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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 20/332–340 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

[अर्थात् “त्रेतायुगमें भगवान्‌का श्रीविग्रह लाल रङ्गका होता है। उनके चार भुजाएँ होती हैं और कटिभागमें वे तीन मेखला धारण करते हैं। उनके केश सुनहले होते हैं और वे वेदप्रतिपादित यज्ञके रूपमें रहकर स्रुक्, स्रुवा आदि यज्ञ-पात्रोंको धारण किया करते हैं।”] भाः 11/5/26 श्लोक देखें॥ 332–333 ॥ द्वापरमें श्यामवर्ण द्विभुज भगवान् :— ‘कृष्णपदार्चन’ हय द्वापरेर धर्म। ‘कृष्ण’-वर्णे कराय लोके कृष्णाच्चर्न-कर्म ॥ 334 ॥ अनुवाद—द्वापरयुगका धर्म श्रीकृष्णके चरणोंका अर्चन करना है। भगवान् द्वापरमें श्रीकृष्ण कृष्णवर्ण धारण करके लोगोंसे अपना अर्चन करवाते हैं॥ 334 ॥ श्रीमद्भागवत (11/5/27, 29)में :— द्वापरे भगवान् श्यामः पीतवासा निजायुधः। श्रीवत्सादिभिरङ्कैश्च लक्षणैरुपलक्षितः ॥ 335 ॥ अनुवाद—द्वापरयुगमें भगवान् श्यामवर्ण, पीताम्बर और वंशी आदि निज-आयुधधारी, श्रीवत्सादि चिह्नोंसे युक्त—इस प्रकारके लक्षणोंसे युक्त होते हैं॥ 335 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 3/39 संख्या देखें। ‘श्याम’—अतसी-कुसुम-सङ्काश वर्ण अर्थात् अतसी-पुष्पके समान वर्ण। सभी द्वापरयुगोंमें स्वयंरूप श्रीकृष्णमूर्तिका अवतार नहीं होता। श्रीविष्णुपुराणमें, श्रीहरिवंशमें और महाभारत आदिमें कहा गया है कि कृष्णावतारके पूर्ववर्ती अन्यान्य द्वापरयुगोंमें भगवान् शुकपत्र-वर्ण अर्थात् हरा-वर्ण आदि ग्रहण करके अंशरूपमें अवतीर्ण हुए थे॥ 335 ॥ नमस्ते वासुदेवाय नमः सङ्कर्षणाय च। प्रद्युम्नायानिरुद्धाय तुभ्यं भगवते नमः ॥ 336 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 336 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान् वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धको नमस्कार है॥ 336 ॥

अनुभाष्य—‘किस युगमें किस वर्णको धारण करके किस विधिके द्वारा भगवान् पूजित होते हैं?’—विदेहराज निमिके इस प्रकार जिज्ञासा करनेपर नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक करभाजन-ऋषि द्वापरयुगके अवतारका प्रणाम मन्त्र बतला रहे हैं— [चतुर्व्यूहात्मकस्य भगवतः नामान्याह—] भगवते वासुदेवाय ते (तुभ्यं) नमः; सङ्कर्षणाय नमः प्रद्युम्नाय अनिरुद्धाय च तुभ्यं नमः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 336 ॥ एइ मन्त्रे द्वापरे करे कृष्णाच्चर्न। ‘कृष्णनाम-सङ्कीर्त्तन’—कलियुगेर धर्म ॥ 337 ॥ अनुवाद—उपरोक्त मन्त्रके द्वारा द्वापरमें लोग श्रीकृष्णका अर्चन करते हैं। कलियुगका धर्म श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तन है॥ 337 ॥ कलियुगमें पीतवर्ण नाम-प्रेम-प्रचारक द्विभुज भगवान् :— ‘पीत’-वर्ण धरि’ तबे कैला प्रवर्त्तन। प्रेमभक्ति दिला लोके लञा भक्तगण ॥ 338 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 338 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णने पीतवर्ण धारण करके कलियुगेके धर्म श्रीकृष्णनाम-सङ्कीर्तनका प्रवर्तन एवं भक्तोंके साथ लेकर लोगोंको श्रीकृष्ण-प्रेमभक्ति प्रदान की॥ 338 ॥ कलिमें स्वयं श्रीकृष्ण ही अवतारीके रूपमें अवतीर्ण :— धर्म प्रवर्त्तन करे व्रजेन्द्रनन्दन। प्रेमे गाय, नाचे लोक, करे सङ्कीर्त्तन ॥ 339 ॥ अनुवाद—व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण ही कलियुगके धर्मका प्रवर्त्तन करते हैं। वे प्रेमसे गाते और नृत्य करते हैं तथा सभी उनके साथ गाते हुए सङ्कीर्तन करते हैं॥ 339 ॥ श्रीमद्भागवत (11/5/32)में :— कृष्णवर्णं त्विषाऽकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम्। यज्ञैः सङ्कीर्त्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥ 340 ॥

278 ।

बीसवाँ अध्याय 20/340-345 ] अनुवाद—जिनके मुखमें सदा श्रीकृष्ण-वर्ण अर्थात् (कलियुगस्य) एकः महान् गुणः अस्ति; हि (यतः) कृष्णस्य श्रीकृष्णनाम और जिनकी अङ्गकान्ति अकृष्ण अर्थात् कीर्त्तनात् (श्रीहरेः तदीयानां च नामरूपगुणलीलाद्यनुवादात्) एव गौर है, उन्हीं अङ्ग, उपाङ्ग, अस्त्र और पार्षदोंसे मुक्तसङ्गः (अन्याभिलाषवर्जितः ज्ञानकर्माद्यनावृतः च सन्) परं परिवेष्टित महापुरुषकी बुद्धिमान् व्यक्ति सङ्कीर्तनप्राय (पञ्चम्-पुरुषार्थं कृष्णप्रेम) व्रजेत् (लभेत)। कृते (सत्ययुगे) यज्ञके द्वारा पूजा करते हैं॥ 340 ॥ विष्णुं ध्यायतः (हरिध्यानपरस्य जनस्य), त्रेतायां मखैः (यज्ञादिभिः) अनुभाष्य—आदिलीला 3/51 संख्या देखें॥ 340 ॥ यजतः (वैदिकविधानेन अनुष्ठानरतः जनस्य), द्वापरे परिचर्यायां कलियुग-धर्म नामकीर्तनका माहात्म्य :— (पाञ्चरात्रिक-विधानेन अर्चनायां) [यत् फलं लब्धं] तत् (सर्वं) आर तिनयुगे ध्यानादिते येइ फल हय। कलौ हरिकीर्त्तनात् एव [प्राप्नोति]। कलियुगे कृष्णनामे सेइ फल पाय॥ 341 ॥ श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 342-343 ॥ अनुवाद—अन्य तीन युगोंमें ध्यानादिके द्वारा लोग विष्णुपुराण (6/2/17)में, पाद्मोत्तर-खण्ड (72/25)में, जो फल प्राप्त करते हैं, कलियुगमें लोग श्रीकृष्णनामका बृहन्नारदीय (38/97)में :— कीर्तन करनेसे वही फल प्राप्त कर लेते हैं॥ 341 ॥ ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्। कलियुगकी प्रशंसा :— यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ 344 ॥ श्रीमद्भागवत (12/3/51-52)में— अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 344 ॥ कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः। अनुभाष्य— कीर्त्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥ 342 ॥ कृते (सत्ययुगे) ध्यायन् (ध्यानानुष्ठानेन), त्रेतायां यज्ञैः कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः। यजन् (यज्ञेश्वरं परितोषयन्), द्वापरे अर्चयन् (श्रीमूर्त्यादिकं द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्त्तनात्॥ 343 ॥ पूजयन्) यत् (फलम्) आप्नोति (लभते) कलौ केशवं अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 342-343 ॥ सङ्कीर्त्य (बहुभिर्मिलित्वा कीर्त्तयन्) तत् [सर्वम् एव भगवत्तोषणरूप- अमृतप्रवाह भाष्य—हे राजन्, दोषोंकी निधि कलिका फलम्] आप्नोति। एक महान् गुण है; कलियुगमें श्रीकृष्ण-कीर्तनसे ही श्लोक-भावानुवाद—सत्ययुगमें ध्यानके अनुष्ठानके जीव प्रगाढ़ बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करता है। सत्ययुगमें द्वारा, त्रेतायुगमें यज्ञके द्वारा यज्ञेश्वरके सन्तोषके विधानके विष्णुका ध्यान करके, त्रेतायुगमें यज्ञके द्वारा याजन द्वारा और द्वापरयुगमें श्रीमूर्तिकी पूजाके द्वारा जो फल करके और द्वापरयुगमें अर्चनादि करके जो फल प्राप्त मिलता है, कलियुगमें केवल भगवान् श्रीकेशवके होता है, कलिकालमें हरिकीर्तनसे वह सब फल प्राप्त सङ्कीर्तन करनेसे वह सब फल अर्थात् भगवद्- होता है॥ 342-343 ॥ सन्तोषरूपी फल प्राप्त हो जाता है॥ 344 ॥ अनुभाष्य—परीक्षितके द्वारा पापमय कलियुगमें मनुष्योंके श्रीमद्भागवत (11/5/36)में :— धर्म और अनर्थोंके नाशके उपायकी जिज्ञासा करनेपर कलिं सभाजयन्त्यार्या गुणज्ञाः सारभागिनः। श्रीशुकदेवने सत्य, त्रेता और द्वापर युगके धर्मका वर्णन यत्र सङ्कीर्त्तनेनैव सर्वस्वार्थोऽभिलभ्यते॥ 345 ॥ एवं कलियुगके असंख्य दोष बतलानेके बाद अध्यायके अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 345 ॥ अन्तमें उसके गुणोंका वर्णन कर रहे हैं— अमृतप्रवाह भाष्य—सभी गुणज्ञ सारग्राही आर्यपुरुष हे राजन्, दोषनिधेः (दोषाणां आधारस्य अपि) कलेः कलिको इसलिये 'धन्य' कहते हैं, क्योंकि सङ्कीर्तनके द्वारा ही कलिकालमें सब प्रकारके स्वार्थोंकी (पुरुषार्थोंकी) प्राप्ति होती है॥ 345 ॥ । 279

