श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
इक्कीसवाँ अध्याय 21/11-15 ] अनुभाष्य— यैः सुकल्पैः (सुनिपुणैः जनैः बहुजन्मना) वा [वितर्के] कालेन भू-पांशवः (पृथ्वीपरमाणवः) खे (आकाशे) मिहिकाः (हिमकरणाः) द्युभासः (दिवि ज्योतिष्काणां किरणपरमाणवः) अपि विमिताः (विशेषेण गणिताः) [तेषां] के (लोकाः) अस्य (विश्वस्य) हितावतीर्णस्य (मङ्गलाय प्रकटमानसस्य, पालनाय बहुगुणाविष्कारेण अवतीर्णस्य वा) गुणात्मनः (त्रिगुणाधिष्ठातुः) ते (तव) गुणान् अपि [पुनः] विमातुं (एतावन्तः इति गणयितुम्) ईशिरे (समर्थाः बभूवुः, दूरतः तद्विशेषवार्त्ता इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्राह भाष्य देखें। भाः 2/7/40 और 11/4/2 श्लोक देखें ॥ 11 ॥ स्वयं शेष भी श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करके उसका अन्त नहीं पाते :— ब्रह्मादि रहु—सहस्रवदने 'अनन्त'। निरन्तर गाय मुखे, ना पाय गुणेर अन्त ॥ 12 ॥ अनुवाद—ब्रह्मादिकी बात तो रहने ही दो—सहस्रवदन (हजार मुखवाले) अनन्त भी अपने मुखसे निरन्तर उनके गुणोंका गान करके श्रीकृष्णके गुणोंका अन्त नहीं पाते ॥ 12 ॥ अनुभाष्य—चार मुखोंसे ब्रह्मा अथवा पाँच मुखोंसे शिवकी बात तो दूर, अनन्तदेव निरन्तर सहस्र मुखोंसे गान करके भी उनके गुणोंकी सीमा नहीं प्राप्त करते। पाठान्तरमें,—“ब्रह्मादि रहु, अनन्त सहस्रवदन। निरन्तर गाय मुखे, ना पाय गणन ॥ ”12 ॥ श्रीमद्भागवत (2/7/41)में :— नान्तं विदाम्यहममी मुनयोऽग्रजास्ते मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये। गायन् गुणान् दशशतानन आदिदेवः शेषोऽधुनापि समवस्यति नास्य पारम् ॥ 13 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 13 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं ब्रह्मा और तुम्हारे अग्रज (बड़े भाई) सनकादि सभी मुनि मायाधीश पुरुषका अन्त नहीं जान सकते, तब और लोग कैसे जान सकते हैं? सहस्र मुखवाले अनन्तदेव भी उनका गुणोंका गान करते-करते आज तक भी उनका पार नहीं पा पाये ॥ 13 ॥ अनुभाष्य—ब्रह्मा अपने शिष्य नारदसे भगवान् विष्णुके लीलावतार-समूहकी चेष्टाएँ, प्रयोजन और विभूतियोंका वर्णन करके उनके दुर्ज्ञेय और अपरिमेय शक्तिवैभवके विषयमें बतला रहे हैं— पुरुषस्य (भगवतः) विष्णोः मायाबलस्य (मायाविभूतेः) अन्तम् अहं (ब्रह्मा) न विदामि (वेद्मि, तथा) ते (तव) अग्रजाः (भ्रातरः) अमी मुनयः (सनकादयः) च न जानन्ति; दशशताननः (सहस्रवदनः) आदिदेवः शेषः (भूधारी अनन्तः) अपि अस्य (भगवतः) गुणान् गायन् (कीर्त्तयन्) अधुना (साम्प्रतम्) अपि पारं (सीमानं) न समवस्यति (निश्चिनोति प्राप्नोतीत्यर्थः, अतः) ये अपरे (लोकाः, ते) कुतः [विदन्तीति भावः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 13 ॥ साक्षात् श्रीकृष्णके लिये भी उनके गुण अपरिमेय :— तँहो रहु—सर्वज्ञ-शिरोमणि श्रीकृष्ण। निज-गुणेर अन्त ना पाना हयेन सतृष्ण ॥ 14 ॥ अनुवाद—अनन्तदेवकी बातको तो रहने दो, सर्वज्ञ-शिरोमणि श्रीकृष्ण भी अपने ही गुणोंका अन्त नहीं पाकर उनको जाननेके लिये उत्कण्ठित रहते हैं ॥ 14 ॥ अनुभाष्य—'तँहो रहु'—अनन्तदेवकी बात तो दूर रहे, स्वयं श्रीकृष्ण भी अपने गुणोंकी सीमाको प्राप्त नहीं कर पानेके कारण उत्कण्ठित हैं ॥ 14 ॥ आपके अतिरिक्त सभीका निषेध करते-करते निर्विशेष-वर्णनके बाद अन्तमें श्रुतियाँ आपके सविशेष विग्रहका ही वर्णन करती हैं :— श्रीमद्भागवत (10/87/41)में— द्युपतय एव ते न ययुरन्तमनन्ततया त्वमपि यदन्तराण्डनिचया ननु सावरणाः। । 293
[ 21/15-18 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ख इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि हि फलन्त्यतन्निरसनेन भवन्निधनाः ॥ 15 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-आप—अनन्त हैं, इसलिये वे देवता भी आपका अन्त नहीं पा पाये। आप स्वयं भी अपने गुणोंका अन्त नहीं पाते। आकाशमें परमाणुओंकी भाँति आवरणसहित सभी ब्रह्माण्ड कालके साथ घूम रहे हैं। इस कारण हम श्रुतियाँ आपका अनुसन्धान करते हुए जिसे भी लक्ष्य करती हैं, वे आप नहीं हैं-ऐसा करते-करते [अन्तमें] सब कुछ ही आपमें पर्यवसित (समाप्त) होता है; इस प्रकार स्थिर करके आप ही सभीके आधार हैं,- ऐसा सिद्धान्त करती हैं॥ 15 ॥ अनुभाष्य-जनलोकमें ब्रह्मसत्रयज्ञमें श्रवणके इच्छुक ऋषियोंसे चतुःसनमेंसे एक ब्रह्मर्षि सनन्दनने श्रुतियोंके द्वारा की गयी इस भगवद्-स्तुतिका गान किया था, उसीका पुनः आदि ऋषि श्रीनारायणने देवर्षि नारदसे बादमें वर्णन किया था- हे भगवन्, द्युपतयः (स्वर्गाधिपाः लोकपतयः ब्रह्मादयः) एव (अपि) ते (तव) अनन्ततया (अन्ताभावेन) अन्तं (गुणसीमा) न ययुः (प्रापुः-यत् अन्तवद्वस्तु, तत् किमपि त्वं न भवसीत्यर्थः); [आस्तां द्युपतयः,] यद् (यस्मात्) त्वमपि [स्वयम् आत्मनः अन्तम् अनन्ततया न यासि]; ननु (अहो) यद् (यस्य तव) अन्तरा (मध्ये) सावरणाः (उत्तरोत्तरं दशगुणसप्तावरणसमन्विताः) अण्डनिचयाः (ब्रह्माण्ड-गणाः) वयसा (कालचक्रेण) खे (आकाशे) रजांसि इव सह [एकदैव न तु पर्यायेण] वान्ति (परिभ्रमन्ति); यद् (यस्मात्) श्रुतयः अतन्निरसनेन (निरन्तरं जड़निषेधेन) भवन्निधनाः (भवति त्वयि निधनं समाप्तिः यासां ताः सत्यः) त्वयि (चिद्विलास-विशेषमये) हि फलन्ति (पर्यवसन्ति)। श्लोक-भावानुवाद-हे भगवन्! स्वर्गादिके लोकपाल ब्रह्मादि भी आपके गुणोंका अन्त नहीं पाते, और स्वयं अनन्त होनेपर आप भी अपना अन्त नहीं पा पाते। अहो! आकाशमें धूलिके कण जिस प्रकार घूमते रहते हैं, उसी प्रकार आपमें भी (आपके रोमकूपोंमें) आवरणसहित (उत्तरोत्तर दस गुणा बड़े सात आवरणयुक्त) ब्रह्माण्डसमूह कालचक्रके द्वारा परिभ्रमण कर रहे हैं। इसलिये श्रुतियाँ आपके अतिरिक्त अन्यान्य सभी वस्तुओंको निषेध करते-करते अन्तमें आपके विशेष चिद्-विलास विग्रहमें ही पर्यवसित होती हैं॥ 15 ॥ व्रजमें श्रीकृष्णकी अद्भुत गोचारण-लीलाका वर्णन :- सेह रहु-व्रजे यबे कृष्ण-अवतार। ताँर चरित्र विचारिते मन ना पाय पार॥ 16 ॥ अनुवाद-वैकुण्ठादिमें श्रीकृष्णके ऐश्वर्य और उनके अनन्त गुणोंकी बात तो एक ओर रहे, व्रजमें जब श्रीकृष्णने अवतार लेकर ब्रह्म-विमोहनादि जो अद्भुत लीलाएँ कीं, उनका विचार करके मन और बुद्धिसे उन सबका पार नहीं पाया जा सकता॥ 16 ॥ बछड़ोंको चुरानेके कारण अपने चिद्विलासको प्रकट करके ब्रह्माके अहङ्कारका नाश :- प्राकृताप्राकृत सृष्टि कैला एकक्षणे। अशेष वैकुण्ठाण्ड स्व-स्व-नाथ-सने ॥ 17 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 17 ॥ अनुभाष्य-एक क्षणमें ही श्रीकृष्णने परव्योमनाथके साथ असंख्य अप्राकृत वैकुण्ठ लोकोंकी और अनेक ब्रह्मादिके साथ असंख्य प्राकृत ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि की ॥ 17 ॥ उस लीलाकी परम-चमत्कारिता :- एमत अन्यत्र नाहि शुनिये अद्भुत। याहार श्रवणे चित्त हय अवधूत ॥ 18 ॥ अनुवाद-ऐसी अद्भुत लीलाके विषयमें अन्यत्र कहीं भी नहीं सुना जाता, जिसे सुनने मात्रसे चित्त अभिभूत और शुद्ध हो जाता है॥ 18 ॥ अनुभाष्य-'अवधूत'-कम्पित, आन्दोलित, उद्वेलित, अभिभूत, पराहत। पाठान्तरमें, "याँहार श्रवणे चित्त-मल हय धूत।” अर्थात् जिसके श्रवणमात्रसे चित्तका मल धुल जाता है॥ 18 ॥ 294
