— अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 344 ॥ कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः। अनुभाष्य— कीर्त्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥ 342 ॥ कृते (सत्ययुगे) ध्यायन् (ध्यानानुष्ठानेन), त्रेतायां यज्ञैः कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः। यजन् (यज्ञेश्वरं परितोषयन्), द्वापरे अर्चयन् (श्रीमूर्त्यादिकं द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्त्तनात्॥ 343 ॥ पूजयन्) यत् (फलम्) आप्नोति (लभते) कलौ केशवं अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 342-343 ॥ सङ्कीर्त्य (बहुभिर्मिलित्वा कीर्त्तयन्) तत् [सर्वम् एव भगवत्तोषणरूप- अमृतप्रवाह भाष्य—हे राजन्, दोषोंकी निधि कलिका फलम्] आप्नोति। एक महान् गुण है; कलियुगमें श्रीकृष्ण-कीर्तनसे ही श्लोक-भावानुवाद—सत्ययुगमें ध्यानके अनुष्ठानके जीव प्रगाढ़ बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करता है। सत्ययुगमें द्वारा, त्रेतायुगमें यज्ञके द्वारा यज्ञेश्वरके सन्तोषके विधानके विष्णुका ध्यान करके, त्रेतायुगमें यज्ञके द्वारा याजन द्वारा और द्वापरयुगमें श्रीमूर्तिकी पूजाके द्वारा जो फल करके और द्वापरयुगमें अर्चनादि करके जो फल प्राप्त मिलता है, कलियुगमें केवल भगवान् श्रीकेशवके होता है, कलिकालमें हरिकीर्तनसे वह सब फल प्राप्त सङ्कीर्तन करनेसे वह सब फल अर्थात् भगवद्- होता है॥ 342-343 ॥ सन्तोषरूपी फल प्राप्त हो जाता है॥ 344 ॥ अनुभाष्य—परीक्षितके द्वारा पापमय कलियुगमें मनुष्योंके श्रीमद्भागवत (11/5/36)में :— धर्म और अनर्थोंके नाशके उपायकी जिज्ञासा करनेपर कलिं सभाजयन्त्यार्या गुणज्ञाः सारभागिनः। श्रीशुकदेवने सत्य, त्रेता और द्वापर युगके धर्मका वर्णन यत्र सङ्कीर्त्तनेनैव सर्वस्वार्थोऽभिलभ्यते॥ 345 ॥ एवं कलियुगके असंख्य दोष बतलानेके बाद अध्यायके अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 345 ॥ अन्तमें उसके गुणोंका वर्णन कर रहे हैं— अमृतप्रवाह भाष्य—सभी गुणज्ञ सारग्राही आर्यपुरुष हे राजन्, दोषनिधेः (दोषाणां आधारस्य अपि) कलेः कलिको इसलिये 'धन्य' कहते हैं, क्योंकि सङ्कीर्तनके द्वारा ही कलिकालमें सब प्रकारके स्वार्थोंकी (पुरुषार्थोंकी) प्राप्ति होती है॥ 345 ॥ । 279