[ 20/345-353 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य—विदेहराज निमिके द्वारा 'किस युगमें किस वर्णको धारण करके किस-किस विधिके द्वारा श्रीभगवान् पूजित होते हैं?'-इस विषयमें जिज्ञासा करनेपर नवयोगेन्द्रोंमेंसे एक करभाजन-ऋषि कलियुगमें भावी अवतारी श्रीगौरसुन्दरको प्रणाम करके कलियुगके गुण और माहात्म्यका वर्णन कर रहे हैं— यत्र (कलौ) सङ्कीर्त्तनेन (कीर्त्तनाख्य-भक्त्यनुष्ठानेन) एव सर्वः स्वार्थः (सर्वपुरुषार्थः) अभिलभ्यते (सर्वतोभावेन प्राप्यते) [अतः इति] गुणज्ञाः (कलेर्गुणं जानन्ति ये ते) आर्याः (महात्मानः) सारभागिनः (गुणांशग्राहिणः) [तं] कलिं सभाजयन्ति (अर्चयन्ति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 345 ॥ पूर्ववत् लिखि यबे गुणावतारगण। असंख्य संख्या ताँर, ना हय गणन ॥ 346 ॥ अनुवाद—जैसा कि मैंने गुणावतारोंका वर्णन करते हुए कहा था, वैसे ही युगावतारोंको भी असंख्य मानना चाहिये, इनकी भी गणना नहीं की जा सकती ॥ 346 ॥ श्रीगौरलीला-तत्त्वज्ञ, श्रीकृष्णभजनमें चतुर सनातन :— चारियुगावतारे एइ त' गणन।” शुनि' भङ्गि करि' ताँरे पुछे सनातन ॥ 347 ॥ अनुवाद—इस प्रकार मैंने चारों युगोंके अवतारोंका वर्णन किया है।” महाप्रभुकी बातें सुनकर श्रीसनातन गोस्वामीने परोक्षरूपमें इङ्गित करते हुए उनसे पूछा ॥ 347 ॥ स्वयं महाप्रभुके श्रीमुखसे महाप्रभुके अवतारके उद्देश्यकी निर्भीक जिज्ञासा :— राजमन्त्री सनातन-बुद्धये बृहस्पति। प्रभुर कृपाते पुछे असङ्कोच-मति ॥ 348 ॥ “अति क्षुद्र जीव मुञि नीच, नीचाचार। केमने जानिब कलिते कोन् अवतार?” ॥ 349 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी राजमन्त्री थे, वे देवताओंके गुरु बृहस्पतिके समान बुद्धिमान थे। महाप्रभुकी कृपासे उन्होंने निःसङ्कोच होकर महाप्रभुसे पूछा,-“मैं अत्यन्त क्षुद्र जीव हूँ, नीच हूँ और नीच आचरण करनेवाला हूँ। मैं कैसे जानूँगा कि कलियुगमें कौन अवतार है?” ॥ 348-349 ॥ महाप्रभुके द्वारा कलियुगके अवतारका परिचय देना :— प्रभु कहे,-“अन्यावतार शास्त्रद्वारा जानि। कलिते अवतार तैछे शास्त्रद्वारा मानि ॥ 350 ॥ शास्त्रके आलोकमें ही भगवद्-ज्ञानकी प्राप्ति :— सर्वज्ञ मुनिर वाक्य—शास्त्र-'प्रमाण'। आमा-सबा जीवेर हय शास्त्रद्वारा 'ज्ञान' ॥ 351 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, - “जिस प्रकार शास्त्रके द्वारा अन्य युगोंके अवतारोंके विषयमें जाना जाता है, उसी प्रकार कलियुगके अवतारके विषयमें भी शास्त्रके वचनोंके द्वारा ही जानना चाहिये। सर्वज्ञ मुनि (श्रीव्यासदेव) के द्वारा प्रकाशित शास्त्र ही प्रमाण हैं। शास्त्रोंके द्वारा ही सब जीवोंको ज्ञानकी प्राप्ति होती है ॥ 350-351 ॥ परोक्षवाद ही अवतारको प्रिय; लक्षणोंके द्वारा तत्त्वको जाननेवालोंके द्वारा वस्तु-निर्देश :— अवतार नाहि कहे,–‘आमि अवतार’। मुनि सब जानि' करे लक्षण-विचार ॥ 352 ॥ अनुवाद—अवतार स्वयं नहीं कहते,-'मैं अवतार हूँ।' श्रीव्यासमुनि सबकुछ जानते हैं, इसलिये उन्होंने अवतारोंके लक्षणोंका शास्त्रोंमें वर्णन किया है ॥ 352 ॥ जीवके लिये दुःसाध्य; अतिशय वीर्यके द्वारा विष्णुत्तत्त्वकी उपलब्धि :— श्रीमद्भागवत (10/10/34)में— यस्यावतारा ज्ञायन्ते शरीरिष्वशरीरिणः। तैस्तैस्तुल्यातिशयैर्वीर्यैर्देहिष्वसङ्गतैः ॥ 353 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 353 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-प्राकृत-शरीररहित अप्राकृत शरीरी परमेश्वरका अवतार-तत्त्व जीवोंके लिये दुःसाध्य है; अतुल, अतिशय और अलौकिक वीर्यके द्वारा ही उस 280 |

बीसवाँ अध्याय 20/353-358 ] प्रकार आपके अवतारोंके विषयमें कुछ ज्ञान होता है॥ 353 ॥ अनुभाष्य-जब श्रीकृष्णने कृपा प्रकाशित करते हुए अर्जुनके युगल वृक्षोंको गिरा दिया, तब कुबेरके दो पुत्र नलकुबेर और मणिग्रीव श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं- देहिषु (जीवेषु) असङ्गतैः (दुष्प्राप्यैः) अतुल्यातिशयैः (नास्ति तुल्यम् अतिशयम् आधिक्यं येभ्यः तैः) तैः तैः वीर्यैः (विभवैः) शरीरिषु (प्रपञ्चे देहिषु जीवेषु मध्ये) अशरीरिणः (प्राकृतशरीरवर्जितस्य अपि) यस्य (तव) अवताराः ज्ञायन्ते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 353 ॥ स्वरूप और तटस्थ लक्षणकी संज्ञा :- 'स्वरूप'-लक्षण, आर 'तटस्थ-लक्षण'। एइ दुइ लक्षणे 'वस्तु' जाने मुनिगण ॥ 354 ॥ आकृति, प्रकृति, स्वरूप, स्वरूप-लक्षण। कार्यद्वारा ज्ञान,-एइ तटस्थ-लक्षण ॥ 355 ॥ अनुवाद- 'स्वरूप'-लक्षण और 'तटस्थ'-लक्षण-इन दो लक्षणोंके द्वारा मुनिगण 'वस्तु'के विषयमें जानते हैं। आकृति, प्रकृति और स्वरूप-ये स्वरूप लक्षण हैं तथा कार्यके द्वारा जो ज्ञान होता है, उसे तटस्थ-लक्षण कहते हैं ॥ 354-355 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'आकृति'-आकार; 'प्रकृति'- स्वभाव; 'स्वरूप'-मूर्ति; 'स्वरूपलक्षण'-उस विग्रहका व्यवहार; 'तटस्थ लक्षण'-कार्यके द्वारा ज्ञान ॥ 355 ॥ अनुभाष्य-आकृति, प्रकृति और स्वरूप,-ये तीन ही 'स्वरूप' अथवा 'मुख्य' लक्षण हैं। कार्यके द्वारा ज्ञान ही 'तटस्थ' अथवा 'गौण' लक्षण है ॥ 355 ॥ श्रीमद्भागवतमें (1/1/1) श्लोकके मङ्गलाचरणके प्रारम्भमें स्वरूप और तटस्थ लक्षणसे परमेश्वर श्रीकृष्णका निरूपण :- भागवतारम्भे व्यास मङ्गलाचरणे। 'परमेश्वर' निरूपिल एइ दुइ लक्षणे ॥ 356 ॥ अनुवाद- श्रीमद्भागवतके आरम्भमें श्रीव्यासदेवने मङ्गलाचरणमें इन लक्षणोंके आधारपर ही 'परमेश्वर'का निरूपण किया है ॥ 356 ॥ अनुभाष्य-भागवतके 'जन्माद्यस्य' श्लोकमें 'सत्यं' और 'परं' नामक दो शब्द स्वरूप-लक्षण एवं विश्व-सृष्टि-स्थिति-लय, ब्रह्माके हृदयमें वस्तुज्ञान प्रकट करना और अर्थाभिज्ञता आदि तटस्थ लक्षण व्यक्त करके परमेश्वरका निरूपण किया गया है ॥ 356 ॥ श्रीमद्भागवत (1/1/1)में :- जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः। तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ 357 ॥ अनुवाद-इस विश्वका जन्म, स्थिति और लय जिससे होता है, ऐसा कहनेसे जो तत्त्व निश्चित हुआ है, अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा विचार करनेपर जो समस्त अर्थ अथवा कार्यमें एकमात्र परम 'ज्ञ-तत्त्व' अर्थात् 'स्वरूपतत्त्व' कहलाकर स्थिर होते हैं; जो दृश्यमान जगत्में एकमात्र स्वराट् अर्थात् स्वतन्त्र राजा हैं; जिन्होंने आदिकवि ब्रह्माको अन्तर्यामीके रूपमें ब्रह्मतत्त्वकी शिक्षा दी है; जिनके विषयमें समस्त बुद्धिमान पण्डितोंमें बारम्बार मोह उत्पन्न होता है; जिनसे अग्नि, जल और मिट्टी आदि भूतोंका विनिमय अर्थात् पृथक् रूपमें सत्ता है; जिनसे तीन प्रकारकी सृष्टि अर्थात् चिद्-उदयरूप सृष्टि, जीव-प्रकाट्यरूप सृष्टि और मायिक-ब्रह्माण्डरूप सृष्टि-सत्यरूपमें वर्तमान है; स्वरूपशक्तिके द्वारा नित्य-कपट-शून्य परमसत्य-तत्त्वरूप उन श्रीकृष्णका हम ध्यान करते हैं ॥ 357 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/266 संख्या देखें ॥ 357 ॥ इस प्रथम श्लोकमें परमेश्वरका (1) स्वरूप लक्षण :- एइ श्लोके 'परं'-शब्दे 'कृष्ण'-निरूपण। 'सत्यं' शब्दे कहे ताँर स्वरूप-लक्षण ॥ 358 ॥ । 281

[ 20/358-366 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इस श्लोकमें 'परं' शब्दके द्वारा श्रीकृष्णका निरूपण और 'सत्यं' शब्दके द्वारा उनके स्वरूप लक्षणको बतलाया गया है॥358॥ (2) तटस्थ लक्षण :- विश्वसृष्ट्यादि कैल, वेद ब्रह्माके पड़ाइल। अर्थाभिज्ञता, स्वरूपशक्त्ये माया दूर कैल॥359॥ एइसब कार्य—ताँर तटस्थ-लक्षण। अन्य अवतार ऐछे जाने मुनिगण॥360॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण विश्वकी सृष्टि-स्थिति-प्रलयादि करते हैं, उन्होंने ब्रह्माको वेद पढ़ाया, उन्हें पूर्ण प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ज्ञान है तथा उन्होंने स्वरूपशक्तिके प्रभावसे मायाको दूर रखा है—ये सब कार्य उनके तटस्थ लक्षण हैं। मुनिगण इन्हीं स्वरूप और तटस्थ लक्षणोंके द्वारा श्रीकृष्ण और अन्यान्य सभी अवतारोंके विषयमें भी जान लेते हैं॥359-360॥ जाननेवालोंके द्वारा उक्त दो लक्षणोंके द्वारा ही सभी अवतारोंका निर्णय :- अवतारकाले हय जगतेर गोचर। एइ दुइ लक्षणे केह जानेन ईश्वर॥”361॥ अनुवाद—भगवान् जब अवतार लेते हैं तो वे जगत्में जीवोंके दृष्टिगोचर तो होते हैं, परन्तु उपरोक्त स्वरूप और तटस्थ, इन दो लक्षणोंके द्वारा कुछ भक्त ही उन्हें ईश्वरके रूपमें जान पाते हैं॥”361॥ भजनमें चतुर भक्तोंके निकट भगवान्‌का गुप्त स्वभाव व्यक्त :- सनातन कहे,—“याते ईश्वर-लक्षण। पीतवर्ण, कार्य—प्रेमदान-सङ्कीर्त्तन॥362॥ सनातनके द्वारा महाप्रभुकी लीलाकी व्याख्याको श्रवण करनेकी अभिलाषा :- कलिकाले सेइ 'कृष्णावतार' निश्चय। सुदृढ़ करिया कह, याउक संशय॥”363॥ अनुवाद—श्रीसनातनने कहा,—“जिनमें ईश्वरके लक्षण हैं, वे पीतवर्णके हैं और जो श्रीकृष्णनाम सङ्कीर्त्तनके द्वारा जीवोंमें श्रीकृष्णप्रेमका दान करते हैं, कलिकालमें वह श्रीकृष्णकावतार अवश्य ही होगा। आप मुझे निश्चित रूपसे बतलाइये, जिससे मेरे सभी संशय दूर हो जाँय॥”362-363॥ अनुभाष्य—कलिकालमें युगावतारका स्वरूप- लक्षण—पीतवर्ण आकार है, तटस्थ-लक्षण—प्रेमदान और सङ्कीर्त्तनरूपी कार्य है॥362॥ भक्तकी जीत, भगवान्‌की पराजय :- प्रभु कहे,—“चतुरालि छाड़, सनातन। शक्त्यावेशावताररे शुन विवरण॥364॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन, अपनी चतुरायी छोड़ो और अब शक्त्यावेशावतारोंका वर्णन सुनो॥364॥ अनुभाष्य—'चतुरालि'—कौशलसे मनोगत अभिप्रायको स्थापित करना, निपुणता-प्रदर्शित करना, बुद्धिमत्ता प्रकाशित करना॥364॥ श्रीकृष्णके छः प्रकारके विलास और तीन प्रकारके रूपोंमेंसे एक (ग) शक्त्यावेशावतारका वर्णन :- शक्त्यावेशावतार कृष्णेर असंख्य गणन। दिग्दर्शन करि मुख्य मुख्य जन॥365॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके असंख्य शक्त्यावेशावतार हैं, मैं केवल मुख्य-मुख्य शक्त्यावेशावतारोंका वर्णन करके उनका दिग्दर्शन कराऊँगा॥365॥ दो प्रकारके शक्त्यावेश—साक्षात् शक्त्याविष्ट मुख्य- 'अवतार' और शक्त्याभासाविष्ट गौण-'विभूति' संज्ञा :- शक्त्यावेश दुइरूप—'मुख्य', 'गौण' देखि। साक्षात्शक्त्ये 'अवतार', आभासे 'विभूति' लिखि॥366॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥366॥ 282 ।