इक्कीसवाँ अध्याय 21/19-26 ] श्रीकृष्णके द्वारा असंख्य गैयाओं और बछड़ोंको प्रकट करना :- “कृष्णवत्सैरसंख्यातैः”-शुकदेव-वाणी। कृष्ण-सङ्गे कत गोप संख्या नाहि जानि ॥ 19 ॥ अनुवाद-शुकदेव गोस्वामीने कहा है कि गोचारणमें जाते हुए श्रीकृष्णके साथ असंख्य बछड़े थे और उनके साथ कितने गोपबालक थे, उनकी भी गणना नहीं हो सकती अर्थात् वे भी असंख्य थे॥ 19 ॥ अनुभाष्य- “कृष्णवत्सैरसंख्यातैः”-भाः 10/12/3 श्लोकका प्रथम चरण॥ 19 ॥ एक एक गोप करे ये वत्स चारण। कोटि, अर्बुद, शङ्ख, पद्म, ताहार गणन ॥ 20 ॥ अनुवाद-एक-एक गोपबालक जितने बछड़ोंको चराते थे, उनकी संख्या भी करोड़, अरब, शङ्ख, पद्म आदि थी॥ 20 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णावतारमें ब्रह्माके द्वारा श्रीकृष्णकी महिमाकी परीक्षा करनेके लिये बछड़ों और गोपबालकोंको चुरानेपर श्रीकृष्णने अपनी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे प्राकृत एवं अप्राकृत वस्तुएँ, सभीको प्रकट किया था। उन्होंने चिन्मय गैयाओं, गोपबालकों और सम्पूर्ण वैकुण्ठतत्त्वको प्रकट करके अप्राकृत सृष्टिकी। अपने अपने ब्रह्माके साथ अनन्त ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करके प्राकृत सृष्टि की। इस अद्भुत कथाका श्रवण करनेसे चित्तका मल धुल जाता है। 'असंख्य कृष्णवत्स' इस शब्दके द्वारा श्रीकृष्णके साथ रहनेवाले सभी बछड़े एवं सभी गोपबालक असंख्य रूपमें प्रकट हुए॥ 17-20 ॥ अनुभाष्य- एकं दशं शतञ्चैव सहस्रमयुतं तथा। लक्षञ्च नियुतं चैव कोटिरर्बुदमेव च॥ वृन्दः खर्वो निखर्वश्च शङ्खपद्मौ च सागरः। अन्त्यं मध्यं परार्द्धञ्च दशवृद्ध्या यथाक्रमम्॥ [अर्थात् “दस-दस गुणा वृद्धिके द्वारा क्रमशः एक, दस, सौ, हजार, अयुत (दस-हजार), लाख, नियुत (दस लाख), करोड़, अर्बुद, वृन्द, खर्व, निखर्व, शङ्ख, पद्म, सागर, अन्त्य, मध्य और परार्द्ध संख्याकी गणना होती है।"] ॥ 20 ॥ वेत्र, वेणु, दल, शृङ्ग, वस्त्र, अलङ्कार। गोपगणेर यत, तार नाहि लेखा-पार ॥ 21 ॥ अनुवाद-गोप बालकोंके बेंत, वेणु, कमल-पुष्प, सींगा, वस्त्र और अलङ्कार आदि भी असंख्य थे॥ 21 ॥ श्रीकृष्णके द्वारा प्रकटित असंख्य वैकुण्ठनाथ और ब्रह्माण्डपतियोंके द्वारा श्रीकृष्ण-स्तुति :- सबे हैला चतुर्भुज वैकुण्ठेर पति। पृथक् पृथक् ब्रह्माण्डेर ब्रह्मा करे स्तुति ॥ 22 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णसे प्रकटित गोपबालक और बछड़े, सभी चतुर्भुज वैकुण्ठपति बन गये। अलग-अलग ब्रह्माण्डोंके ब्रह्मा श्रीकृष्णके साथ उन सब वैकुण्ठपतियोंकी स्तुति करने लगे ॥ 22 ॥ श्रीकृष्णसे लीलाका प्रकाश, श्रीकृष्णमें ही सङ्गोपन :- एक कृष्णदेह हैते सबार प्रकाशे। क्षणेके सबाइ सेइ शरीरे प्रवेशे ॥ 23 ॥ अनुवाद-वे सभी एक ही श्रीकृष्णकी देहसे प्रकाशित हुए और क्षणमात्रमें ही वे सभी उनके शरीरमें प्रवेश कर गये ॥ 23 ॥ ब्रह्माका विस्मय और मूर्च्छा, मूर्च्छाके बाद श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीकृष्णके ऐश्वर्यसे अवगत होना :- इहा देखि' ब्रह्मा हैला मोहित, विस्मित। स्तुति करि' सेइ पाछे करिला निश्चित ॥ 24 ॥ अधोक्षज श्रीकृष्णवैभव-निर्णयमें अपनी अक्षमता-ज्ञापन :- “ये कहे, - 'कृष्णेर वैभव मुञि सब जानौं' । से जानुक, - काय्मने मुञि एइ मानौं ॥ 25 ॥ एइ ये तोमार अनन्त वैभवामृतसिन्धु। मोर वाङ्मानसेर गम्य नहे एक बिन्दु ॥ 26 ॥ । 295
[ 21/24-31 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—श्रीकृष्णकी इस लीलाको देखकर हमारे ब्रह्माण्डके ब्रह्मा मोहित तथा विस्मित हो गये। श्रीकृष्णकी स्तुति करनेके पश्चात् उन्होंने निश्चित किया,—“जो कहता है कि मैं श्रीकृष्णके वैभवके विषयमें सब कुछ जानता हूँ, वह जानता है तो जाने, किन्तु मैं तो अपने काय और मनसे यही मानता हूँ कि आपके अनन्त वैभव-अमृतके सिन्धुकी एक बूँदकी महिमा भी मेरे वाणी और मनके अगोचर है॥ 24-26 ॥ श्रीमद्भागवत (10/14/38)में :— जानन्त एव जानन्तु किं बहूक्त्या न मे प्रभो। मनसो वपुषो वाचो वैभवं तव गोचरः ॥ "27 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 27 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो कहते हैं,—'मैं श्रीकृष्णतत्त्व जानता हूँ', तो वे जानें, किन्तु मैं बहुत कुछ बोलना नहीं चाहता हूँ। प्रभो! मैं केवल इतना ही कहता हूँ कि आपका समस्त वैभव—मेरे मन, शरीर और वाणीके अगोचर है॥ "27॥ अनुभाष्य—बछड़ोंको हरण करनेके फलस्वरूप श्रीकृष्णके द्वारा ब्रह्माका अभिमान चूर्ण होनेपर ब्रह्मा श्रीकृष्णके भक्तवात्सल्य और उनके अधोक्षज होनेका वर्णन कर रहे हैं— हे प्रभो, जानन्तः (विज्ञाः त्वदचिन्त्यानन्तगुणगण- ज्ञानाभिमानिनः) एव जानन्तु, बहूक्त्या (अति प्रजल्पेन) किम् (अधिक-वाग्वेगेन फलं नास्तीत्यर्थः)। तव वैभवं मे (मम ब्रह्मणः) वपुषः मनसः वाचः (कायमनोवाक्यानां) न गोचरः (न विषयः, न स्पर्शाधिकारः भवति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 27 ॥ श्रीकृष्णसे अभिन्न श्रीवृन्दावन-धाम :— कृष्णेर महिमा रहु—केबा तार ज्ञाता। वृन्दावन-स्थानेर देख आश्चर्य विभुता ॥ 28 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी महिमाकी बात तो छोड़ो, उसे कौन जान सकता है? वृन्दावन धामकी ही आश्चर्यपूर्ण सर्वव्यापकताको देखो॥ 28 ॥ वृन्दावनके एक प्रान्तमें परव्योममें स्थित अनन्त करोड़ों वैकुण्ठ :— षोलक्रोश वृन्दावन,—शास्त्रेर प्रकाशे। तार एकदेशे वैकुण्ठजाण्डगण भासे ॥ 29 ॥ अनुवाद—शास्त्रोंके अनुसार वृन्दावनका परिमाण मात्र सोलह कोस है, किन्तु उसी वृन्दावनके एक भागमें ही अनन्तकोटि वैकुण्ठ और अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड स्थित हैं॥ 29 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—व्रजमण्डलमें जो बारह वन हैं—वे सब मिलाकर चौरासी कोस परिमाण होता है। उनमेंसे वृन्दावन-नामक वन वर्तमान समयमें वृन्दावन-नगरकी सीमासे नन्दग्राम-वृषभानुपुर (बरसाना) तक सोलह कोस है॥ 29 ॥ अनुभाष्य—शास्त्रोंमें वृन्दावन 'सोलह कोस'का कहा गया है। इसीके एक भागमें समस्त वैकुण्ठ और बहुत विस्तृत ब्रह्माण्ड प्रकाशित हैं॥ 29 ॥ असीम श्रीकृष्णवैभवसिन्धुकी एक बूँदका निर्देश :— अपार ऐश्वर्य कृष्णेर—नाहिक गणन। शाखा-चन्द्र-न्याये करि दिग्दर्शन ॥ 30 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका ऐश्वर्य अपार है—उसकी गणना नहीं की जा सकती। मैं तो केवल शाखा-चन्द्र-न्यायसे उसका दिग्दर्शन करा रहा हूँ॥ 30 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'शाखा-चन्द्र-न्याय'—चन्द्रको एक शाखाके पीछे दिखलाकर जिस प्रकार चन्द्रका परिचय दिया जाता है, उसी प्रकार किसी तत्त्वके एक भागको दिखलाकर सब भागोंका कुछ ज्ञान दिया जाता है। इसी न्यायको 'शाखा-चन्द्र-न्याय' कहते हैं॥ 30 ॥ वाणी और मनसे अतीत श्रीकृष्णके ऐश्वर्यके वर्णनमें महाप्रभुकी विह्वलता :— ऐश्वर्य कहिते स्फुरिल ऐश्वर्य-सागर। मनेन्द्रिय डुबिला, प्रभु हइला फाँपर ॥ 31 ॥ 296 ।
