भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1724

[ 20/332–340 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

[अर्थात् “त्रेतायुगमें भगवान्‌का श्रीविग्रह लाल रङ्गका होता है। उनके चार भुजाएँ होती हैं और कटिभागमें वे तीन मेखला धारण करते हैं। उनके केश सुनहले होते हैं और वे वेदप्रतिपादित यज्ञके रूपमें रहकर स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञ-पात्रोंको धारण किया करते हैं।”] भाः 11/5/26 श्लोक देखें॥ 332–333 ॥ द्वापरमें श्यामवर्ण द्विभुज भगवान् :— ‘कृष्णपदार्चन’ हय द्वापरेर धर्म। ‘कृष्ण’-वर्णे कराय लोके कृष्णाच्चर्न-कर्म ॥ 334 ॥ अनुवाद—द्वापरयुगका धर्म श्रीकृष्णके चरणोंका अर्चन करना है। भगवान् द्वापरमें श्रीकृष्ण कृष्णवर्ण धारण करके लोगोंसे अपना अर्चन करवाते हैं॥ 334 ॥ श्रीमद्भागवत (11/5/27, 29)में :— द्वापरे भगवान् श्यामः पीतवासा निजायुधः। श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च लक्षणैरुपलक्षितः ॥ 335 ॥ अनुवाद—द्वापरयुगमें भगवान् श्यामवर्ण, पीताम्बर और वंशी आदि निज-आयुधधारी, श्रीवत्सादि चिह्नोंसे युक्त—इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त होते हैं॥ 335 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/39 संख्या देखें। ‘श्याम’—अतसी-कुसुम-सङ्काश वर्ण अर्थात् अतसी-पुष्पके समान वर्ण। सभी द्वापरयुगोंमें स्वयंरूप श्रीकृष्णमूर्तिका अवतार नहीं होता। श्रीविष्णुपुराणमें, श्रीहरिवंशमें और महाभारत आदिमें कहा गया है कि कृष्णावतारके पूर्ववर्ती अन्यान्य द्वापरयुगोंमें भगवान् शुकपत्र-वर्ण अर्थात् हरा-वर्ण आदि ग्रहण करके अंशरूपमें अवतीर्ण हुए थे॥ 335 ॥ नमस्ते वासुदेवाय नमः सङ्कर्षणाय च। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय तुभ्यं भगवते नमः ॥ 336 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 336 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान् वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धको नमस्कार है॥ 336 ॥

अनुभाष्य—‘किस युगमें किस वर्णको धारण करके किस विधिके द्वारा भगवान् पूजित होते हैं?’—विदेहराज निमिके इस प्रकार जिज्ञासा करनेपर नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक करभाजन-ऋषि द्वापरयुगके अवतारका प्रणाम मन्त्र बतला रहे हैं— [चतुर्व्यूहात्मकस्य भगवतः नामान्याह—] भगवते वासुदेवाय ते (तुभ्यं) नमः; सङ्कर्षणाय नमः प्रद्युम्नाय अनिरुद्धाय च तुभ्यं नमः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 336 ॥ एइ मन्त्रे द्वापरे करे कृष्णाच्चर्न। ‘कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन’—कलियुगेर धर्म ॥ 337 ॥ अनुवाद—उपरोक्त मन्त्रके द्वारा द्वापरमें लोग श्रीकृष्णका अर्चन करते हैं। कलियुगका धर्म श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तन है॥ 337 ॥ कलियुगमें पीतवर्ण नाम-प्रेम-प्रचारक द्विभुज भगवान् :— ‘पीत’-वर्ण धरि’ तबे कैला प्रवर्त्तन। प्रेमभक्ति दिला लोके लञा भक्तगण ॥ 338 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 338 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णने पीतवर्ण धारण करके कलियुगेके धर्म श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तनका प्रवर्तन एवं भक्तोंके साथ लेकर लोगोंको श्रीकृष्ण-प्रेमभक्ति प्रदान की॥ 338 ॥ कलिमें स्वयं श्रीकृष्ण ही अवतारीके रूपमें अवतीर्ण :— धर्म प्रवर्त्तन करे व्रजेन्द्रनन्दन। प्रेमे गाय, नाचे लोक, करे सङ्कीर्त्तन ॥ 339 ॥ अनुवाद—व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही कलियुगके धर्मका प्रवर्त्तन करते हैं। वे प्रेमसे गाते और नृत्य करते हैं तथा सभी उनके साथ गाते हुए सङ्कीर्तन करते हैं॥ 339 ॥ श्रीमद्भागवत (11/5/32)में :— कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्। यज्ञैः सङ्कीर्त्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥ 340 ॥

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