बीसवाँ अध्याय 20/366-373 ] अमृतप्रवाह भाष्य—'शक्त्यावेश'—ये गौण और मुख्यके भेदसे दो प्रकारके होते हैं। जिनमें साक्षात् शक्तिका अवतार होता है,—वे मुख्यशक्त्यावेश-अवतार हैं। और जिनमें शक्तिका आभासमात्र विभूतिके रूपमें देखा जाता है, वे गौणशक्त्यावेश-अवतार हैं॥ 366॥

  1. मुख्यावेशावतारोंके नाम :- 'सनकादि', 'नारद', 'पृथु', 'परशुराम'। जीवरूप 'ब्रह्मा' आवेशावतार-नाम॥ 367॥ अनुवाद—सनकादि, नारद, पृथु, परशुराम और जीवरूप ब्रह्मा शक्त्यावेश-अवतार कहलाते हैं॥ 367॥ वैकुण्ठे 'शेष'—धरा धरये 'अनन्त'। एइ मुख्यावेशावतार—विस्तारे नाहि अन्त॥ 368॥ अनुवाद—वैकुण्ठमें 'शेष' और अपने फणोंपर धरतीको धारण करनेवाले 'अनन्त'—ये मुख्य शक्त्यावेशावतार हैं। मुख्य शक्त्यावेशावतारोंकी भी संख्याका कोई अन्त नहीं है॥ 368॥ मुख्यशक्तिके भेदसे मुख्य-आवेशावतारगण :- सनकाद्ये 'ज्ञान'-शक्ति, नारदे शक्ति 'भक्ति'। ब्रह्माय 'सृष्टि'-शक्ति, अनन्ते 'भू-धारण'-शक्ति॥ 369॥ शेषे 'स्व-सेवन'-शक्ति, पृथुते 'पालन'। परशुरामे 'दुष्टनाश-वीर्यसञ्चारण'॥ 370॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने सनकादि चतुःसनमें 'ज्ञान'-शक्तिका, नारदमें 'भक्ति'-शक्तिका, ब्रह्मामें 'सृष्टि'-शक्तिका, अनन्तमें 'भू-धारण'-शक्तिका, शेषमें 'अपनी-सेवा'-शक्तिका, पृथुमें पृथ्वीकी 'पालन'-शक्तिका और परशुराममें 'दुष्ट-विनाशक'-शक्तिका आवेश किया है॥ 369-370॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'शेषे स्व-सेवन'-शक्ति'—शेषरूपी भगवदवतारमें अपनी सेवारूपी शक्ति अर्पित हुई है॥ 370॥ आवेशावतारकी संज्ञा :- लघुभागवतामृत (1/1/18)के आवेशप्रकरणमें— ज्ञानशक्त्यादिकलया यत्राविष्टो जनार्दनः। त आवेशा निगद्यन्ते जीवा एव महत्तमाः॥ 371॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 371॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानशक्ति आदि कलाके द्वारा जिनमें भगवद्-आवेश है, उन सभी महत्तम (महान व्यक्तियोंमें श्रेष्ठ) जीवोंकी 'आवेश-अवतार'के रूपमें गणना की जाती है॥ 371॥ अनुभाष्य— यत्र (महत्तमेषु जीवेषु) ज्ञानशक्त्यादिकलया (ज्ञान-भक्ति- सृष्टि-सेवन-पालन-धारण-विनाशनादि-भागेन) जनार्दनः आविष्टः, ते महत्तमाः जीवाः एव 'आवेशाः' (आवेशावताराः) निगद्यन्ते (कथ्यन्ते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 371॥ (2) गीतामें विभूतिका वर्णन :- 'विभूति' कहिये यैछे गीता-एकादशे। जगत् व्यापिल कृष्णशक्त्याभासावेशे॥ 372॥ अनुवाद—गीताके ग्यारहवें अध्यायमें वर्णित श्रीकृष्णके सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्तरूपमें भगवान्की जिन विभूतियोंका वर्णन किया गया है, उनको 'विभूति' कहते हैं। श्रीकृष्णके शक्त्याभासावेशसे ही जगत् व्याप्त है॥ 372॥ अनुभाष्य—भाः 2/7/39 श्लोकमें मायाकी विभूतियोंका परिचय देखें॥ 372॥ श्रीमद्भगवद्गीता (10/41-42)में :- यद्यद्विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥ 373॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 373॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो सब जीव-विभूतिमान् और श्रीमान् हैं, उन्हें मेरे तेजके अंशसे उत्पन्न जानना॥ 373॥ । 283

[ 20/373-381 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— विभूतिमत् (ऐश्वर्ययुक्तं) श्रीमत् (सम्पत्तियुक्तम्) ऊर्ज्जितं (बलप्रभावादिना गुणेनातिशयितं) यत् यत् सत्त्वं (प्राकृतं वस्तु) भवति, तत् तत् एव मम तेजोऽशसम्भवं (प्रभावकलया सिद्धं प्रभावस्यांशेन सम्भूतम् इति) त्वम् अवगच्छ (जानीहि)। श्लोक-भावानुवाद-ऐश्वर्ययुक्त, सम्पत्तियुक्त, बल-प्रभावादि अतिशय गुणोंसे युक्त जो-जो प्राकृत वस्तु है, तुम उसे-उसे ही मेरे तेजसे (प्रभावसे) उत्पन्न जानना॥ 373 ॥ अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ 374 ॥ अनुवाद-अथवा हे अर्जुन! इस पृथक्-पृथक् उपदिष्ट ज्ञानसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? तुम मात्र इतना ही जानो कि मैं अपने एकांशसे इस समस्त जगत्को धारणकर अवस्थित हूँ॥ 374 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/20 संख्या देखें ॥ 374 ॥ श्रीकृष्णस्वरूपके छः प्रकारके विलासोंमेंसे बाकी दो प्रकारकी आयुवालेके रूपमें लीला :- एइत' कहिलुँ शक्त्यावेश-अवतार। बाल्य-पौगण्ड-धर्मेर शुनह विचार ॥ 375 ॥ अनुवाद-इस प्रकार मैंने तुम्हें शक्त्यावेश अवतारोंके विषयमें बतलाया। अब तुम श्रीकृष्णके बाल्य-पौगण्ड अवस्था आदिके लक्षणोंको सुनो ॥ 375 ॥ स्वयं श्रीकृष्णके द्वारा लीला-प्रकट करनेसे पहले गुरुवर्गके रूपमें सेवकगणोंको प्रकटित करना :- किशोरशेखर-धर्मी व्रजेन्द्रनन्दन। प्रकटलीला करिबारे यबे करे मन॥ 376 ॥ आदौ प्रकट कराय माता-पिता-भक्तगणे। पाछे प्रकट हय जन्मादिक-लीलाक्रमे ॥ 377 ॥ अनुवाद-व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण किशोरशेखर हैं। जब उनकी लीलाओंको प्रकट करनेकी इच्छा होती है, तब वे पहले माता-पितादि भक्तोंको प्रकट करते हैं और बादमें क्रमशः स्वयं जन्म-बाल्य-पौगण्ड-कैशोर आदि लीलाओंको प्रकट करते हैं ॥ 376-377 ॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/63) :- वयसो विविधत्वेऽपि सर्वभक्तिरसाश्रयः। धर्मी किशोर एवात्र नित्यलीला-विलासवान् ॥ 378 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 378 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नित्यलीला-विलासवान् सर्वभक्तिरसाश्रय श्रीकृष्णकी अनेक वयस (अवस्थाएँ) रहनेपर भी किशोर अवस्था ही श्रेष्ठ है॥ 378 ॥ अनुभाष्य- वयसः विविधत्वे (बाल्यपौगण्डकैशोरादिप्रकारभेदे) अपि अत्र सर्वभक्तिरसाश्रयः नित्यलीलाविलासवान् किशोरः एव धर्मी (सर्ववयो-धर्मविशिष्टः पूर्णतमः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 378 ॥ प्रत्येक ब्रह्माण्डमें प्रतिक्षणमें वह विचित्र नवनवायमान चिन्मयी लीला :- पूतना-वधादि यत लीला क्षणे क्षणे। सब लीला नित्य प्रकट करे अनुक्रमे ॥ 379 ॥ अनुवाद-पूतना-वधादि जितनी भी लीलाएँ हैं, वे क्षण-क्षणमें चलती रहती हैं। श्रीकृष्ण समस्त लीलाओंको क्रमशः नित्य प्रकट करते रहते हैं॥ 379 ॥ अनन्त ब्रह्माण्ड, तार नाहिक गणन। कोन लीला कोन ब्रह्माण्डे हय प्रकटन ॥ 380 ॥ अनुवाद-इस जगत्में अनन्त ब्रह्माण्ड हैं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। कोई-न-कोई लीला किसी-न-किसी ब्रह्माण्डमें सदा प्रकटित होती ही रहती है॥ 380 ॥ श्रीकृष्णावतारकी लीलाका दृष्टान्त-जैसे निरन्तर गङ्गाकी धारा :- एइमत सब लीला-येन गङ्गाधार। से-से लीला प्रकट करे व्रजेन्द्रकुमार ॥ 381 ॥ 284 |