इक्कीसवाँ अध्याय 21/31-33 ] भागवतेर एइ श्लोक पड़िला आपने। अर्थ आस्वादिते सुखे करेन व्याख्याने ॥ 32 ॥ अनुवाद—ऐश्वर्यकी बात कहते हुए महाप्रभुके मनमें श्रीकृष्णका ऐश्वर्य-सागर स्फुरित हो उठा, उनके मन तथा इन्द्रियाँ उसीमें डूब गये और वे मुग्ध हो गये। तब महाप्रभुने भागवतका एक श्लोक पढ़ा और उस श्लोकके अर्थका आस्वादन करनेके लिये स्वयं आनन्दपूर्वक उसकी व्याख्या करने लगे॥ 31-32॥ तीनों सर्गोंके अधीश्वर अद्वितीय अविनश्वर लोकपालोंके द्वारा पूजित विग्रह :- श्रीमद्भागवत (3/2/21)में— स्वयन्त्वसाम्यातिशयस्त्र्यधीशः स्वराज्यलक्ष्म्याप्तसमस्तकामः। बलिं हरद्भिश्चिरलोकपालैः किरीटकोटीड़ितपादपीठः॥ 33॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 33॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वे स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और शिवके अधीश्वर हैं, इसलिये वे समान, हीन और अतिशयसे रहित हैं एवं स्वाराज्यलक्ष्मीके द्वारा उनकी समस्त कामनायें पूर्ण हुई हैं। चिरकालसे सभी लोकपाल उनकी पूजा करनेके लिये आकर उनकी पादपीठकी (चरणकमलोंकी) स्तुति करते हुए अपने मस्तकपर सुशोभित मुकुटोंको झुकाकर प्रार्थना किया करते हैं॥ 33॥ अनुभाष्य—लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डमें ‘श्रीकृष्ण —श्रीनारायणके विलास हैं’ इस पूर्वपक्षका खण्डन करते हुए उत्तरपक्ष वर्णनमें 302-323 संख्यामें इस श्लोककी व्याख्या और कारिका देखें। श्रीकृष्णके अप्रकट होनेपर श्रील उद्धव उनके वियोगमें शोकाकुल होकर श्रीविदुरसे श्रीकृष्णके बालचरित और परम-ऐश्वर्यका वर्णन कर रहे हैं— स्वयं [भगवान्] तु असाम्यातिशयः (न साम्यम् अतिशयश्च यस्मात् सः असमोर्ध्वः), त्र्यधीशः (गोलोकपरव्योमदेवीधाम्नां, गोकुल-मथुरा-द्वारकाधाम्नां वा, कारणं च समष्टिः हिरणयोगर्भो वा व्यष्टिः विराट् वेति सर्गत्रयाणां वा, सत्त्वरजस्तमोगुणाधिष्ठातृणां विष्णुब्रह्माशिवानां वा, चिज्जीवमायाशक्तीनां वा, भूर्भुवःस्वरिति व्याहृतित्रयाणां वा, स्वर्गमर्त्य-पाताल-लोकत्रयाणां वा ईशः अधिपतिः) स्वराज्यलक्ष्म्याप्तसमस्तकामः (परमचिदानन्दस्वरूप- सम्पत्त्या एव लब्धनिखिलभोगः) बलिं (करम् अर्हणं वा) हरद्भिः (समर्पयद्भिः) चिरलोकपालैः (चिरकालीनैः ब्रह्मरुद्राद्यैः) किरीट-कोटीड़ित-पादपीठः (किरीटकोटिभिः कोटि मुकुटाग्रैः ईड़ितं वन्दितं पादपीठं पादसिंहासनं यस्य सः-उग्रसेनं यत् न्यबोधयत्, तत् नः विग्लापयतीत्युत्तरेणान्वयः)। श्लोक-भावानुवाद—जो स्वयं भगवान् हैं, जिनके समान अथवा जिनकी अपेक्षा कोई बड़ा नहीं है, जो तीनों लोकों (गोलोक, परव्योम, देवीधाम; अथवा गोकुल, मथुरा, द्वारका; अथवा कारणोदकशायी, गर्भोदकशायी, पयोब्धीशायी नामक तीन पुरुषोंके; अथवा सतोगुण, रजोगुण, तमोगुणके अधिष्ठातृ देवता क्रमशः विष्णु, ब्रह्मा, शिवके; अथवा भूर्भुवःस्वःके; अथवा स्वर्ग-मर्त्य-पातालके) अधीश्वर हैं, परम चिदानन्द स्वरूप सम्पत्तिके द्वारा जिन्होंने समस्त काम्य वस्तुओंको प्राप्त किया है, पूजोपहार समर्पण करके ब्रह्मादि चिरलोकपाल करोड़ों-करोड़ों मुकुटोंके अग्रभागके द्वारा जिनकी पादपीठकी पूजा करते हैं, वे ही श्रीकृष्ण उग्रसेनके अनुवर्ती होकर चलेंगे, यही उनके दास—हमारे लिये अत्यन्त दुःखका विषय है। (इसका अगले श्लोक ‘तत् नः विग्लापयत्’ के साथ अन्वय करें।)।॥ 33 ॥ अमृतानुकणा—श्रीश्रीमद् रूप गोस्वामी प्रभुने उनके श्रीलघुभागवतामृत-ग्रन्थमें आलोच्य ‘स्वयन्त्वसाम्यातिशय- स्त्र्यधीशः’ (भाः 3/2/21)-श्लोककी जो व्याख्या अपनी कारिकामें प्रदान की है, वह इस प्रकार है,— ‘असाम्यातिशयः’—जिनका अन्यके साथ साम्य नहीं है और जिनसे आधिक्य नहीं है, इन दो विशेषणोंके द्वारा सभी भगवद्-स्वरूपोंसे श्रीकृष्णका उत्कर्ष निरूपित हुआ है, इसलिये यहाँपर परव्योमनाथकी अपेक्षा भी श्रीकृष्णका आधिक्य प्रदर्शित हुआ है। ‘स्वयं’—इस । 297
[ 21/33-34 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पदके द्वारा अन्य किसीकी भी अपेक्षा करके श्रीकृष्णका स्वरूपादि प्रकाशित नहीं हुआ है, यही यहाँ कहा गया है। श्रीमद्भागवतमें श्रीदशरथ-नन्दन श्रीरामचन्द्रके सम्बन्धमें भी कहा गया है,- 'अधिकसाम्यविमुक्तधाम्नः' (भाः 9/11/20)-उनका प्रभाव आधिक्य और साम्यरहित है। किन्तु ऐसा होनेपर भी 'स्वयं' यह पद प्रयोग नहीं हुआ है। इसलिये श्रीकृष्णके साथ श्रीरामका ऐक्य होनेके कारण ही उक्त 'अधिकसाम्यविमुक्तधाम्नः' विशेषण प्रयोग हुआ है, ऐसा जानना होगा, क्योंकि श्रीकृष्ण और श्रीरामके बीचमें नरलीला, नराकार, नरस्वभावका साम्य है और उसी कारण ही श्रीकृष्णको श्रीरामरूप अतिशय प्रिय हैं। ब्रह्माण्डपुराणमें श्रीकृष्णवाक्यमें भी यह व्यक्त हुआ है,- "अन्तरङ्गस्वरूपा से मत्स्य-कूर्मादयस्त्वमी। सर्वात्मनायमत्रापि श्रीमद्दशरथात्मजः ॥" अर्थात् 'मत्स्य- कूर्मादि अवतारसमूह मेरे अन्तरङ्गस्वरूप हैं, इनमेंसे भी दशरथपुत्र श्रीराम-स्वरूप ही सभी प्रकारसे अर्थात् नरलीलादि-साम्यसे मेरे अतिशय प्रिय हैं।' “स्वयन्त्वसाम्यातिशयः", "कृष्णस्तु भगवान् स्वयं" (भाः 1/3/28)-इन दो श्लोकोंमें श्रीकृष्णके विशेष परमेश्वरत्वके वर्णनमें जो 'स्वयं'-पद दो बार कहा गया है, यह श्रीकृष्णके अन्य स्वरूपके सहित समान धर्मके ऐक्यके कारण नहीं है, उनका आधिक्य स्वतःसिद्ध है। “त्र्यधीशः”-गोलोक, मथुरा और द्वारका-नामक जो तीन धाम हैं, उनके अधिपति होनेसे श्रीकृष्ण अधीश्वर हैं; अथवा प्रकृतिपर ईक्षण करनेवाले (नियन्ता) कारणोदशायी, विराटके अन्तर्यामी गर्भोदशायी और क्षीरोदशायी-इन तीन पुरुषावतारोंके ऊपर स्थित ईश्वर होनेके कारण वे 'त्र्यधीश' हैं। 'स्वराज्यलक्ष्म्या आप्तसमस्तकामः'-स्वराज्य-लक्ष्मीके कारण समस्त कामनायें जिनकी पूर्ण हुई हैं। वे 'स्व'-द्वारा अर्थात् आत्मके द्वारा अथवा आत्मभूता श्रेष्ठ शक्तिके द्वारा विराज करते हैं, इसलिये वे 'स्वराट्' हैं। वह स्वराट्जनित भाव (धर्म) ही 'स्वाराज्य'के नामसे कहा जाता है। वह स्वाराज्य ही लक्ष्मी अर्थात् सबसे भी बहुत अधिक सम्पत्ति है। इसी कारण उनकी समस्त कामनायें पूर्ण हुई हैं। 'समस्तकाम'-शब्दसे अभीष्ट विषयोंकी सम्पूर्ण सिद्धिको समझना होगा। 'चिरलोकपाल'-अर्थात् चिरजीवी (दीर्घजीवी), लोकपाल-पद्मज ब्रह्मादि; उन लोकपालगणोंके करोड़ों मुकुटोंके द्वारा अर्थात् सैकड़ों-सैकड़ों अर्बुद मुकुटोंके द्वारा जिनकी दो पादपीठ (दो पादुकायें) पूजित अर्थात् संस्तुत हुई हैं, वे श्रीकृष्ण हैं। हीरे आदि रत्नमय मुकुटसमूहके द्वारा पादपीठके निकट एकत्रित लोकपालोंकी भीड़में प्रकटित जो शब्द-परम्परा होती है, वही 'स्तुति'-रूपमें प्रकाशित हुई है। 'बलिं हरद्भिः'-अपने अपने कार्यमें अवस्थित ब्रह्मादि लोकपालोंके द्वारा भगवान्की आज्ञा पालनको ही यहाँपर 'बलिहरण' कहा गया है। अनेक प्रकारके अनन्त विचित्र ब्रह्माण्ड भगवद्- शक्तिसे प्रकाशमान होते हैं। श्रीहरिकी शक्तिकी विचित्रताके कारण कुछ ब्रह्माण्डोंका परिमाण सौ करोड़ योजन, कुछ ब्रह्माण्डोंका परिमाण निखर्व योजन, कुछ ब्रह्माण्डोंका परिमाण पद्मायुत योजन, और कुछका परिमाण सौ परार्द्ध योजन होता है। उनमें किसी ब्रह्माण्डमें बीस भुवन, किसी ब्रह्माण्डमें पचास, किसी ब्रह्माण्डमें सौ, किसी ब्रह्माण्डमें हजार, किसी ब्रह्माण्डमें दस हजार और किसी ब्रह्माण्डमें एक लाख भुवन हैं। उन सब ब्रह्माण्डोंमें ब्रह्मा-इन्द्रादि लोकपालगण अनेक रूपोंमें विराजमान हैं। उन्हें 'चिरलोकपाल' कहा जाता है। उनके करोड़ों-करोड़ों मुकुटोंके द्वारा श्रीकृष्णकी इस पादपीठकी स्तुति होती है॥ 33 ॥ श्रीकृष्ण-(1) असमोर्ध्व :- परम ईश्वर कृष्ण स्वयं भगवान्। ताते बड़, ताँर सम केह नाहि आन ॥ 34 ॥ अनुवाद-[महाप्रभु उपरोक्त श्लोककी व्याख्या करते हुए कह रहे हैं-] परम ईश्वर श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् 298 ।
