श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1739, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय 21/11-15 ] अनुभाष्य— यैः सुकल्पैः (सुनिपुणैः जनैः बहुजन्मना) वा [वितर्के] कालेन भू-पांशवः (पृथ्वीपरमाणवः) खे (आकाशे) मिहिकाः (हिमकरणाः) द्युभासः (दिवि ज्योतिष्काणां किरणपरमाणवः) अपि विमिताः (विशेषेण गणिताः) [तेषां] के (लोकाः) अस्य (विश्वस्य) हितावतीर्णस्य (मङ्गलाय प्रकटमानसस्य, पालनाय बहुगुणाविष्कारेण अवतीर्णस्य वा) गुणात्मनः (त्रिगुणाधिष्ठातुः) ते (तव) गुणान् अपि [पुनः] विमातुं (एतावन्तः इति गणयितुम्) ईशिरे (समर्थाः बभूवुः, दूरतः तद्विशेषवार्त्ता इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्राह भाष्य देखें। भाः 2/7/40 और 11/4/2 श्लोक देखें ॥ 11 ॥ स्वयं शेष भी श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करके उसका अन्त नहीं पाते :— ब्रह्मादि रहु—सहस्रवदने 'अनन्त'। निरन्तर गाय मुखे, ना पाय गुणेर अन्त ॥ 12 ॥ अनुवाद—ब्रह्मादिकी बात तो रहने ही दो—सहस्रवदन (हजार मुखवाले) अनन्त भी अपने मुखसे निरन्तर उनके गुणोंका गान करके श्रीकृष्णके गुणोंका अन्त नहीं पाते ॥ 12 ॥ अनुभाष्य—चार मुखोंसे ब्रह्मा अथवा पाँच मुखोंसे शिवकी बात तो दूर, अनन्तदेव निरन्तर सहस्र मुखोंसे गान करके भी उनके गुणोंकी सीमा नहीं प्राप्त करते। पाठान्तरमें,—“ब्रह्मादि रहु, अनन्त सहस्रवदन। निरन्तर गाय मुखे, ना पाय गणन ॥ ”12 ॥ श्रीमद्भागवत (2/7/41)में :— नान्तं विदाम्यहममी मुनयोऽग्रजास्ते मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये। गायन् गुणान् दशशतानन आदिदेवः शेषोऽधुनापि समवस्यति नास्य पारम् ॥ 13 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 13 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं ब्रह्मा और तुम्हारे अग्रज (बड़े भाई) सनकादि सभी मुनि मायाधीश पुरुषका अन्त नहीं जान सकते, तब और लोग कैसे जान सकते हैं? सहस्र मुखवाले अनन्तदेव भी उनका गुणोंका गान करते-करते आज तक भी उनका पार नहीं पा पाये ॥ 13 ॥ अनुभाष्य—ब्रह्मा अपने शिष्य नारदसे भगवान् विष्णुके लीलावतार-समूहकी चेष्टाएँ, प्रयोजन और विभूतियोंका वर्णन करके उनके दुर्ज्ञेय और अपरिमेय शक्तिवैभवके विषयमें बतला रहे हैं— पुरुषस्य (भगवतः) विष्णोः मायाबलस्य (मायाविभूतेः) अन्तम् अहं (ब्रह्मा) न विदामि (वेद्मि, तथा) ते (तव) अग्रजाः (भ्रातरः) अमी मुनयः (सनकादयः) च न जानन्ति; दशशताननः (सहस्रवदनः) आदिदेवः शेषः (भूधारी अनन्तः) अपि अस्य (भगवतः) गुणान् गायन् (कीर्त्तयन्) अधुना (साम्प्रतम्) अपि पारं (सीमानं) न समवस्यति (निश्चिनोति प्राप्नोतीत्यर्थः, अतः) ये अपरे (लोकाः, ते) कुतः [विदन्तीति भावः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 13 ॥ साक्षात् श्रीकृष्णके लिये भी उनके गुण अपरिमेय :— तँहो रहु—सर्वज्ञ-शिरोमणि श्रीकृष्ण। निज-गुणेर अन्त ना पाना हयेन सतृष्ण ॥ 14 ॥ अनुवाद—अनन्तदेवकी बातको तो रहने दो, सर्वज्ञ-शिरोमणि श्रीकृष्ण भी अपने ही गुणोंका अन्त नहीं पाकर उनको जाननेके लिये उत्कण्ठित रहते हैं ॥ 14 ॥ अनुभाष्य—'तँहो रहु'—अनन्तदेवकी बात तो दूर रहे, स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने गुणोंकी सीमाको प्राप्त नहीं कर पानेके कारण उत्कण्ठित हैं ॥ 14 ॥ आपके अतिरिक्त सभीका निषेध करते-करते निर्विशेष-वर्णनके बाद अन्तमें श्रुतियाँ आपके सविशेष विग्रहका ही वर्णन करती हैं :— श्रीमद्भागवत (10/87/41)में— द्युपतय एव ते न ययुरन्तमनन्ततया त्वमपि यदन्तराण्डनिचया ननु सावरणाः। । 293