बीसवाँ अध्याय 20/381-390 ] अनुवाद-इस प्रकार श्रीब्रजेन्द्रनन्दन समस्त लीलाओंको गङ्गाकी धाराकी भाँति निरन्तर प्रकट करते रहते हैं॥381॥ किशोर श्रीकृष्णकी ही व्रजलीला :- क्रमे बाल्य-पौगण्ड-कैशोरता प्राप्ति। रास-आदि लीला करे, कैशोरे नित्यस्थिति॥382॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण सर्वप्रथम बाल्य, उसके पश्चात् पौगण्ड और फिर किशोरावस्थाको प्राप्त करते हैं और उनके अनुरूप लीलाएँ करते हैं। कैशोरावस्था आनेपर श्रीकृष्ण सदा उसी अवस्थामें वर्तमान रहते हैं अर्थात् वे कभी भी यौवन, वृद्धावस्थाको प्राप्त नहीं करते। कैशोर अवस्थामें वे रास-लीलादि प्रकाशित करते हैं॥382॥ श्रीकृष्णलीलाके नित्य होनेकी व्याख्या :- 'नित्यलीला' कृष्णेर सर्वशास्त्रे कय। बुझिते ना पारे लीला केमने 'नित्य' हय॥383॥ अनुवाद-सभी शास्त्र कहते हैं कि श्रीकृष्णकी समस्त लीलाएँ 'नित्यलीला' हैं। किन्तु लोग नहीं समझ पाते कि वे कैसे 'नित्य' चलती रहती हैं॥383॥ ज्योतिषचक्र (प्रकाशके गोले)का उदाहरण :- दृष्टान्त दिया कहि, तबे लोक सब जाने। कृष्णलीला-नित्य, ज्योतिश्चक्र-प्रमाणे॥384॥ ज्योतिश्चक्रे सूर्य येन फिरे रात्रि-दिने। सप्तद्वीपाम्बुधि लङ्घि' फिरे क्रमे क्रमे॥385॥ रात्रि-दिने हय षष्ठिदण्ड-परिमाण। तिनसहस्र छयशत 'पल' तार मान॥386॥ अनुवाद-इसलिये मैं एक दृष्टान्त देता हूँ, जिससे लोग उसे जान पायेंगे। ज्योतिषचक्रकी (राशिचक्रकी) भाँति श्रीकृष्णलीला नित्य है। ज्योतिषचक्रमें सूर्य जिस प्रकार रात-दिन घूमता रहता है और सातों द्वीपोंके मध्य समुद्रोंको क्रमशः लाँघता हुआ चलता जाता है। रात और दिनमें कुल मिलाकर साठ दण्ड होते हैं तथा उसमें तीन हजार छः सौ 'पल' होते हैं॥384-386॥ सूर्योदय हैते षष्ठिपल-क्रमोदय। सेइ एक दण्ड, अष्ट दण्डे 'प्रहर' हय॥387॥ अनुवाद-सूर्योदयसे लेकर सूर्य साठ पलके परिमाण समयमें क्रमशः ऊपर उठता जाता है। साठ पलका एक दण्ड होता है और आठ दण्डका एक 'प्रहर' होता है॥387॥ एक-दुइ-तिन-चारि प्रहरे अस्त हय। चारिप्रहर रात्रि गेले पुनः सूर्योदय॥388॥ अनुवाद-एक-दो-तीन-चार प्रहर चलते हुए सूर्य अस्त होता है। चार प्रहर रातके बीत जानेपर पुनः सूर्योदय होता है॥388॥ चौदह मन्वन्तरोंमें समस्त ब्रह्माण्डोंमें अवतार-लीला :- ऐछे कृष्णेर लीला-मण्डल चौद्द मन्वन्तरे। ब्रह्माण्डमण्डल व्यापि' क्रमे क्रमे फिरे॥389॥ अनुवाद-सूर्यके एक मण्डलमें घूमनेके समान श्रीकृष्णकी लीलाका भी एक मण्डल है जिसमें श्रीकृष्णकी लीलाएँ क्रमशः प्रकट होती रहती हैं। चौदह मन्वन्तर-कालमें यह मण्डल सभी ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त होकर क्रमशः घूमता रहता है अर्थात् श्रीकृष्णकी लीलाएँ एकके बाद एक ब्रह्माण्डमें क्रमशः प्रकट होती रहती हैं॥389॥ श्रीकृष्णकी प्रकट-लीलाका समय :- सओयाशत वत्सर कृष्णेर प्रकट-प्रकाश। ताहा यैछे व्रज-पुरे करिला विलास॥390॥ अनुवाद-एक सौ पचीस वर्षों तक श्रीकृष्णकी लीलाका प्रकट-प्रकाश होता है। व्रज और पुर अर्थात् मथुरा एवं द्वारकामें वे प्रकट लीलाका आस्वादन करते हैं॥390॥ । 285

[ 20/391-395 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्णावतार-लीलाकी उपमा-जैसे, अलातचक्र-भ्रमण :- अलातचक्रप्राय सेइ लीलाचक्र फिरे। सब लीला ब्रह्माण्डे क्रमे उदय करे॥ 391॥ अनुवाद—जलती हुई मशालको तेजीसे घुमानेपर जैसे एक अटूट अलातचक्र (अग्निका चक्र) दिखलायी देता है, उसी प्रकार ही श्रीकृष्णकी लीलाओंका चक्र चलता है। समस्त लीलाएँ समस्त ब्रह्माण्डोंमें क्रमशः उदित होती रहती हैं॥ 391॥ जन्मसे लेकर मूसल-लीला तककी लीलाएँ :- जन्म, बाल्य, पौगण्ड, कैशोर प्रकाश। पूतना वधादि करि' मौषलान्त विलास ॥ 392॥ असंख्य ब्रह्माण्डोंमें किसी-न-किसी ब्रह्माण्डमें नित्य ही एक-ना-एक लीला वर्तमान, इसलिये लीलाकी 'नित्यता' :- कोन ब्रह्माण्डे कोन लीलार हय अवस्थान। ताते लीला 'नित्य' कहे निगम-पुराण ॥ 393॥ अनुवाद—जन्म, बाल्य, पौगण्ड और कैशोर-अवस्थाको प्रकाशित करते हुए क्रमशः पूतना-वधादि करनेसे लेकर मूसल-लीला (यदुवंशके विनाश) तक श्रीकृष्णकी जितनी लीलाएँ हैं, किसी-न-किसी ब्रह्माण्डमें इनमेंसे कोई-न-कोई लीला चलती ही रहती है, इसलिये वेद और पुराण श्रीकृष्णलीलाको नित्य कहते हैं॥ 392-393॥ सङ्कर्षणके चिद्-वैभव समस्त विष्णुधाम ही विष्णुके समान और हरिके साथ प्रपञ्चमें अवतीर्ण :- गोलोक, गोकुल-धाम- 'विभु' कृष्णसम। कृष्णेच्छाय ब्रह्माण्डगणे ताहार संक्रम॥ 394 ॥ अनुवाद—चिन्मय गोलोक और गोकुल-धाम भी श्रीकृष्णकी भाँति सर्वव्यापक और ऐश्वर्यशाली हैं। श्रीकृष्णकी इच्छासे चिन्मय गोलोक और गोकुल धाम ब्रह्माण्डोंमें श्रीकृष्णके साथ क्रमशः प्रकाशित होते रहते हैं॥ 394॥ ब्रह्माण्डसमूहोंमें अवतारीके साथ उनका गोलोकधाम भी अवतीर्ण :- अतएव गोलोकस्थाने नित्य विहार। ब्रह्माण्डगणे क्रमे प्रकट ताहार ॥ 395॥ अनुवाद—इसलिये श्रीकृष्णकी लीलाएँ नित्य चिन्मय गोलोक-धाममें होती हैं। वही लीलाएँ भौतिक ब्रह्माण्डोंमें क्रमशः प्रकट होती रहती हैं॥ 395॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णलीला नित्य प्रकट रहती है। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें समय-समयपर क्रमशः नित्यलीला प्रकट होती है। एक ब्रह्माण्डमें श्रीकृष्णजन्म-लीलासे आरम्भ करके 125 वर्षों तक मूसल-लीलाके अन्त तक प्रकट होकर उस ब्रह्माण्डमें लीला अप्रकट हो जाती है। श्रीकृष्णकी एक क्षणकी लीला जब एक ब्रह्माण्डमें समाप्त होती है, तब वही लीला एक अन्य ब्रह्माण्डमें आरम्भ होती है और इस ब्रह्माण्डमें दूसरे क्षणकी लीला आरम्भ हो जाती है। इसी प्रकार असंख्य अनन्त ब्रह्माण्डोंमें प्रतिक्षणसे सम्बन्धित लीला प्रकट होकर अन्य ब्रह्माण्डमें फिर उसी क्षणसे सम्बन्धित लीलाका उदय होता है। इसके उदाहरणमें सूर्यके भ्रमणमार्ग अर्थात् ज्योतिषचक्रमें भ्रमण कहा गया है। अनन्त ब्रह्माण्डोंमें श्रीकृष्णकी असंख्य लीलाएँ क्रमशः उदित होकर अप्रकट हो रही हैं। जीवके ज्ञानसे उस अनन्त लीलाकी उपलब्धि सम्भव नहीं है। गङ्गाकी धारा जिस प्रकार निरन्तर है, अलातचक्र-भ्रमण जिस प्रकार निरन्तर और व्यापक होता है, उसी प्रकार श्रीकृष्णलीलाका भी निरन्तर प्रकट होना भिन्न-भिन्न ब्रह्माण्डोंमें उपलब्ध होता है। श्रीकृष्णकी जन्म, बाल्य और पौगण्ड-कैशोरादि लीलाएँ नित्यकाल ही संघटित हो रही हैं। किसी एक ब्रह्माण्डमें रहनेवाले जीवोंको श्रीकृष्णलीलाकी नित्य प्रकट होनेकी अनुभूति नहीं होनेपर भी उनकी लीलाकी नित्यता है। सभी लीलाओंके एक समयमें नित्य प्राकट्यका नाम ही 'नित्यलीला' है; किन्तु प्रपञ्चमें क्रमपूर्वक ही लीलाओंका प्राकट्य होता 286 ।

बीसवाँ अध्याय 20/379-396 ]

है। उस समय अन्यान्य लीलाएँ अन्य ब्रह्माण्डोंमें प्रकट होती हैं, इसलिये किसी एक ब्रह्माण्डमें एक ही समयमें उसका नित्यत्व दिखलायी नहीं देता। वास्तवमें लीला नित्य है; चौदह मन्वन्तर अर्थात् कल्पके निर्दिष्ट कालमें किसी एक ब्रह्माण्डमें क्रमपूर्वक श्रीकृष्णलीला- मण्डल पुनः घूमता है; इसलिये लीला अनित्य नहीं है। अन्य किसी ब्रह्माण्डमें चल रही नित्यलीला हमें दिखलायी नहीं पड़ती, यह कहकर इस ब्रह्माण्डके लोग नित्यलीलाकी उपलब्धि करनेमें समर्थ नहीं होते। इसलिये वेद-पुराणादि नित्यलीलाकी बात ही कहते हैं। गोलोककी नित्य विहारस्थली क्रमशः ब्रह्माण्डोंमें प्रकट होती है।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती-ठाकुरने स्वरचित 'रागवर्त्म-चन्द्रिका'के द्वितीय प्रकाशमें उज्ज्वलनीलमणिके 'तद्भावबद्धरागा ये जनास्ते' श्लोककी टीकामें लिखा है—