इक्कीसवाँ अध्याय 21/34-41 ] हैं। श्रीकृष्णसे बड़ा अथवा उनके समान अन्य कोई नहीं है॥ 34 ॥ ब्रह्मसंहिता (5/1) में :- ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥ 35 ॥ अनुवाद-सच्चिदानन्द-विग्रह श्रीकृष्ण ही परमेश्वर हैं; वे स्वयं अनादि और सभीके आदि एवं समस्त कारणोंके कारण हैं॥ 35 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/107 संख्या देखें ॥ 35 ॥ श्रीकृष्ण-(2) त्र्यधीश; (क) गुणावतारगत प्रथम (बाह्य) अर्थ :- ब्रह्मा, विष्णु, हर, -एइ सृष्ट्यादि-ईश्वर। तिने आज्ञाकारी कृष्णेर, कृष्ण-अधीश्वर ॥ 36 ॥ अनुवाद-ब्रह्मा, विष्णु, महेश-ये तीनों क्रमशः सृष्टि, स्थिति और प्रलयके ईश्वर हैं। ये तीनों भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं और श्रीकृष्ण इन तीनोंके नियन्ता होनेके कारण इनके अधीश्वर हैं॥ 36 ॥ अनुभाष्य-'ब्रह्मा'-जगत्की सृष्टि करनेवाले, 'विष्णु'-जगत्का पालन करनेवाले, 'हर'-जगत्का संहार करनेवाले, ये तीन कार्य करनेवाले श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करनेवाले दास हैं; श्रीकृष्ण ही एकमात्र सर्वेश्वर हैं॥ 36 ॥ श्रीमद्भागवत (2/6/32) में :- सृजामि तन्नियुक्तोऽहं हरो हरति तद्वशः। विश्वं पुरुषरूपेण परिपाति त्रिशक्तिधृक्॥ 37 ॥ अनुवाद-ब्रह्माने कहा-हरिके द्वारा नियुक्त होनेपर ही मैं सृष्टि करता हूँ, उनकी आज्ञासे ही शिव नाश करते हैं, (अन्तरङ्गा, बहिरङ्गा और तटस्था) तीन शक्तियोंको धारण करनेवाले वे हरि ही पुरुषरूपमें विश्वका पालन करते हैं॥ 37 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 20/318 संख्या देखें ॥ 37 ॥ (ख) पुरुषावतारगत दूसरा (बाह्य) अर्थ :- ए सामान्य, त्र्यधीश्वरेर शुन अर्थ आर। जगत्कारण तीन पुरुषावतार ॥ 38 ॥ महाविष्णु, पद्मनाभ, क्षीरोदकस्वामी। एइ तिन-स्थूल-सूक्ष्म-सर्व-अन्तर्यामी ॥ 39 ॥ एइ तिन-सर्वाश्रय, जगत्-ईश्वर। इँहो-कला-अंश याँर, कृष्ण-अधीश्वर ॥ 40 ॥ अनुवाद-मैंने त्र्यधीशका गुणावतारके सम्बन्धमें जो अर्थ पहले किया है, वह सामान्य अर्थ है। अब तुम त्र्यधीश्वरका अन्य अर्थ सुनो। तीनों पुरुषावतार जगत्के कारण हैं। महाविष्णु, पद्मनाभ और क्षीरोदकशायी विष्णु-ये तीनों ईश्वर क्रमशः सर्व-अन्तर्यामी, सूक्ष्म-अन्तर्यामी और स्थूल अन्तर्यामी हैं। ये तीनों सभीके आश्रय और जगत्के ईश्वर होनेपर भी स्वयं भगवान् श्रीकृष्णके कला तथा अंश है-इसलिये श्रीकृष्ण इन तीनोंके अधीश्वर हैं॥ 38-40 ॥ अनुभाष्य- 'महाविष्णु'-कारणोदशायी अर्थात् सर्वान्तर्यामी हैं; 'पद्मनाभ'-ब्रह्माकी सृष्टि करनेवाले गर्भोदशायी अर्थात् हिरण्यगर्भ, समष्टि अथवा सूक्ष्मान्तर्यामी हैं; और 'क्षीरोदकस्वामी'-विष्णु अर्थात् विराट, व्यष्टि स्थूलान्तर्यामी हैं॥ 39 ॥ ब्रह्मसंहिता (5/44)में :- यस्यैकनिश्वसितकालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः। विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ 41 ॥ अनुवाद-ब्रह्माण्डनाथ अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु-महेश, जिनके रोमकूपोंसे जन्म ग्रहण करते हैं और उनके निःश्वास-काल तक अवस्थित रहते हैं, वे महाविष्णु जिनके कला हैं, उन आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥ 41 ॥ । 299
[ 21/41-49 শ্রীশ্রীচৈতন্যচরিতামৃত মধ্যলীলা अनुभाष्य— आदिलीला 5/71 संख्या देखें ॥ 41 ॥ (ग) श्रीकृष्णाधीन धामगत तीसरा (गुह्य) अर्थ :- एइ अर्थ—बाह्य, शुन 'गूढ़' अर्थ आर। तिन आवास-स्थान कृष्णेर, शास्त्रे ख्याति यार ॥ 42 ॥ अनुवाद— 'त्र्यधीश'-शब्दका उपरोक्त अर्थ भी बाह्य है। अब तुम गूढ़ अर्थ सुनो। शास्त्रोंमें ऐसी प्रसिद्धि है कि श्रीकृष्णके तीन आवास-स्थान हैं ॥ 42 ॥ अनुभाष्य— तिन आवास-स्थान'—(1) अन्तर-आवास गोलोक, (2) मध्यम-आवास परव्योम, (3) बाह्य-आवास देवीधाम ॥ 42 ॥ (1) अन्तर-आवास गोलोक-वृन्दावनका वर्णन :— 'अन्तःपुर'—गोलोक-श्रीवृन्दावन। याँहा नित्यस्थिति मातापिता-बन्धुगण ॥ 43 ॥ मधुर ऐश्वर्य-माधुर्य-कृपादि-भाण्डार। योगमाया—दासी, याँहा रासादि लीला-सार ॥ 44 ॥ अनुवाद— 'अन्तःपुर'—गोलोक-श्रीवृन्दावन है। वहाँपर श्रीकृष्णके माता-पिता-बन्धु-बान्धवोंका नित्य वास है। वह श्रीकृष्णके ऐश्वर्य, माधुर्य और कृपा आदिका भण्डार है। वहाँ योगमाया श्रीकृष्णकी दासीके रूपमें कार्य करती है और श्रीकृष्णकी समस्त लीलाओंकी सार रासलीला उसी वृन्दावनमें ही प्रकाशित होती है ॥ 44 ॥ गोस्वामिपादोक्त-श्लोक :— करुणानिकुरम्बकोमले मधुरैश्वर्यविशेषशालिनि। जयति व्रजराजनन्दने न हि चिन्ताकणिकाभ्युदेति नः॥ 45 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—करुणासमूहके द्वारा कोमल, विशेष माधुर्य-ऐश्वर्यसे युक्त व्रजराजनन्दनके जययुक्त होनेसे हमारी चिन्ताकणिकाका अर्थात् लेशमात्र चिन्ताका भी उदय नहीं हो सकता ॥ 45 ॥ अनुभाष्य— करुणानिकुरम्बकोमले (करुणासमूहेन कोमलः स्वभावः यस्य सः तस्मिन्) मधुरैश्वर्यविशेषशालिनि (माधुर्यैश्वर्य-विचित्र- सम्पत्तिसम्पन्ने) व्रजराजनन्दने (कृष्णे) जयति (सर्वोत्कर्षमाविष्कुर्वति) नः (अस्माकं) चिन्ताकणिका (चिन्तालेशमात्रम् अपि) न अभ्युदेति (आविर्भवति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥ (2) मध्यम आवास विष्णुलोक वैकुण्ठ-वर्णन :— तार तले परव्योम— 'विष्णुलोक'—नाम। नारायण-आदि अनन्त स्वरूपेर धाम ॥ 46 ॥ 'मध्यम-आवास' कृष्णेर—षडैश्वर्य-भाण्डार। अनन्त स्वरूपे याँहा करेन विहार ॥ 47 ॥ अनन्त वैकुण्ठ याँहा—भाण्डार-कोठरि। पारिषदगणे षडैश्वर्ये आछे भरि' ॥ 48 ॥ अनुवाद—गोलोक-वृन्दावनके नीचे परव्योम है जिसे विष्णुलोक कहा जाता है। वह श्रीनारायणादि अनन्त भगवत्-स्वरूपोंका धाम है। षडैश्वर्योंका भण्डार परव्योम श्रीकृष्णका मध्यम-आवास है। परव्योममें असंख्य वैकुण्ठ लोक उस भण्डारके एक-एक कक्षके समान हैं और वे सभी समस्त ऐश्वर्योंसे युक्त हैं। उन असंख्य वैकुण्ठ लोकोंमें भगवान्के अनन्त स्वरूपोंके नित्य पार्षद उनके साथ वास करते हैं और वे सभी षडैश्वर्योंसे परिपूर्ण हैं ॥ 46-48 ॥ ब्रह्मसंहिता (5/43) में :— गोलोकनाम्नि निजधाम्नि तले च तस्य देवी-महेश-हरिधामसु तेषु तेषु। ते ते प्रभावनिचया विहिताश्च येन गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ 49 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 49 ॥ 300 ।