“अनुरागौघं रागानुगाभजनौत्कण्ठयं, न त्वनुरागस्थायिनं, साधकदेहेऽनुरागोत्पत्त्यसम्भवात्। व्रजेऽभवन्निति अवतारसमये नित्यप्रियाद्या यथा आविर्भवन्ति, तथैव गोपिकागर्भे साधनसिद्धा अपि आविर्भवन्ति। ततश्च गोपिकादेहे उत्पद्यन्ते, पूर्वजन्मनि साधकदेहे तेषां (स्नेहमानप्रणयरागानुरागमहाभावानाम्) उत्पत्त्य- सम्भवात्। ×× साधक-देहभङ्गसमये एव तस्मै प्रेमवते भक्ताय ×× चिदानन्दमयी गोपिकातनुश्च दीयते। सैव तनुर्योगमायया वृन्दावनीयप्रकटप्रकाशे कृष्णपरिवारप्रादुर्भावसमये गोपीगर्भादुद्भाव्यते। नात्र कालविलम्बगन्धोऽपि; प्रकटलीलाया अपि विच्छेदाभावात्। यस्मिन्नेव ब्रह्माण्डे तदानीं वृन्दावनीयलीलानां प्राकट्यं, तत्रैवास्यामेव व्रजभूमौ, अतः साधकप्रेमिभक्तदेहभङ्गसमकालेऽपि सपरिकर श्रीकृष्णप्रादुर्भावः सदैववास्ति, इति भो भो महानुरागिसोत्कण्ठभक्ताः, मा भैष्ट, सुस्थिरास्तिष्ठत, स्वस्त्येवास्ति भवद्भव्यः इति।”

एक साथ समय-समयपर व्रजभूमिमें आविर्भूत होते हैं।” यहाँपर 'अनुरागौघं' अर्थात् रागानुग-भजनोचित उत्कण्ठा-स्थायीभावगत अनुराग नहीं है, क्योंकि साधककी देहमें अनुरागकी उत्पत्ति असम्भव है। 'व्रजेऽभवन्' - व्रजमें आविर्भूत हुए थे, इसका अर्थ यह है कि श्रीकृष्णके अवतार-कालमें नित्यप्रियाएँ जिस प्रकारसे आविर्भूत होती हैं, उसी प्रकार साधनसिद्धगण भी गोपियोंके गर्भसे आविर्भूत होते हैं। उसके बाद (नित्यसिद्धाओंके सङ्गकी महिमासे) उक्त गोपीदेहमें स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, महाभाव समूह उत्पन्न होते हैं, क्योंकि पूर्वजन्ममें (उक्त साधकदेहमें) उनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं होती। साधकदेहके नष्ट होनेके समय ही उस प्रेमवान् भक्तको चिदानन्दमयी गोपी देह प्रदान की जाती है। उसी सिद्धदेहमें ही योगमाया वृन्दावनकी लीलाके 'प्रकट' प्रकाशके समय श्रीकृष्ण परिकरोंके आविर्भावके समय उस भक्तको गोपीके गर्भसे उत्पन्न कराती हैं। यहाँपर कालके विलम्बकी गन्धमात्र भी नहीं है, क्योंकि प्रकट-लीलाका भी विच्छेद नहीं है अर्थात् वह निरन्तर है। जिस किसी ब्रह्माण्डमें ही उनकी वृन्दावनकी लीलाका प्राकट्य हुआ करता है, उसी व्रजभूमिमें ही गोपीके गर्भसे साधनसिद्ध गणोंका आविर्भाव हुआ करता है। इसलिये साधक-प्रेमीभक्तके देहके नष्ट होनेके समयमें भी सपरिकर श्रीकृष्णका आविर्भाव सदा ही हुआ करता है। इसलिये, हे महानुरागी उत्कण्ठायुक्त भक्तगण ! भयभीत मत होना, सुस्थिर होओ, आपका कल्याण निश्चित है ।] ॥ 379-395 ॥

[उज्ज्वलनीलमणि (3/49-50)- “तद्भावबद्धरागा ये जनास्ते साधने रताः। तद्योग्यमनुरागौघं प्राप्योत्कण्ठानुसारतः ॥ ता एकशोऽथवा द्वित्राः काले काले व्रजेऽभवन्।” अर्थात् “जो व्रजवासियोंके विशेष भावमें अनुरक्त होकर साधनमें रत होते हैं, वे उत्कण्ठाके अनुरूप उसके योग्य अनुरागको प्राप्त करके अकेले अथवा दो-तीन जन

व्रजमें श्रीकृष्ण-पूर्णतम, मथुरा और द्वारकामें पूर्णतर, तथा परव्योममें पूर्णविग्रह-रूपमें प्रकाशित :- व्रजे कृष्ण-सर्वैश्वर्यप्रकाशे 'पूर्णतम' । पुरीद्वये, परव्योमे- 'पूर्णतर', 'पूर्ण' ॥ 396 ॥

अनुवाद-व्रजमें श्रीकृष्णके समस्त ऐश्वर्यका 'पूर्णतम' प्रकाश है, मथुरा और द्वारकामें 'पूर्णतर' तथा परव्योम वैकुण्ठमें 'पूर्ण' प्रकाश है ॥ 396 ॥

। 287

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ (transcription) दिया गया है:

[ 20/396–402      श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य— श्रीकृष्ण व्रजमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रकाशित करते हैं, इसलिये व्रजेन्द्रनन्दन 'पूर्णतम' हैं। द्वारका और मथुरा—इन दोनों पुरियोंमें श्रीकृष्ण व्रजकी अपेक्षा न्यूनरूपमें सभी ऐश्वर्योंको प्रकाशित करते हैं, इसलिये वहाँ वे—'पूर्णतर' हैं। परव्योम वैकुण्ठमें श्रीकृष्ण दोनों पुरियोंकी अपेक्षा भी न्यून (स्वल्परूपमें) सब प्रकारके ऐश्वर्योंको प्रकाश करते हैं, इसलिये वहाँ वे—'पूर्ण' हैं॥ 396 ॥ गोस्वामि-वचन :— भक्तिरसामृतसिन्धु (2/1/221-223)— हरिः पूर्णतमः पूर्णतरः पूर्ण इति त्रिधा। श्रेष्ठमध्यादिभिः शब्दैर्नाट्ये यः परिकीर्तितः॥ 397 ॥ प्रकाशिताखिलगुणः स्मृतः पूर्णतमो बुधैः। असर्वव्यञ्जकः पूर्णतरः पूर्णोऽल्पदर्शकः॥ 398 ॥ कृष्णस्य पूर्णतमता व्यक्ताभूद्गोकुलान्तरे। पूर्णता पूर्णतरता द्वारका-मथुरादिषु ॥ 399 ॥ अनुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 397–399 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य— श्रेष्ठ-मध्यादि—शब्दके द्वारा नाट्य शास्त्रमें जिनका कीर्तन है, वही भगवान् हरि—पूर्ण, पूर्णतर और पूर्णतम—इन तीन प्रकारके हैं। अल्पगुणोंके प्रकाशक हरि—पूर्ण हैं; सभी गुणोंके स्वल्पप्रकाशक हरि—पूर्णतर हैं; और जिनमें समस्त गुण प्रकाशित हैं, वे हरि—पूर्णतम हैं; पण्डितजन यही कहते हैं। गोकुलमें श्रीकृष्णकी पूर्णतमता, द्वारका-मथुरामें पूर्णतरता और वैकुण्ठमें पूर्णता व्यक्त होती है॥ 397–399 ॥ बीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। अनुभाष्य— नाट्ये (नाट्यशास्त्रे) श्रेष्ठमध्यादिभिः शब्दैः यः [कीर्तितः, सः] हरिः पूर्णतमः पूर्णतरः पूर्णः इति त्रिधा परिकीर्तितः। प्रकाशिताखिलगुणः (प्रकाशिताः अखिलाः गुणाः यस्मिन् सः, प्रकटित-समग्रगुणः हरिः)—पूर्णतमः; सर्वव्यञ्जकः (स्वल्प-प्रकटित-सर्वगुणः हरिः)—पूर्णतरः; अल्पदर्शकः (प्रकटित-स्वल्पगुणः हरिः) पूर्णः इति बुधैः स्मृतः। गोकुलान्तरे कृष्णस्य पूर्णतमता; द्वारका-मथुरादिषु पूर्णतरता; [परव्योमे] पूर्णता व्यक्ताभूत्। श्लोक-भावानुवाद— अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 397–399 ॥ एइ कृष्ण—व्रजे ‘पूर्णतम’ भगवान्। आर सब स्वरूप—‘पूर्णतर’, ‘पूर्ण’ नाम ॥ 400 ॥ अनुवाद— श्रीकृष्ण व्रजमें ‘पूर्णतम’ भगवान् हैं और उनके अन्य सभी स्वरूप ‘पूर्णतर’ तथा ‘पूर्ण’ नाम धारण करते हैं॥ 400 ॥ अनुभाष्य— भगवान् व्रजेन्द्रनन्दन—‘पूर्णतम’ प्रकाश हैं, द्वारकानाथ-मथुरेश—पूर्णतर प्रकाश हैं और वैकुण्ठनाथ—‘पूर्ण’ प्रकाश हैं॥ 400 ॥ श्रीकृष्णके स्वरूपका विचार अति संक्षेपमें वर्णित; स्वयं शेषकी भी उसके सम्पूर्ण वर्णनमें असमर्थता :— संक्षेपे कहिलूँ कृष्णेर स्वरूप-विचार। ‘अनन्त’ कहिते नारे इहार विस्तार ॥ 401 ॥ अनुवाद— मैंने संक्षेपमें श्रीकृष्णके स्वरूप-विचारका वर्णन किया है, ‘अनन्त’ भी इसका विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं कर सकते॥ 401 ॥ ग्रन्थकारका दैन्य; शाखा-चन्द्र-न्यायसे वर्णन :— अनन्त स्वरूप कृष्णेर नाहिक गणन। शाखा-चन्द्र-न्याये करि दिग्दरशन ॥” 402 ॥ अनुवाद— श्रीकृष्णके अनन्त स्वरूपोंकी गणना नहीं की जा सकती। मैंने उसका शाखा-चन्द्र-न्यायसे दिग्दर्शन कराया है॥ 402 ॥ अनुभाष्य— ‘शाखा-चन्द्र-न्याय’—मध्यलीला 20/248 संख्या देखें॥ 402 ॥ बीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। 288     

बीसवाँ अध्याय 20/403-404 ] श्रीकृष्णस्वरूप-कीर्त्तन-श्रवणसे तत्त्वज्ञान-स्फूर्त्ति-प्राप्ति :- इहा येइ सुने, पड़े, सेइ भाग्यवान्। कृष्णेर स्वरूपतत्त्वेर हय किछु ज्ञान ॥ 403 ॥ अनुवाद-इसे जो भी सुनता है, पढ़ता है, वही भाग्यवान् है। उसे इससे श्रीकृष्णके स्वरूपतत्त्वका कुछ ज्ञान हो सकता है॥ 403॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 404 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे स्वरूपतत्त्वरूप- श्रीभगवत्-स्वरूपभेदविचारो नाम विंशतितमः परिच्छेदः। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 404॥ श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें स्वरूपतत्त्वरूप- श्रीभगवत्-स्वरूपभेदविचार नामक बीसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 289

श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 290 ।

इक्कीसवाँ अध्याय कथासार—इस अध्यायमें महाप्रभुने श्रीकृष्णलोक-तत्त्व, परव्योम-तत्त्व, कारणसमुद्र-तत्त्व और मायिक ब्रह्माण्ड-तत्त्व वर्णन करके द्वारकामें ब्रह्माके गर्वका हरण करनेवाली श्रीकृष्णकी एक लीलाका वर्णन किया है। उसके बाद ग्रन्थकारने महाप्रभुके वचन कहकर श्रीकृष्ण-रूपके सौन्दर्य-प्रकाशक कुछेक मधुर पद्य लिखे हैं। यहाँ तक सम्बन्ध-तत्त्व कहा गया है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) ग्रन्थकारके द्वारा श्रीगौरकृष्णके माधुर्य-ऐश्वर्यका वर्णन करते हुए मङ्गलाचरण :- अगत्येकगतिं नत्वा हीनार्थाधिकसाधकम्। श्रीचैतन्यं लिखाम्यस्य माधुर्यैश्वर्य-शीकरम्॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गतिहीनकी गति और हीन व्यक्तियोंके प्रति अधिक अर्थ-प्रदाता अथवा उपकार करनेवाले श्रीचैतन्यको प्रणाम करके उनके माधुर्य- ऐश्वर्यके कणका वर्णन कर रहा हूँ॥ १॥ अनुभाष्य— अगत्येकगतिं (गतिहीनानाम् एकावलम्बनं) हीनार्थाधिकसाधकं (हीनानां कृष्णप्रेम-दरिद्राणां ये अर्थाः प्रयोजनानि तेषाम् अधिकं यथा स्यात्तथा साधकं) श्रीचैतन्यं नत्वा (प्रणम्य) अस्य भगवतः (चैतन्यदेवस्य) माधुर्यैश्वर्यशीकरं (माधुर्यं यदैश्वर्यं, माधुर्यम् ऐश्वर्यञ्च वा, तयोः शीकरं कणं) लिखामि। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। हीन व्यक्ति अर्थात् श्रीकृष्णप्रेमरूपी धनहीन दरिद्र॥ १॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ २॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥ २॥ परव्योममें सभी विष्णु-विग्रहोंके अनन्त वैकुण्ठ-धाम :- “सर्वस्वरूपेर धाम—परव्योम-धामे। पृथक् पृथक् वैकुण्ठ, नाहिक गणने॥ ३॥ शत, सहस्र, अयुत, लक्ष, कोटि-योजन। एक एक वैकुण्ठेर विस्तार वर्णन॥ ४॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्णके प्रकाश और विलासादि अनन्त स्वरूपोंका परव्योममें पृथक् पृथक् अपना वैकुण्ठ धाम है, जिनकी गणना नहीं की जा सकती। एक-एक वैकुण्ठका परिमाण सौ, हजार, दस हजार, लाख, करोड़ योजन है [परन्तु प्राकृत जगत्के मापके अनुसार उनके परिमाणको मापा नहीं जा सकता]॥ ३-४॥ अनुभाष्य—वैकुण्ठका परिमाण मायिक ब्रह्माण्डके समान नहीं है। वैकुण्ठ—सैकड़ों, हजारों, दस हजारों, लाखों, करोड़ों अथवा असंख्य योजनवाला है। जिसमें किसी प्रकारके परिमाणसे युक्त कुण्ठाधर्म नहीं है, वही 'वैकुण्ठ' है॥४॥ परव्योममें आधार और विषय-वस्तु, धाम और विग्रह—अभिन्न शुद्धसत्त्वचिद्विलासमय भगवद्-विग्रह :- सब वैकुण्ठ—व्यापक, आनन्द-चिन्मय। पार्षद-षडैश्वर्य-पूर्ण सब हय॥ ५॥ अनन्त वैकुण्ठ एक एक देशे यार। से परव्योमेर केबा गणये विस्तार॥ ६॥ अनुवाद—सभी वैकुण्ठ व्यापक हैं, चिन्मय-आनन्दसे बने हैं। वैकुण्ठवासी भगवान्के परिकर हैं और वे । 291

[ 21/5-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भगवान्के समान षडैश्वर्योंसे परिपूर्ण हैं। परव्योमके एक प्रान्तमें ही असंख्य वैकुण्ठलोक स्थित हैं, इसलिये उस परव्योमके परिमाणको कौन माप सकता है? ॥ 5-6 ॥ गोलोक ही सहस्रदल-कमलके समान परव्योमकी कर्णिका :- अनन्त-वैकुण्ठ-परव्योम यार दलश्रेणी। सर्वोपरि कृष्णलोके 'कर्णिकार' गणि ॥ 7 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 7 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चिन्मय-जगत् एक कमलके स्वरूपका है; उस कमलके ऊपरी (बीचवाले) भाग 'कर्णिका' रूपी श्रीकृष्णलोकके चारों ओर पंखुड़ियोंके रूपमें अनन्त वैकुण्ठ परव्योममें विराजमान हैं ॥ 7 ॥ विष्णु और विष्णुधाम, दोनों ही अधोक्षज होनेके कारण ब्रह्मादिके लिये भी अगोचर :- एइमत षड़ैश्वर्य, स्थान, अवतार। ब्रह्मा, शिव अन्त ना पाय-जीव कोन् छार ॥ 8 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 8 ॥ अनुभाष्य-वैकुण्ठके षडैश्वर्यपूर्ण स्थान और षडैश्वर्ययुक्त अवतारोंकी सीमा मायिक राज्यके ईश्वर ब्रह्मा अथवा शिव आदिके भी गोचर नहीं हो सकती, माया वशीभूत जीवोंकी तो बात ही क्या है ॥ 8 ॥ अप्राकृत अतीन्द्रिय अधोक्षज विष्णु- मनोधर्मवालोंके लिये दुर्ज्ञेय :- श्रीमद्भागवत (10/14/21)- को वेत्ति भूमन् भगवन् परात्मन् योगेश्वरोतीर्भवतस्त्रिलोक्याम्। क्व वा कथं वा कति वा कदेति विस्तारयन् क्रीड़सि योगमायाम् ॥ 9 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 9 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे भूमन्, हे भगवन्, हे परात्मन्, हे योगेश्वर, इस त्रिभुवनमें आपकी लीला कहाँ, किस रूपमें, योगमायाका विस्तार करके आप कब क्रीड़ा करते हैं, यह कौन जान सकता है? ॥ 9 ॥ अनुभाष्य-गैयाओं और बछड़ोंके हरणके फलस्वरूप ब्रह्माका अभिमान श्रीकृष्णके द्वारा चूर्ण होनेपर ब्रह्मा श्रीकृष्णको परमेश्वर जानकर निम्नलिखित दो श्लोकोंके द्वारा उनका स्तव कर रहे हैं- हे भूमन् (विराट्), भगवन्, परात्मन्, योगेश्वर भवतः उतीः (लीलाः) क्व वा, कथं वा, कदा वा, कति वा, योगमायां विस्तारयन् क्रीड़सि, इति त्रिलोक्यां कः वेत्ति? [न कोऽपि जानात्यतोऽचिन्त्यं तव योगमायावैभवमिति भावः] । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [आपकी योगमायाके अचिन्त्य वैभवको कोई नहीं जान सकता-यह भाव है] ॥ 9 ॥ एइमत कृष्णेर दिव्य सद्गुण अनन्त। ब्रह्मा-शिव-सनकादि ना पाय याँर अन्त ॥ 10 ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीकृष्णके अनन्त दिव्य सद्गुण हैं, ब्रह्मा-शिव-सनकादि भी उनका पार नहीं पा सकते ॥ 10 ॥ विश्वके सबसे अधिक सूक्ष्म गणना करनेवाले भी विष्णुके गुणोंका परिमाण करनेमें असमर्थ :- श्रीमद्भागवत (10/14/7)- गुणात्मनस्तेऽपि गुणान् विमातुं हितावतीर्णस्य क ईशिरेऽस्य। कालेन येर्वा विमिताः सुकल्पै- र्भू-पांशवः खे मिहिका द्युभासः ॥ 11 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 11 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सभी पण्डितोंने भूमिके धूलिकणोंकी, आकाशके हिमकणोंकी और नक्षत्रों आदिके कालकी गणना की है; किन्तु क्या उनमेंसे कोई भी जगत्के हितके लिये अवतीर्ण और अनन्तगुणरूप जो आप हैं, आपके गुणोंकी गणना करनेमें समर्थ होता है? ॥ 11 ॥ 292 ।

इक्कीसवाँ अध्याय 21/11-15 ] अनुभाष्य— यैः सुकल्पैः (सुनिपुणैः जनैः बहुजन्मना) वा [वितर्के] कालेन भू-पांशवः (पृथ्वीपरमाणवः) खे (आकाशे) मिहिकाः (हिमकरणाः) द्युभासः (दिवि ज्योतिष्काणां किरणपरमाणवः) अपि विमिताः (विशेषेण गणिताः) [तेषां] के (लोकाः) अस्य (विश्वस्य) हितावतीर्णस्य (मङ्गलाय प्रकटमानसस्य, पालनाय बहुगुणाविष्कारेण अवतीर्णस्य वा) गुणात्मनः (त्रिगुणाधिष्ठातुः) ते (तव) गुणान् अपि [पुनः] विमातुं (एतावन्तः इति गणयितुम्) ईशिरे (समर्थाः बभूवुः, दूरतः तद्विशेषवार्त्ता इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्राह भाष्य देखें। भाः 2/7/40 और 11/4/2 श्लोक देखें ॥ 11 ॥ स्वयं शेष भी श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करके उसका अन्त नहीं पाते :— ब्रह्मादि रहु—सहस्रवदने 'अनन्त'। निरन्तर गाय मुखे, ना पाय गुणेर अन्त ॥ 12 ॥ अनुवाद—ब्रह्मादिकी बात तो रहने ही दो—सहस्रवदन (हजार मुखवाले) अनन्त भी अपने मुखसे निरन्तर उनके गुणोंका गान करके श्रीकृष्णके गुणोंका अन्त नहीं पाते ॥ 12 ॥ अनुभाष्य—चार मुखोंसे ब्रह्मा अथवा पाँच मुखोंसे शिवकी बात तो दूर, अनन्तदेव निरन्तर सहस्र मुखोंसे गान करके भी उनके गुणोंकी सीमा नहीं प्राप्त करते। पाठान्तरमें,—“ब्रह्मादि रहु, अनन्त सहस्रवदन। निरन्तर गाय मुखे, ना पाय गणन ॥ ”12 ॥ श्रीमद्भागवत (2/7/41)में :— नान्तं विदाम्यहममी मुनयोऽग्रजास्ते मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये। गायन् गुणान् दशशतानन आदिदेवः शेषोऽधुनापि समवस्यति नास्य पारम् ॥ 13 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 13 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं ब्रह्मा और तुम्हारे अग्रज (बड़े भाई) सनकादि सभी मुनि मायाधीश पुरुषका अन्त नहीं जान सकते, तब और लोग कैसे जान सकते हैं? सहस्र मुखवाले अनन्तदेव भी उनका गुणोंका गान करते-करते आज तक भी उनका पार नहीं पा पाये ॥ 13 ॥ अनुभाष्य—ब्रह्मा अपने शिष्य नारदसे भगवान् विष्णुके लीलावतार-समूहकी चेष्टाएँ, प्रयोजन और विभूतियोंका वर्णन करके उनके दुर्ज्ञेय और अपरिमेय शक्तिवैभवके विषयमें बतला रहे हैं— पुरुषस्य (भगवतः) विष्णोः मायाबलस्य (मायाविभूतेः) अन्तम् अहं (ब्रह्मा) न विदामि (वेद्मि, तथा) ते (तव) अग्रजाः (भ्रातरः) अमी मुनयः (सनकादयः) च न जानन्ति; दशशताननः (सहस्रवदनः) आदिदेवः शेषः (भूधारी अनन्तः) अपि अस्य (भगवतः) गुणान् गायन् (कीर्त्तयन्) अधुना (साम्प्रतम्) अपि पारं (सीमानं) न समवस्यति (निश्चिनोति प्राप्नोतीत्यर्थः, अतः) ये अपरे (लोकाः, ते) कुतः [विदन्तीति भावः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 13 ॥ साक्षात् श्रीकृष्णके लिये भी उनके गुण अपरिमेय :— तँहो रहु—सर्वज्ञ-शिरोमणि श्रीकृष्ण। निज-गुणेर अन्त ना पाना हयेन सतृष्ण ॥ 14 ॥ अनुवाद—अनन्तदेवकी बातको तो रहने दो, सर्वज्ञ-शिरोमणि श्रीकृष्ण भी अपने ही गुणोंका अन्त नहीं पाकर उनको जाननेके लिये उत्कण्ठित रहते हैं ॥ 14 ॥ अनुभाष्य—'तँहो रहु'—अनन्तदेवकी बात तो दूर रहे, स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने गुणोंकी सीमाको प्राप्त नहीं कर पानेके कारण उत्कण्ठित हैं ॥ 14 ॥ आपके अतिरिक्त सभीका निषेध करते-करते निर्विशेष-वर्णनके बाद अन्तमें श्रुतियाँ आपके सविशेष विग्रहका ही वर्णन करती हैं :— श्रीमद्भागवत (10/87/41)में— द्युपतय एव ते न ययुरन्तमनन्ततया त्वमपि यदन्तराण्डनिचया ननु सावरणाः। । 293