इक्कीसवाँ अध्याय 21/49-53 ] अमृतप्रवाह भाष्य—गोलोक-नामक निज-धामके नीचे देवी, महेश और हरिके धामसमूहमें जिन्होंने उन समस्त प्रभावोंको स्थापित किया है, मैं उन आदिपुरुष गोविन्दका भजन करता हूँ॥49॥ अनुभाष्य— तस्य (कृष्णस्य) गोलोकनाम्नि निजधाम्नि तले (निम्नभागे) देवीमहेशहरिधामसु (पारम्पर्यक्रमेण वैकुण्ठ-शिवधाम-देवीधामसु) तेषु तेषु च येन (गोविन्देन) ते ते प्रभावनिचयाः (विक्रमसमूहाः) विहिताः (स्थापिताः) च, तम् आदिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके निजधाम गोलोकके नीचे यथाक्रमसे हरिधाम (वैकुण्ठ), महेश (शिव) धाम और देवी धाममें जिन्होंने यथायोग्यरूपसे अपने समस्त विक्रमको स्थापित किया है, उन आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥49॥ विरजामें अवस्थानका वर्णन :— पाद्मोत्तरखण्ड (255/57)में— प्रधान-परमव्योम्नोरन्तरे विरजा नदी। वेदाङ्गस्वेदजनितैस्तोयैः प्रस्राविता शुभा ॥50॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रधान अर्थात् मायिकतत्त्व और परव्योम, इन दोनोंके बीचमें विरजा-नदी है; वह नदी मङ्गलजनक वेदाङ्ग अर्थात् पुरुषके पसीनेसे उत्पन्न जलसे युक्त है॥50॥ अनुभाष्य— प्रधान-परमव्योम्नाः (देवीधाम-वैकुण्ठयोः) अन्तरे (मध्ये) वेदाङ्गस्वेदजनितैः (वेदाः अङ्गानि यस्य-“अस्य निश्वसितम्” इति श्रुतेः, तस्य भगवतः घर्मोद्भवैः) तोयैः (सलिलैः) प्रस्राविता (प्रवाहिता) शुभा (जड़क्रियाहीना नैष्कर्मरूपिणी चिन्मात्रमयी) विरजा नदी [वर्त्तते]। श्लोक-भावानुवाद—देवीधाम और वैकुण्ठके बीचमें [श्रुतिओंके अनुसार वेद जिनके निःश्वास उत्पन्न होनेके कारण जिनके अङ्ग हैं] उन भगवान्के पसीनेसे उत्पन्न जलके प्रवाहसे बनी मङ्गलजनक (जड़क्रियाहीन नैष्कर्मरूपी चिन्मात्रमयी) विरजा नदी है॥50॥ परव्योम अथवा वैकुण्ठमें अवस्थानका वर्णन :— पाद्मोत्तरखण्ड (255/58)में— तस्याः पारे परव्योम त्रिपाद्भूतं सनातनम्। अमृतं शाश्वतं नित्यमनन्तं परमं पदम्॥51॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥51॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उस विरजाके परे अमृत, नित्य, सनातन, अनन्त, परमपद-स्वरूप, त्रिपादभूत परव्योम है, तात्पर्य यह है कि परव्योम चिद्-जगत् है। इसलिये अशोक, अभय और अमृतरूप त्रिपाद-विभूति उसमें नित्य वर्तमान है। समस्त मायिक वस्तुएँ मिलकर श्रीकृष्णकी एकपाद विभूतिमात्र हैं॥51॥ अनुभाष्य— तस्याः (विरजायाः नद्याः) पारे (तटे) त्रिपाद्भूतं (तुरीयं) सनातनम् (नित्यवर्त्तमानम्) अमृतम् (अक्षयं) शाश्वतं नित्यम् अनन्तं परमं पदं परव्योम। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥51॥ (3) बाह्य आवास देवीधाम ही जीवके भोगका क्षेत्र मायाराज्य :— तार तले ‘बाह्यावास’ विरजार पार। अनन्त ब्रह्माण्ड याँहा कोठरि अपार ॥52॥ ‘देवीधाम’ नाम तार, जीव यार वासी। जगल्लक्ष्मी राखे, याँहा रहे मायादासी ॥53॥ अनुवाद—उस परव्योमके नीचे विरजाके इस पार श्रीकृष्णका बाह्य आवास है। अनन्त प्राकृत-ब्रह्माण्ड ही इस बाह्य-आवासके अनन्त कक्ष हैं। इसका नाम देवीधाम है। (श्रीकृष्णविमुख) बद्धजीव इस देवीधामके निवासी हैं। जगत्-लक्ष्मी इस जगत्के जीवोंकी रक्षा करती है और उनकी दासी माया ही इस जगत्की अधिष्ठात्री है॥52-53॥ । 301
[ 21/53-59 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
अनुभाष्य- 'जीव'-भोग परायण बद्धजीव देवीधाममें वास करते हैं; स्वराज्यलक्ष्मी श्रीकृष्ण सेविका होकर श्रीकृष्णकी अभिलाषाएँ पूर्ण करती हैं, जगत्-लक्ष्मी देवीधामवासी जीवोंकी रक्षा करती हैं। 'याँहा'-इस देवीधाममें जगत्-लक्ष्मीकी दासी माया ही अधिष्ठात्री हैं॥ 53 ॥
एइ तिन धामेर हय कृष्ण अधीश्वर। गोलोक-परव्योम-प्रकृतिर पर ॥ 54 ॥
अनुवाद-[गोलोक, परव्योम और देवीधाम-] इन तीनों धामोंके श्रीकृष्ण ही अधीश्वर हैं। गोलोक और परव्योम प्रकृति अथवा मायासे अतीत चिन्मय धाम हैं॥ 54 ॥
अनुभाष्य- 'तीन धाम'-सर्वोपरिधाम गोलोक, हरिधाम-परव्योम और देवीधाम हैं। देवीधामसे मुक्त जीव परव्योममें हरिसेवा प्राप्त नहीं करनेपर महेश-धाम प्राप्त करते हैं। देवीधामसे ऊपर होनेपर भी वह (महेश-धाम) हरिधाम-परव्योम नहीं है॥ 54 ॥
शुद्धसत्त्वमय चिद्-शक्ति विलास तद्-रूपवैभव-श्रीकृष्णकी तीन पाद विभूति, देवीधाम-एकपाद-विभूति :- चिच्छक्तिविभूति-धाम-त्रिपादैश्वर्य-नाम। मायिक विभूति-एकपाद अभिधान ॥ 55 ॥
अनुवाद-भगवान्की चिद्-शक्तिकी विभूति चिन्मय-जगत्को त्रिपाद-ऐश्वर्यके नामसे जाना जाता है (इसमें भगवान्की तीन चौथाई शक्ति और ऐश्वर्य विराजमान हैं)। भगवान्की मायिक विभूति मायिक जगत्को एकपाद विभूति कहा जाता है (इसमें भगवान्की एक चौथाई शक्ति विराजमान है) ॥ 55 ॥
अनुभाष्य-हरिधाम-परव्योम और गोलोक-अप्राकृत चिद्-शक्ति-विभूतिसे युक्त धाम हैं और उन्हें 'त्रिपाद- ऐश्वर्य'के नामसे कहा जाता है। मायिक-विभूतिसे युक्त देवीधाम, 'एकपाद'-नामसे प्रसिद्ध है॥ 55 ॥
त्रिपादविभूति-मायातीता और एकपादविभूति-मायिक :- लघुभागवतामृत (1/563)में- त्रिपाद्विभूतेर्धामत्वात् त्रिपाद्भूतं हि तत् पदम्। विभूतिर्मायिकी सर्वा प्रोक्ता पादात्मिका यतः ॥ 56 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 56 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'त्रिपादविभूति' धाम होनेके कारण उस पदको त्रिपादभूत कहते हैं, और समस्त मायिक विभूति-एकपादमात्र है ॥ 56 ॥
अनुभाष्य- तत्पदं त्रिपादविभूतेर्धामत्वात् त्रिपादभूतं हि (त्रिचरणात्मकम् एव उच्यते); यतः सर्वा मायिकी विभूतिः पादात्मिका (एकचरणा) प्रोक्ता (कथिता)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 56 ॥
एकपादविभूति देवीधामका वर्णन :- त्रिपादविभूति कृष्णेर-वाक्य-अगोचर। एकपाद विभूतिर शुनह विस्तार ॥ 57 ॥ 'चिरलोकपाल'-शब्दका अर्थ :- अनन्त ब्रह्माण्डेर यत ब्रह्मा-रुद्रगण। चिरलोकपाल-शब्दे ताँहार गणन ॥ 58 ॥
अनुवाद-भगवान् श्रीकृष्णकी तीन पाद विभूति अनन्त होनेके कारण वर्णनसे परे है। हे सनातन! तुम एकपाद विभूतिके विस्तारके विषयमें श्रवण करो। अनन्त ब्रह्माण्डोंके जितने ब्रह्मा-रुद्रादि लोकपाल हैं, उन्हें 'चिरलोकपाल' कहा जाता है ॥ 57-58 ॥
अनुभाष्य- 'चिरलोकपाल'-ब्रह्माण्डके आधिकारिक चिरस्थायी-कार्यकारक ब्रह्मा-रुद्रादि हैं। लोकपाल शब्दसे साधारणतः आठ दिक्पाल-इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, निर्ऋति, वायु, कुबेर और शिवको समझा जाता है॥ 58 ॥
श्रीकृष्णके ऐश्वर्यके दर्शनके लिये आये ब्रह्माके अहङ्कारके नाशके सम्बन्धमें एक पौराणिक-उपाख्यान :- एकदिन द्वारकाते कृष्ण देखिबारे। ब्रह्मा आइला,-द्वारपाल जानाइल कृष्णेरे ॥ 59 ॥