[ 21/15-18 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ख इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि हि फलन्त्यतन्निरसनेन भवन्निधनाः ॥ 15 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-आप—अनन्त हैं, इसलिये वे देवता भी आपका अन्त नहीं पा पाये। आप स्वयं भी अपने गुणोंका अन्त नहीं पाते। आकाशमें परमाणुओंकी भाँति आवरणसहित सभी ब्रह्माण्ड कालके साथ घूम रहे हैं। इस कारण हम श्रुतियाँ आपका अनुसन्धान करते हुए जिसे भी लक्ष्य करती हैं, वे आप नहीं हैं-ऐसा करते-करते [अन्तमें] सब कुछ ही आपमें पर्यवसित (समाप्त) होता है; इस प्रकार स्थिर करके आप ही सभीके आधार हैं,- ऐसा सिद्धान्त करती हैं॥ 15 ॥ अनुभाष्य-जनलोकमें ब्रह्मसत्रयज्ञमें श्रवणके इच्छुक ऋषियोंसे चतुःसनमेंसे एक ब्रह्मर्षि सनन्दनने श्रुतियोंके द्वारा की गयी इस भगवद्-स्तुतिका गान किया था, उसीका पुनः आदि ऋषि श्रीनारायणने देवर्षि नारदसे बादमें वर्णन किया था- हे भगवन्, द्युपतयः (स्वर्गाधिपाः लोकपतयः ब्रह्मादयः) एव (अपि) ते (तव) अनन्ततया (अन्ताभावेन) अन्तं (गुणसीमा) न ययुः (प्रापुः-यत् अन्तवद्वस्तु, तत् किमपि त्वं न भवसीत्यर्थः); [आस्तां द्युपतयः,] यद् (यस्मात्) त्वमपि [स्वयम् आत्मनः अन्तम् अनन्ततया न यासि]; ननु (अहो) यद् (यस्य तव) अन्तरा (मध्ये) सावरणाः (उत्तरोत्तरं दशगुणसप्तावरणसमन्विताः) अण्डनिचयाः (ब्रह्माण्ड-गणाः) वयसा (कालचक्रेण) खे (आकाशे) रजांसि इव सह [एकदैव न तु पर्यायेण] वान्ति (परिभ्रमन्ति); यद् (यस्मात्) श्रुतयः अतन्निरसनेन (निरन्तरं जड़निषेधेन) भवन्निधनाः (भवति त्वयि निधनं समाप्तिः यासां ताः सत्यः) त्वयि (चिद्विलास-विशेषमये) हि फलन्ति (पर्यवसन्ति)। श्लोक-भावानुवाद-हे भगवन्! स्वर्गादिके लोकपाल ब्रह्मादि भी आपके गुणोंका अन्त नहीं पाते, और स्वयं अनन्त होनेपर आप भी अपना अन्त नहीं पा पाते। अहो! आकाशमें धूलिके कण जिस प्रकार घूमते रहते हैं, उसी प्रकार आपमें भी (आपके रोमकूपोंमें) आवरणसहित (उत्तरोत्तर दस गुणा बड़े सात आवरणयुक्त) ब्रह्माण्डसमूह कालचक्रके द्वारा परिभ्रमण कर रहे हैं। इसलिये श्रुतियाँ आपके अतिरिक्त अन्यान्य सभी वस्तुओंको निषेध करते-करते अन्तमें आपके विशेष चिद्-विलास विग्रहमें ही पर्यवसित होती हैं॥ 15 ॥ व्रजमें श्रीकृष्णकी अद्भुत गोचारण-लीलाका वर्णन :- सेह रहु-व्रजे यबे कृष्ण-अवतार। ताँर चरित्र विचारिते मन ना पाय पार॥ 16 ॥ अनुवाद-वैकुण्ठादिमें श्रीकृष्णके ऐश्वर्य और उनके अनन्त गुणोंकी बात तो एक ओर रहे, व्रजमें जब श्रीकृष्णने अवतार लेकर ब्रह्म-विमोहनादि जो अद्भुत लीलाएँ कीं, उनका विचार करके मन और बुद्धिसे उन सबका पार नहीं पाया जा सकता॥ 16 ॥ बछड़ोंको चुरानेके कारण अपने चिद्विलासको प्रकट करके ब्रह्माके अहङ्कारका नाश :- प्राकृताप्राकृत सृष्टि कैला एकक्षणे। अशेष वैकुण्ठाण्ड स्व-स्व-नाथ-सने ॥ 17 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 17 ॥ अनुभाष्य-एक क्षणमें ही श्रीकृष्णने परव्योमनाथके साथ असंख्य अप्राकृत वैकुण्ठ लोकोंकी और अनेक ब्रह्मादिके साथ असंख्य प्राकृत ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि की ॥ 17 ॥ उस लीलाकी परम-चमत्कारिता :- एमत अन्यत्र नाहि शुनिये अद्भुत। याहार श्रवणे चित्त हय अवधूत ॥ 18 ॥ अनुवाद-ऐसी अद्भुत लीलाके विषयमें अन्यत्र कहीं भी नहीं सुना जाता, जिसे सुनने मात्रसे चित्त अभिभूत और शुद्ध हो जाता है॥ 18 ॥ अनुभाष्य-'अवधूत'-कम्पित, आन्दोलित, उद्वेलित, अभिभूत, पराहत। पाठान्तरमें, "याँहार श्रवणे चित्त-मल हय धूत।” अर्थात् जिसके श्रवणमात्रसे चित्तका मल धुल जाता है॥ 18 ॥ 294

इक्कीसवाँ अध्याय 21/19-26 ] श्रीकृष्णके द्वारा असंख्य गैयाओं और बछड़ोंको प्रकट करना :- “कृष्णवत्सैरसंख्यातैः”-शुकदेव-वाणी। कृष्ण-सङ्गे कत गोप संख्या नाहि जानि ॥ 19 ॥ अनुवाद-शुकदेव गोस्वामीने कहा है कि गोचारणमें जाते हुए श्रीकृष्णके साथ असंख्य बछड़े थे और उनके साथ कितने गोपबालक थे, उनकी भी गणना नहीं हो सकती अर्थात् वे भी असंख्य थे॥ 19 ॥ अनुभाष्य- “कृष्णवत्सैरसंख्यातैः”-भाः 10/12/3 श्लोकका प्रथम चरण॥ 19 ॥ एक एक गोप करे ये वत्स चारण। कोटि, अर्बुद, शङ्ख, पद्म, ताहार गणन ॥ 20 ॥ अनुवाद-एक-एक गोपबालक जितने बछड़ोंको चराते थे, उनकी संख्या भी करोड़, अरब, शङ्ख, पद्म आदि थी॥ 20 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णावतारमें ब्रह्माके द्वारा श्रीकृष्णकी महिमाकी परीक्षा करनेके लिये बछड़ों और गोपबालकोंको चुरानेपर श्रीकृष्णने अपनी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे प्राकृत एवं अप्राकृत वस्तुएँ, सभीको प्रकट किया था। उन्होंने चिन्मय गैयाओं, गोपबालकों और सम्पूर्ण वैकुण्ठतत्त्वको प्रकट करके अप्राकृत सृष्टिकी। अपने अपने ब्रह्माके साथ अनन्त ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करके प्राकृत सृष्टि की। इस अद्भुत कथाका श्रवण करनेसे चित्तका मल धुल जाता है। 'असंख्य कृष्णवत्स' इस शब्दके द्वारा श्रीकृष्णके साथ रहनेवाले सभी बछड़े एवं सभी गोपबालक असंख्य रूपमें प्रकट हुए॥ 17-20 ॥ अनुभाष्य- एकं दशं शतञ्चैव सहस्रमयुतं तथा। लक्षञ्च नियुतं चैव कोटिरर्बुदमेव च॥ वृन्दः खर्वो निखर्वश्च शङ्खपद्मौ च सागरः। अन्त्यं मध्यं परार्द्धञ्च दशवृद्ध्या यथाक्रमम्॥ [अर्थात् “दस-दस गुणा वृद्धिके द्वारा क्रमशः एक, दस, सौ, हजार, अयुत (दस-हजार), लाख, नियुत (दस लाख), करोड़, अर्बुद, वृन्द, खर्व, निखर्व, शङ्ख, पद्म, सागर, अन्त्य, मध्य और परार्द्ध संख्याकी गणना होती है।"] ॥ 20 ॥ वेत्र, वेणु, दल, शृङ्ग, वस्त्र, अलङ्कार। गोपगणेर यत, तार नाहि लेखा-पार ॥ 21 ॥ अनुवाद-गोप बालकोंके बेंत, वेणु, कमल-पुष्प, सींगा, वस्त्र और अलङ्कार आदि भी असंख्य थे॥ 21 ॥ श्रीकृष्णके द्वारा प्रकटित असंख्य वैकुण्ठनाथ और ब्रह्माण्डपतियोंके द्वारा श्रीकृष्ण-स्तुति :- सबे हैला चतुर्भुज वैकुण्ठेर पति। पृथक् पृथक् ब्रह्माण्डेर ब्रह्मा करे स्तुति ॥ 22 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णसे प्रकटित गोपबालक और बछड़े, सभी चतुर्भुज वैकुण्ठपति बन गये। अलग-अलग ब्रह्माण्डोंके ब्रह्मा श्रीकृष्णके साथ उन सब वैकुण्ठपतियोंकी स्तुति करने लगे ॥ 22 ॥ श्रीकृष्णसे लीलाका प्रकाश, श्रीकृष्णमें ही सङ्गोपन :- एक कृष्णदेह हैते सबार प्रकाशे। क्षणेके सबाइ सेइ शरीरे प्रवेशे ॥ 23 ॥ अनुवाद-वे सभी एक ही श्रीकृष्णकी देहसे प्रकाशित हुए और क्षणमात्रमें ही वे सभी उनके शरीरमें प्रवेश कर गये ॥ 23 ॥ ब्रह्माका विस्मय और मूर्च्छा, मूर्च्छाके बाद श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीकृष्णके ऐश्वर्यसे अवगत होना :- इहा देखि' ब्रह्मा हैला मोहित, विस्मित। स्तुति करि' सेइ पाछे करिला निश्चित ॥ 24 ॥ अधोक्षज श्रीकृष्णवैभव-निर्णयमें अपनी अक्षमता-ज्ञापन :- “ये कहे, - 'कृष्णेर वैभव मुञि सब जानौं' । से जानुक, - काय्मने मुञि एइ मानौं ॥ 25 ॥ एइ ये तोमार अनन्त वैभवामृतसिन्धु। मोर वाङ्मानसेर गम्य नहे एक बिन्दु ॥ 26 ॥ । 295