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इक्कीसवाँ अध्याय 21/59-77 ] कृष्ण कहेन, — “कोन् ब्रह्मा, कि नाम ताहार ?” द्वारी आसि' ब्रह्मार पुछे आर बार ॥ ६० ॥ विस्मित हञा ब्रह्मा द्वारीके कहिला। 'कह गिया सनक-पिता चतुर्मुख आइला ॥' ६१ ॥ कृष्णे जानाञा द्वारी ब्रह्मार लञा गेला। कृष्णेर चरणे ब्रह्मा दण्डवत् कैला ॥ ६२ ॥ कृष्ण मान्य-पूजा करि' ताँरे प्रश्न कैल। “कि लागि' तोमार इँहा आगमन हैल?” ॥ ६३ ॥ ब्रह्मा कहे, — “ताहा पाछे करिब निवेदन। एक संशय मने हय, करह छेदन ॥ ६४ ॥ 'कोन् ब्रह्मा ?' पुछिले तुमि कोन् अभिप्रागे? आमा वइ जगते आर कोन् ब्रह्मा हये ?” ६५ ॥ अनुवाद—एकदिन चतुर्मुख ब्रह्मा श्रीकृष्णके दर्शनके लिये भौम-द्वारकामें आये और द्वारपालने उनके आनेका संवाद जाकर श्रीकृष्णको दिया। श्रीकृष्णने पूछा, — “कौनसे ब्रह्मा आये हैं, उनका नाम क्या है?” द्वारपालने आकर ब्रह्मासे वही प्रश्न पूछा। विस्मित होकर ब्रह्माने द्वारपालसे कहा, — ‘जाओ, और जाकर कहो कि सनकके पिता चतुर्मुख ब्रह्मा आये हैं।' द्वारपालने श्रीकृष्णको उनका परिचय दिया और श्रीकृष्णकी आज्ञासे द्वारपाल ब्रह्माको भीतर श्रीकृष्णके पास ले गये। चतुर्मुख ब्रह्माने श्रीकृष्णके चरणोंमें दण्डवत् प्रणाम किया। ब्रह्माके द्वारा श्रीकृष्णकी पूजा करनेके बाद श्रीकृष्णने उनसे पूछा, — “किस उद्देश्यसे आपका यहाँपर आगमन हुआ है?” ब्रह्माने कहा, — “उसके विषयमें मैं बादमें निवेदन करूँगा। मेरे मनमें एक संशय है, आप कृपया पहले उसे दूर करें। 'कौन ब्रह्मा?'—आपने किस अभिप्रायसे ऐसा पूछा था? क्या मेरे अतिरिक्त जगत्में अन्य कोई और ब्रह्मा भी है?” ॥ ५९-६५ ॥ शुनि' हासि' कृष्ण तबे करिलेन ध्याने। असंख्य ब्रह्मार गण आइला ततक्षणे ॥ ६६ ॥ दश-बिश-शत-सहस्र-अयुत-लक्ष-वदन। कोट्यर्बुद मुख कारो, ना याय गणन ॥ ६७ ॥ रुद्रगण आइला लक्ष-कोटि-वदन। इन्द्रगण आइला लक्ष-कोटि-नयन ॥ ६८ ॥ देखि' चतुर्मुख ब्रह्मा फाँपर हइला। हस्तिगण-मध्ये येन मशक रहिला ॥ ६९ ॥ आसि' सब ब्रह्मा कृष्णपादपीठ-आगे। दण्डवत् करिते मुकुट पादपीठे लागे ॥ ७० ॥ कृष्णेर अचिन्त्यशक्ति लिखिते केह नारे। यत ब्रह्मा, तत मूर्त्ति एकइ शरीरे ॥ ७१ ॥ पादपीठ-मुकुटाग्र-संघट्टे उठे ध्वनि। पादपीठे स्तुति करे मुकुट हेन जानि' ॥ ७२ ॥ योड़-हाते ब्रह्मा-रुद्रादि करये स्तवन। “बड़ कृपा करिला प्रभु, देखाइला चरण ॥ ७३ ॥ भाग्य, मोरे बोलाइला 'दास' अङ्गीकरि'। कोन् आज्ञा हय, ताहा करि' शिरे धरि' ॥ ”७४ ॥ कृष्ण कहे, — “तोमा-सबा देखिते चित्त हैल। ताहा लागि' एक ठाञि सबा बोलाइल ॥ ७५ ॥ सुखी हओ सबे, किछु नाहि दैत्य-भय ?” तारा कहे, — “तोमार प्रसादे सर्वत्रइ जय ॥ ७६ ॥ सम्प्रति पृथिवीते येबा हैयाछिल भार। अवतीर्ण हञा ताहा करिला संहार ॥ ”७७ ॥ अनुवाद—ब्रह्माकी बात सुनकर श्रीकृष्ण मुस्करा दिये और उन्होंने ध्यान किया। श्रीकृष्णके स्मरणमात्रसे ही असंख्य ब्रह्मा उसी समय वहाँपर आ गये। दस मुखवाले ब्रह्मा, बीस मुखवाले ब्रह्मा, इसी प्रकार सौ, हजार, दस हजार, एक लाख, एक करोड़, एक अरब मुखोंवाले ब्रह्मा जिनकी गणना नहीं की जा सकती, वहाँ उपस्थित हो गये। लाखों-करोड़ों मुखोंवाले रुद्र और लाखों-करोड़ों नेत्रोंवाले इन्द्र भी वहाँ आये। इन । 303
[ 21/66-83 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सबको देखकर चतुर्मुख ब्रह्माकी बुद्धि स्तम्भित हो गयी। उनको ऐसा प्रतीत होने लगा मानो वे हाथियोंके झुण्डमें एक मच्छरके समान हैं। समस्त ब्रह्मा आकर जब श्रीकृष्णके चरणकमलोंके आगे दण्डवत् करते, तब उनके मुकुट उनकी पादुकाको स्पर्श करते। श्रीकृष्णकी अचिन्त्य शक्तिको कोई नहीं जान सकता। जितने भी ब्रह्मा थे, श्रीकृष्णने एक ही शरीरसे उतनी ही मूर्तियाँ बनकर उन सबके साथ वार्तालाप किया था। जब वे सब श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें प्रणाम कर रहे थे, तब इतनी भीड़के कारण उनके मुकुट आपसमें टकराकर बड़े जोरसे ध्वनि कर रहे थे और ऐसा लग रहा था वे मुकुट उस ध्वनिके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे हैं। हाथ जोड़कर ब्रह्मा-रुद्रादि श्रीकृष्णका स्तव करते हुए कहने लगे, — “हे प्रभो ! आपने बहुत कृपा करके अपने चरणोंका दर्शन प्रदान किया है। मेरा सौभाग्य है कि आपने मुझे अपने 'दास'के रूपमें अङ्गीकार करके मुझे बुलाया है। यदि आपकी कोई आज्ञा हो तो मैं उसे शिरोधार्य करना चाहता हूँ।” श्रीकृष्णने कहा, — “तुम सबसे मिलनेकी इच्छा हुई थी, इसलिये मैंने तुम्हें एकसाथ बुलाया है। तुम लोग सुखी तो हो, दैत्योंका कोई भय तो नहीं है?” उन्होंने कहा, — “आपकी कृपासे सर्वत्र ही जय है ॥”66-77॥ द्वारकादि विभूतिर एइ त' प्रमाण। 'आमारइ ब्रह्माण्डे कृष्ण' सबार हैल ज्ञान ॥ 78 ॥ कृष्ण-सह द्वारका-वैभव अनुभव हैल। एकत्र मिलने केह काहो ना देखिल ॥ 79 ॥ तबे कृष्ण सर्व-ब्रह्मागणे विदाय दिला। दण्डवत् हञा सबे निज घरे गेला ॥ 80 ॥ अनुवाद—द्वारकादिकी विभूतिका यही तो प्रमाण है कि सभीको यही लगा कि श्रीकृष्ण मेरे ही ब्रह्माण्डमें हैं। इस प्रकार सभीको श्रीकृष्णके साथमें द्वारकाके वैभवका अनुभव हुआ। यद्यपि वे सब एक साथ ही थे, तथापि किसीने भी किसी अन्यको नहीं देखा। तब श्रीकृष्णने समस्त ब्रह्मा-रुद्रादिको विदायी दी। श्रीकृष्णको दण्डवत् करके वे सभी अपने-अपने घर लौट गये ॥ 78-80 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण और द्वारका धामकी अलौकिक विभूतिको चतुर्मुख ब्रह्माने अनुभव किया। यद्यपि दस-सौ-हजार-दस हजार-लाख-करोड़ मुखोंवाले ब्रह्मा और रुद्र वहाँ एकत्रित हुए और इस मिलनको चतुर्मुख ब्रह्मा एवं श्रीकृष्णने ही देखा, तथापि श्रीकृष्णकी इच्छासे आये हुए बृहत् ब्रह्मा और बृहत् शिवोंका परस्परमें साक्षात्कार नहीं हुआ। अथवा, ब्रह्मा-शिवादिसमूहकी ऐसी भीड़ हुई कि उन्हें परस्पर देखने और बातचीत करनेका बिल्कुल भी अवसर ही नहीं मिला एवं किसीको भी किसीका आदर-सत्कार करनेका समय ही नहीं मिला ॥ 79 ॥ देखि' चतुर्मुख ब्रह्मार हैल चमत्कार। कृष्णेर चरणे आसि' कैला नमस्कार ॥ 81 ॥ ब्रह्मा बले, — “पूर्वे आमि ये निश्चय करिलूँ। तार उदाहरण आमि आजि त' देखिलूँ ॥ 82 ॥ अनुवाद—यह सब देखकर चतुर्मुख ब्रह्माको बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने श्रीकृष्णके चरणोंमें आकर प्रणाम किया। ब्रह्माने कहा, — “पहले मैंने अपने ज्ञानके विषयमें जो निश्चित किया था, उसका उदाहरण मैंने आज देखा है ॥ 81-82 ॥ श्रीमद्भागवत (10/14/38)में :— जानन्त एव जानन्तु किं बहूक्त्या न मे प्रभो। मनसो-वपुषो वाचो वैभवं तव गोचरः ॥ 83 ॥ अनुवाद—जो कहते हैं, — 'मैं श्रीकृष्णतत्त्व जानता हूँ', तो वे जानें, किन्तु मैं बहुत कुछ बोलना नहीं चाहता हूँ। प्रभो! मैं केवल इतना ही कहता हूँ कि आपका समस्त वैभव—मेरे मन, शरीर और वाणीके अगोचर है ॥ 83 ॥ 304 ।
४. अन्त्य-लीला: गम्भीरा वास, दिव्य प्रेम-उन्माद, हरिदास ठाकुर निर्वाण
अनुभाष्य-मध्यलीला 21/27 संख्या देखें ॥ 83 ॥ कृष्ण कहे,—“एइ ब्रह्माण्ड पञ्चाशत् कोटि योजन। अति क्षुद्र, ताते तोमार चारि वदन ॥ 84 ॥ कोन ब्रह्माण्ड शतकोटि, कोन लक्षकोटि। कोन नियुतकोटि, कोन कोटि-कोटि ॥ 85 ॥ ब्रह्माण्डानुरूप ब्रह्मार शरीर-वदन। एइरूपे पालि आमि ब्रह्माण्डेर-गण ॥” 86 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने कहा,—“यह ब्रह्माण्ड पचास करोड़ योजनका है। यह ब्रह्माण्ड बहुत ही छोटा है, इसलिये तुम्हारे केवल चार ही मुख हैं। कोई ब्रह्माण्ड सौ करोड़ योजनका, कोई एक लाख करोड़ योजनका, कोई पचास लाख कोटि योजनका, तो कोई करोड़-करोड़ों योजनका है। ब्रह्माण्डके अनुरूप ही ब्रह्माका शरीर और मुख हैं। इस प्रकार ही मैं समस्त ब्रह्माण्डोंका पालन करता हूँ॥” 84-86 ॥ अनुभाष्य- ब्रह्माण्डको सौ करोड़ योजनका माननेपर उसका आधा पचास करोड़ योजन होता है। मनुने लिखा है- “स्वयमेवात्मनो ध्यानात् तदण्डमकरोद्द्विधा।” [अर्थात् “उन्होंने स्वयं अपने ध्यानसे उस ब्रह्माण्डको दो भागोंमें विभक्त किया।”] सूर्य्यसिद्धान्तके 12/90 श्लोकमें- “ख-व्योम-खत्रय-खसागर-षट्कनाग-व्योमाष्टशून्य-यमरूप- नगाष्टचन्द्राः। ब्रह्माण्डसम्पुट-परिभ्रमणं समन्तादभ्यन्तरे दिनकरस्य करप्रसारः॥” [अर्थात् “ब्रह्माण्डकी कक्षा 18,71,20,80,86,40,00,000 योजन है। इसके बीचमें सूर्यकी किरणोंका विस्तार है।”] सिद्धान्त-शिरोमणिमें ग्रहगणितमें मध्यमाधिकारमें कक्षा- प्रक्रममें और गोलाध्यायके भुवनकोशके 67 श्लोकमें- “कोटिघ्नैर्नखनन्दषट्क-नखभूभृद्भुजङ्गेन्दुभिर्ज्योतिः शास्त्रविदो वदन्ति नभसः कक्षामिमां योजनैः तद्-ब्रह्माण्ड-कटाहसम्पुटतटे केचिज्जगुर्वेष्टनं केचित् प्रोचुरदृश्य-दृश्यमगिरेिं पौराणिकां सुरयः॥” [अर्थात् “ज्योतिर्विद्याके विद्वान कहते हैं कि आकाश-कक्षाका परिमाण 18,71,20,69,20,00,00,000 योजन है। इस परिमाणको कोई-कोई पौराणिक पण्डित ब्रह्माण्डरूप कड़ाहेकी परिधि कहते हैं। कोई कोई कहते हैं कि यह लोकालोक पर्वतका परिमाण है।”] ॥ 84 ॥ 'एकपाद विभूति', इहार नाहि परिमाण। 'त्रिपाद विभूति'र केबा करे परिमाण ॥ 87 ॥ अनुवाद-मेरी इस एकपाद विभूतिको कोई माप नहीं सकता, तब फिर मेरी त्रिपाद विभूतिको कौन माप सकता है?॥ 87 ॥ पाद्मोत्तरखण्ड (255/58)में :- तस्याः पारे परव्योम त्रिपाद्भूतं सनातनम्। अमृतं शाश्वतं नित्यमनन्तं परमं पदम् ॥ 88 ॥ अनुवाद-उस विरजाके परे अमृत, नित्य, सनातन, अनन्त, परमपद-स्वरूप, त्रिपाद्भूत परव्योम है, तात्पर्य यह है कि परव्योम चिद्-जगत् है। इसलिये अशोक, अभय और अमृतरूप त्रिपाद-विभूति उसमें नित्य वर्तमान है। समस्त मायिक वस्तुएँ मिलकर श्रीकृष्णकी एकपाद विभूतिमात्र हैं॥ 88 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 21/51 श्लोक देखें ॥ 88 ॥ श्रीकृष्णका वैभव-दुर्ज्ञेय :- तबे कृष्ण ब्रह्नारे दिलेन विदाय। कृष्णेर विभूति-स्वरूप जानन ना याय ॥ 89 ॥ अनुवाद-तब श्रीकृष्णने चतुर्मुख ब्रह्माको विदायी दी। श्रीकृष्णके विभूति-स्वरूपको कोई जान नहीं सकता ॥ 89 ॥ अनुभाष्य-लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डमें 'श्रीकृष्ण- श्रीनारायणके विलास हैं', इस पूर्वपक्षका खण्डन करते हुए श्रीरूपकृत-व्याख्या और कारिकामें 313-323 संख्यामें यह उपाख्यान वर्णित है ॥ 59-89 ॥ । 305
[ 21/90–98 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (घ) श्रीकृष्णके तद्रूपवैभव-धामगत चौथा (गूढ़) अर्थ :- 'त्र्यधीश्वर'-शब्देर अर्थ 'गूढ़' आर हय। 'त्रि'-शब्दे कृष्णेर तिन लोक कय॥90॥ अनुवाद—'त्र्यधीश्वर'-शब्दका अन्य और भी गूढ़ अर्थ है, 'त्रि'-शब्द श्रीकृष्णके तीन लोकोंके विषयमें बतलाता है॥90॥ श्रीकृष्णके तीन धाम :- गोलोकाख्य गोकुल, मथुरा, द्वारावती। एइ तिन लोके कृष्णेर सहजे नित्यस्थिति॥91॥ अनुवाद—गोलोक अर्थात् गोकुल, मथुरा और द्वारका—इन तीन लोकोंमें श्रीकृष्ण स्वाभाविक रूपसे नित्य ही वास करते हैं॥91॥ अनुभाष्य—गोलोकके तीन प्रकोष्ठ—(1) गोकुल, (2) मथुरा, (3) द्वारका। श्रीकृष्णलीलाके तीन प्रकोष्ठोंकी भाँति श्रीगौरलीलामें भी अन्तरङ्ग पूर्णैश्वर्यमय तीन प्रकोष्ठ हैं—(1) नवद्वीप-मण्डल, (2) श्रीक्षेत्रमण्डल, (दाक्षिणात्य?) और (3) व्रजमण्डल॥91॥ स्वयं श्रीकृष्ण ही तीनों धामोंके सम्राट् :- अन्तरङ्ग-पूर्णैश्वर्यपूर्ण तिन धाम। तिनेर अधीश्वर कृष्ण—स्वयं भगवान्॥92॥ अनुवाद—ये तीनों धाम अन्तरङ्ग-पूर्णैश्वर्योंसे परिपूर्ण हैं। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण इन तीनों धामोंके अधीश्वर हैं॥92॥ अनन्त वैकुण्ठ, ब्रह्माण्ड और दिशाओंके अधिपतियोंके द्वारा वन्दित-चरण श्रीकृष्ण :- पूर्व-उक्त ब्रह्माण्डरे यत दिक्पाल। अनन्त वैकुण्ठावरण, चिरलोकपाल॥93॥ ताँ-सबार मुकुट कृष्णपादपीठ-आगे। दण्डवत्काले तार मणि पीठे लागे॥94॥ मणि-पीठे ठेकाठेकि, उठे झन्झनि। पीठेर स्तुति करे मुकुट हेन जानि॥95॥ अनुवाद—पहले कहे गये ब्रह्माण्डोंके जितने भी दिक्पाल और अनन्त वैकुण्ठोंके आवरणोंमें रहनेवाले जितने चिरलोकपाल हैं, श्रीकृष्ण-पादपीठके आगे दण्डवत् करते समय उन सबके मुकुटोंकी मणियाँ श्रीकृष्णके सिंहासन और पादपीठको स्पर्श करती हैं। मणियोंके पादपीठसे टकरानेपर झनझनकी ध्वनि होती है और वह ध्वनि ऐसी लगती है मानो मुकुट पादपीठकी स्तुति कर रहे हों॥93–95॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 21/58 संख्या देखें॥93॥ स्वाराज्य-लक्ष्मीका अर्थ :- निज-चिच्छक्त्ये कृष्ण नित्य विराजमान। चिच्छक्ति-सम्पत्तिर 'षडैश्वर्य' नाम॥96॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥96॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण स्वाराज्यलक्ष्मीरूप अपनी चिद्-शक्तिसे युक्त होकर नित्य विराजमान हैं। भगवान्की चिद्-शक्ति-सम्पत्तिको ही 'षडैश्वर्य' कहते हैं। 'चिच्छक्ति'—चिद्-शक्तिमद्-विग्रह श्रीकृष्णकी अपनी शक्ति और सेविका है॥96॥ वे—श्रीकृष्णकी सेविका :- सेइ स्वाराज्यलक्ष्मी करे नित्य पूर्ण काम। अतएव वेदे कहे 'स्वयं भगवान्'॥97॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी स्वाराज्यलक्ष्मी ही नित्य श्रीकृष्णकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करती है, इसलिये वेद श्रीकृष्णको 'स्वयं भगवान्' कहते हैं॥97॥ श्रीकृष्णका ऐश्वर्य—अगाध अमृतका समुद्र :- कृष्णेर ऐश्वर्य—अपार अमृतेर सिन्धु। अवगाहिते नारि, तार छुँइल एक बिन्दु॥”98॥ 306 |
इक्कीसवाँ अध्याय 21/98-100 ] अनुवाद—श्रीकृष्णका ऐश्वर्य अपार अमृतका सिन्धु है। मैं उसमें डुबकी लगाकर स्नान नहीं कर सकता हूँ, इसलिये मैंने केवल उसकी एक बूँदको ही स्पर्श किया है॥”98॥ ऐश्वर्य-माधुरीका वर्णन करते हुए महाप्रभुकी श्रीकृष्णविग्रह-माधुरीकी स्फूर्ति :- ऐश्वर्य कहिते प्रभुर कृष्णस्फूर्ति हैल। माधुर्ये मजिल मन, एक श्लोक पड़िल॥99॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके ऐश्वर्यका वर्णन करते-करते महाप्रभुको श्रीकृष्णके माधुर्यकी स्फूर्ति हो आयी। उनका मन श्रीकृष्णके माधुर्यमें रम गया और उन्होंने एक श्लोक पढ़ा॥99॥ अपनी नरलीलाके उपयुक्त अलौकिक लीला-माधुर्यसे श्रीकृष्ण स्वयं ही मुग्ध :- श्रीमद्भागवत (3/2/12)में— “यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोगमाया- बलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम् ॥100॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 100॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वही श्रीकृष्णमूर्ति अपनी चिद्-शक्तिका बल प्रदर्शित करानेकी इच्छासे मर्त्यलीलाके उपयोगी, स्वयंमें भी विस्मय उत्पन्न कर देनेवाली एवं समस्त सौभाग्य-ऋद्धिके परमपद (पराकाष्ठा) और समस्त भूषणोंको भूषित करनेमें समर्थ है॥100॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णकी अप्रकट अवस्थामें श्रील उद्धव उनके विरहमें शोकसे कातर होकर श्रीविदुरसे श्रीकृष्णके अतुल रूप-माधुर्यका वर्णन कर रहे हैं— यत् (बिम्बं) मर्त्यलीलौपयिकं (मर्त्यलीलासु औपयिकं योग्यं नराकारं) स्वयोगमायाबलं (निजचिच्छक्तेः वीर्यं) दर्शयता (प्रकाशयता) [भगवता स्वयं] गृहीतं (स्वीकृतं) स्वस्य च (आत्मनः अपि) विस्मापनं (विस्मयजनकं) सौभगर्द्धेः (सौभाग्यातिशयस्य) परं पदं (पराकाष्ठा, प्रतिष्ठा) भूषणभूषणाङ्गं (भूषणानां भूषणानि अङ्गानि यस्मिन् तत् स्वबिम्बं) [प्रदर्श्य अन्तरधात् इति पूर्वेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। 