[ 21/24-31 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीकृष्णकी इस लीलाको देखकर हमारे ब्रह्माण्डके ब्रह्मा मोहित तथा विस्मित हो गये। श्रीकृष्णकी स्तुति करनेके पश्चात् उन्होंने निश्चित किया,—“जो कहता है कि मैं श्रीकृष्णके वैभवके विषयमें सब कुछ जानता हूँ, वह जानता है तो जाने, किन्तु मैं तो अपने काय और मनसे यही मानता हूँ कि आपके अनन्त वैभव-अमृतके सिन्धुकी एक बूँदकी महिमा भी मेरे वाणी और मनके अगोचर है॥ 24-26 ॥ श्रीमद्भागवत (10/14/38)में :— जानन्त एव जानन्तु किं बहूक्त्या न मे प्रभो। मनसो वपुषो वाचो वैभवं तव गोचरः ॥ "27 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 27 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो कहते हैं,—'मैं श्रीकृष्णतत्त्व जानता हूँ', तो वे जानें, किन्तु मैं बहुत कुछ बोलना नहीं चाहता हूँ। प्रभो! मैं केवल इतना ही कहता हूँ कि आपका समस्त वैभव—मेरे मन, शरीर और वाणीके अगोचर है॥ "27॥ अनुभाष्य—बछड़ोंको हरण करनेके फलस्वरूप श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माका अभिमान चूर्ण होनेपर ब्रह्मा श्रीकृष्णके भक्तवात्सल्य और उनके अधोक्षज होनेका वर्णन कर रहे हैं— हे प्रभो, जानन्तः (विज्ञाः त्वदचिन्त्यानन्तगुणगण- ज्ञानाभिमानिनः) एव जानन्तु, बहूक्त्या (अति प्रजल्पेन) किम् (अधिक-वाग्वेगेन फलं नास्तीत्यर्थः)। तव वैभवं मे (मम ब्रह्मणः) वपुषः मनसः वाचः (कायमनोवाक्यानां) न गोचरः (न विषयः, न स्पर्शाधिकारः भवति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 27 ॥ श्रीकृष्णसे अभिन्न श्रीवृन्दावन-धाम :— कृष्णेर महिमा रहु—केबा तार ज्ञाता। वृन्दावन-स्थानेर देख आश्चर्य विभुता ॥ 28 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी महिमाकी बात तो छोड़ो, उसे कौन जान सकता है? वृन्दावन धामकी ही आश्चर्यपूर्ण सर्वव्यापकताको देखो॥ 28 ॥ वृन्दावनके एक प्रान्तमें परव्योममें स्थित अनन्त करोड़ों वैकुण्ठ :— षोलक्रोश वृन्दावन,—शास्त्रेर प्रकाशे। तार एकदेशे वैकुण्ठजाण्डगण भासे ॥ 29 ॥ अनुवाद—शास्त्रोंके अनुसार वृन्दावनका परिमाण मात्र सोलह कोस है, किन्तु उसी वृन्दावनके एक भागमें ही अनन्तकोटि वैकुण्ठ और अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड स्थित हैं॥ 29 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—व्रजमण्डलमें जो बारह वन हैं—वे सब मिलाकर चौरासी कोस परिमाण होता है। उनमेंसे वृन्दावन-नामक वन वर्तमान समयमें वृन्दावन-नगरकी सीमासे नन्दग्राम-वृषभानुपुर (बरसाना) तक सोलह कोस है॥ 29 ॥ अनुभाष्य—शास्त्रोंमें वृन्दावन 'सोलह कोस'का कहा गया है। इसीके एक भागमें समस्त वैकुण्ठ और बहुत विस्तृत ब्रह्माण्ड प्रकाशित हैं॥ 29 ॥ असीम श्रीकृष्णवैभवसिन्धुकी एक बूँदका निर्देश :— अपार ऐश्वर्य कृष्णेर—नाहिक गणन। शाखा-चन्द्र-न्याये करि दिग्दर्शन ॥ 30 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका ऐश्वर्य अपार है—उसकी गणना नहीं की जा सकती। मैं तो केवल शाखा-चन्द्र-न्यायसे उसका दिग्दर्शन करा रहा हूँ॥ 30 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'शाखा-चन्द्र-न्याय'—चन्द्रको एक शाखाके पीछे दिखलाकर जिस प्रकार चन्द्रका परिचय दिया जाता है, उसी प्रकार किसी तत्त्वके एक भागको दिखलाकर सब भागोंका कुछ ज्ञान दिया जाता है। इसी न्यायको 'शाखा-चन्द्र-न्याय' कहते हैं॥ 30 ॥ वाणी और मनसे अतीत श्रीकृष्णके ऐश्वर्यके वर्णनमें महाप्रभुकी विह्वलता :— ऐश्वर्य कहिते स्फुरिल ऐश्वर्य-सागर। मनेन्द्रिय डुबिला, प्रभु हइला फाँपर ॥ 31 ॥ 296 ।

इक्कीसवाँ अध्याय 21/31-33 ] भागवतेर एइ श्लोक पड़िला आपने। अर्थ आस्वादिते सुखे करेन व्याख्याने ॥ 32 ॥ अनुवाद—ऐश्वर्यकी बात कहते हुए महाप्रभुके मनमें श्रीकृष्णका ऐश्वर्य-सागर स्फुरित हो उठा, उनके मन तथा इन्द्रियाँ उसीमें डूब गये और वे मुग्ध हो गये। तब महाप्रभुने भागवतका एक श्लोक पढ़ा और उस श्लोकके अर्थका आस्वादन करनेके लिये स्वयं आनन्दपूर्वक उसकी व्याख्या करने लगे॥ 31-32॥ तीनों सर्गोंके अधीश्वर अद्वितीय अविनश्वर लोकपालोंके द्वारा पूजित विग्रह :- श्रीमद्भागवत (3/2/21)में— स्वयन्त्वसाम्यातिशयस्त्र्यधीशः स्वराज्यलक्ष्म्याप्तसमस्तकामः। बलिं हरद्भिश्चिरलोकपालैः किरीटकोटीड़ितपादपीठः॥ 33॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 33॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वे स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और शिवके अधीश्वर हैं, इसलिये वे समान, हीन और अतिशयसे रहित हैं एवं स्वाराज्यलक्ष्मीके द्वारा उनकी समस्त कामनायें पूर्ण हुई हैं। चिरकालसे सभी लोकपाल उनकी पूजा करनेके लिये आकर उनकी पादपीठकी (चरणकमलोंकी) स्तुति करते हुए अपने मस्तकपर सुशोभित मुकुटोंको झुकाकर प्रार्थना किया करते हैं॥ 33॥ अनुभाष्य—लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डमें ‘श्रीकृष्ण —श्रीनारायणके विलास हैं’ इस पूर्वपक्षका खण्डन करते हुए उत्तरपक्ष वर्णनमें 302-323 संख्यामें इस श्लोककी व्याख्या और कारिका देखें। श्रीकृष्णके अप्रकट होनेपर श्रील उद्धव उनके वियोगमें शोकाकुल होकर श्रीविदुरसे श्रीकृष्णके बालचरित और परम-ऐश्वर्यका वर्णन कर रहे हैं— स्वयं [भगवान्] तु असाम्यातिशयः (न साम्यम् अतिशयश्च यस्मात् सः असमोर्ध्वः), त्र्यधीशः (गोलोकपरव्योमदेवीधाम्नां, गोकुल-मथुरा-द्वारकाधाम्नां वा, कारणं च समष्टिः हिरणयोगर्भो वा व्यष्टिः विराट् वेति सर्गत्रयाणां वा, सत्त्वरजस्तमोगुणाधिष्ठातृणां विष्णुब्रह्माशिवानां वा, चिज्जीवमायाशक्तीनां वा, भूर्भुवःस्वरिति व्याहृतित्रयाणां वा, स्वर्गमर्त्य-पाताल-लोकत्रयाणां वा ईशः अधिपतिः) स्वराज्यलक्ष्म्याप्तसमस्तकामः (परमचिदानन्दस्वरूप- सम्पत्त्या एव लब्धनिखिलभोगः) बलिं (करम् अर्हणं वा) हरद्भिः (समर्पयद्भिः) चिरलोकपालैः (चिरकालीनैः ब्रह्मरुद्राद्यैः) किरीट-कोटीड़ित-पादपीठः (किरीटकोटिभिः कोटि मुकुटाग्रैः ईड़ितं वन्दितं पादपीठं पादसिंहासनं यस्य सः-उग्रसेनं यत् न्यबोधयत्, तत् नः विग्लापयतीत्युत्तरेणान्वयः)। श्लोक-भावानुवाद—जो स्वयं भगवान् हैं, जिनके समान अथवा जिनकी अपेक्षा कोई बड़ा नहीं है, जो तीनों लोकों (गोलोक, परव्योम, देवीधाम; अथवा गोकुल, मथुरा, द्वारका; अथवा कारणोदकशायी, गर्भोदकशायी, पयोब्धीशायी नामक तीन पुरुषोंके; अथवा सतोगुण, रजोगुण, तमोगुणके अधिष्ठातृ देवता क्रमशः विष्णु, ब्रह्मा, शिवके; अथवा भूर्भुवःस्वःके; अथवा स्वर्ग-मर्त्य-पातालके) अधीश्वर हैं, परम चिदानन्द स्वरूप सम्पत्तिके द्वारा जिन्होंने समस्त काम्य वस्तुओंको प्राप्त किया है, पूजोपहार समर्पण करके ब्रह्मादि चिरलोकपाल करोड़ों-करोड़ों मुकुटोंके अग्रभागके द्वारा जिनकी पादपीठकी पूजा करते हैं, वे ही श्रीकृष्ण उग्रसेनके अनुवर्ती होकर चलेंगे, यही उनके दास—हमारे लिये अत्यन्त दुःखका विषय है। (इसका अगले श्लोक ‘तत् नः विग्लापयत्’ के साथ अन्वय करें।)।॥ 33 ॥ अमृतानुकणा—श्रीश्रीमद् रूप गोस्वामी प्रभुने उनके श्रीलघुभागवतामृत-ग्रन्थमें आलोच्य ‘स्वयन्त्वसाम्यातिशय- स्त्र्यधीशः’ (भाः 3/2/21)-श्लोककी जो व्याख्या अपनी कारिकामें प्रदान की है, वह इस प्रकार है,— ‘असाम्यातिशयः’—जिनका अन्यके साथ साम्य नहीं है और जिनसे आधिक्य नहीं है, इन दो विशेषणोंके द्वारा सभी भगवद्-स्वरूपोंसे श्रीकृष्णका उत्कर्ष निरूपित हुआ है, इसलिये यहाँपर परव्योमनाथकी अपेक्षा भी श्रीकृष्णका आधिक्य प्रदर्शित हुआ है। ‘स्वयं’—इस । 297