'प्रदर्श्य अन्तरधात्' पूर्व श्लोक (3/2/11) के साथ उसका अन्वय करें॥ 100 ॥ अमृतानुकणा—श्रीश्रीमद्रूप-गोस्वामी प्रभुपाद-कृत 'लघुभागवतामृत'में अपनी कारिकामें आलोच्य 'यन्मर्त्यलीलौपयिकं' इस श्रीमद्भागवतीय श्लोककी व्याख्या प्रदत्त हुई है। इसके पूर्वश्लोकमें कहे गये 'स्वबिम्बं'से यहाँपर 'यत्'-पदके द्वारा 'बिम्ब'-पदको कहा जा रहा है, अर्थात् जो बिम्ब (श्रीविग्रह) मर्त्यलीलासमूहके अतिशय उपयोगी है। अनेक प्रकार आश्चर्य, माधुर्य, वीर्य और ऐश्वर्यादिकी सम्पूर्ण प्रकाश होकर श्रीकृष्णकी मर्त्यलीला उनकी अन्यान्य देवलीलाओंकी अपेक्षा भी अतीव मनोहारिणी है। यहाँपर 'बिम्ब'-पदके द्वारा सद्गुणावलीसम्पन्न परव्योमनाथादि सभी स्व-स्वरूपगणोंके मूलतत्त्व जो श्रीकृष्ण हैं, वे ही लक्षित हुए हैं। इसलिये, सम्पूर्ण रूप और गुणोंके आश्रय हेतु वह बिम्ब जो विचित्र नरलीलाके अतिशय योग्य है, वही कथित हुआ है। *'स्वयोगमायाबलं'—*स्वयोगमाया अर्थात् चिद्-शक्ति, उनका 'बल' अर्थात् सामर्थ्य। चिद्-शक्तिके सामर्थ्यको ही 'दर्शयता गृहीतम्' अर्थात् साक्षात् करवानेके लिये (उन्होंने जो बिम्ब) प्रकट किया है। 'अहो! मेरी चिद्-शक्तिके अद्भुत प्रभावका दर्शन करो, जिसकी गन्धमात्र भी दिव्यातिदिव्य लोकसमूहमें सम्भवपर नहीं है'—इस प्रकारसे चिद्-शक्ति-प्रभाव दर्शन करवाते हुए श्रीकृष्णका इस प्रकार जगमोहन-रूप जो योगमायाके द्वारा आविष्कृत हुआ है, यही उस 'स्वयोगमाया' आदि पदका अभिप्राय है। *'विस्मापनं स्वस्य च'—*वही बिम्ब 'स्वस्य' अर्थात् स्वयंको और परव्योमनाथादि आत्मदर्शोको 'विस्मापन' अर्थात् नवनवायमानरूपमें परम चमत्कृत । 307
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[ 21/100-103 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करनेवाला है। वह बिम्ब 'सौभगर्द्धेः परं पदं'—'सौभगर्द्धि' अर्थात् महाश्चर्यमय सौन्दर्यकी पराकाष्ठाका 'परंपद' अर्थात् नित्य उत्कर्ष-सम्पत्तिका परमाश्रय है। 'भूषणभूषणाङ्गम्'—कौस्तुभ, मकर-कुण्डलादि जो भूषण हैं, उनके भी भूषणस्वरूप अर्थात् उनकी भी शोभाको वर्द्धन करनेवाले जिनके अङ्गसमूह हैं, उन श्रीविग्रहका असमोर्ध्वत्व ही यहाँपर वर्णित हुआ है। यहाँपर 'श्रीकृष्णका जो बिम्ब (श्रीविग्रह) स्वयंमें भी अत्यन्त विस्मयका उत्पादन करनेवाला है'—इस प्रकार वाक्यमें जो देह-देहीका भेद प्रतीत होता है, वह औपचारिक (आरोपित) मात्र है, क्योंकि भगवान् और भगवद्-विग्रह दोनों ही अभिन्न और सच्चिदानन्दघन हैं। कूर्मपुराणमें भी उसी प्रकार कहा गया है—"देह-देहि-भिदा चात्र नेश्वरे विद्यते क्वचित्"—परमेश्वरमें कभी भी देह-देहीका भेद नहीं होता॥100॥ द्विभुज चिरकिशोर मुरलीधर-विग्रह :- [यथा राग:] कृष्णेर यतेक खेला, सर्वोत्तम-नरलीला, नरवपु ताहार स्वरूप। गोपवेश, वेणुकर, नवकिशोर, नटवर, नरलीलार हय अनुरूप॥101॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी जितनी भी लीलाएँ हैं, उनमें सबसे सर्वोत्तम नरवत् लीला ही है। श्रीकृष्णका अनादिसिद्ध निज-स्वरूप ही नराकृति है। उनका गोपवेश, हाथमें वेणु धारण करना, नवकिशोर अवस्था, नटवर रूप नरलीलाके अनुरूप ही होता है॥101॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णकी गोकुल-लीला, वासुदेव- सङ्कर्षणादि परव्योम-लीला, कारणार्णवशायी आदि पुरुषावतार-लीला, मत्स्य-कूर्म आदि नैमित्तिक अवतार-लीला, ब्रह्मा-शिवादि गुणावतार-लीला, पृथु- व्यासादि आवेशावतार-लीला, सविशेष परमात्मादि-लीला, निर्विशेष ब्रह्म आदि अनन्त क्रीड़ामय भगवान्की लीलाओंमेंसे तारतम्य (श्रेष्ठ और निम्न)के विचारसे श्रीकृष्णकी नरलीला ही सर्वश्रेष्ठ है। श्रीकृष्णका स्वरूप—नरवपु, गोपवेश, वेणुधारी, नवकिशोर और नटवर है। श्रीकृष्णका स्वरूप—नरलीलाके समान है, किन्तु वह तुच्छ, मरणशील, अनित्य, अमङ्गलकारी, सीमित, छितराया हुआ (खण्डोंमें) अथवा विभाजित आदि प्राकृत विशेषणोंके मलसे युक्त नहीं है॥101॥ श्रीकृष्णकी श्रीविग्रहमाधुरीका वर्णन; श्रीकृष्णरूप—सभीको आकर्षित करनेवाला :- कृष्णेर मधुर रूप, शुन, सनातन। ये रूपेर एक कण, डुबाय ये त्रिभुवन, सर्वप्राणी करे आकर्षण॥102॥ध्रु॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥102॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके मधुररूपका एक कण गोकुल, मथुरा और द्वारका,—इन तीन भुवनोंको, अथवा अन्तःपुर गोलोक-वृन्दावन, मध्यम-आवास परव्योम और बाह्य-आवास देवीधाम,—इन तीन भुवनोंको डुबो देनेमें समर्थ है एवं उन तीनों भुवनोंके प्राणियोंको अपनी रूपमाधुरीसे आकर्षित करता है॥102॥ नित्यलीला प्रकट करनेमें योगमायाके प्रभावका प्रदर्शन :- योगमाया चिच्छक्ति, विशुद्धसत्त्व-परिणति, तार शक्ति लोके देखाइते। एइरूप रतन, भक्तगणेर गूढ़धन, प्रकट कैला नित्यलीला हैते॥103॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥103॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णमूर्ति उनकी चिद्-शक्ति- नामक योगमायाके सन्धिनीगत विशुद्धसत्त्व-तत्त्वका परिणामस्वरूप है॥103॥ अनुभाष्य—परव्योमादिमें विशुद्धसत्त्वकी परिणतिरूपा 308 |
इक्कीसवाँ अध्याय 21/103-107 ] चिच्छक्ति योगमायाकी अवस्थिति नहीं है। उस योगमायाके कि श्रीकृष्णके अङ्ग मानो अलङ्कारोंके भी अलङ्कार हैं। अपूर्व असामान्य शक्तिके कार्यको दिखलानेके लिये वैसी अङ्गोंकी शोभा होनेपर भी ललित-त्रिभङ्ग मुद्रासे ही श्रीकृष्णने भक्तोंके लिये अत्यन्त गोपनीय और तो शोभा अधिक परिमाणमें वर्द्धित हो जाती है। उसपर आदरणीय रत्नस्वरूप नित्यलीला गोलोकसे प्रपञ्चमें भी नेत्रोंके ऊपरी भागमें धनुष जैसी भ्रू (भौंहें) नृत्य प्रकट की ॥ 103 ॥ कर रही हैं। श्रीकृष्ण तिरछे भावसे अपाङ्ग-दृष्टिरूप बाण भ्रू-रूपी धनुषपर चढ़ाकर श्रीराधा एवं उनकी अपने रूपके भोगकी स्वयंकी ही तीव्र आsub/आकांक्षा :- अनुगत गोपियोंके मनको बिद्ध (घायल) करनेके रूप देखि' आपनार, कृष्णेर हैल चमत्कार, उद्देश्यसे दृढ़ रूपमें सन्धान कर रहे हैं ॥ 105 ॥ आस्वादिते मने उठे काम। श्रीकृष्णके रूपसे परव्योमके श्रीनारायण 'स्वसौभाग्य' याँर नाम, सौन्दर्यादि-गुणग्राम, और लक्ष्मियाँ भी आकृष्ट :- एइरूप नित्य तार धाम ॥ 104 ॥ ब्रह्माण्डोपरि परव्योम, ताँहा ये स्वरूपगण, ताँ-सबार बले हरे मन। अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 104 ॥ पतिव्रता-शिरोमणि, याँरे कहे वेदवाणी, अमृतप्रवाह भाष्य-सौन्दर्य आदि गुणसमूह जिस आकर्षये सेइ लक्ष्मीगण ॥ 106 ॥ चिद्-तत्त्वका परम सौभाग्य है, वह इस श्रीकृष्णरूपमें नित्य अवस्थित है ॥ 104 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 106 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णरूपकी असामान्य चमत्कारिता अनुभाष्य-श्रीकृष्णका रूप इतना मनोरम है कि ऐसी है कि वह स्वयं श्रीकृष्णमें ही विस्मय उत्पन्न वह प्राकृत जगत्के सभी प्राणियों और देवताओंकी बात करती है एवं उसे आस्वादन करनेके लिये श्रीकृष्णकी तो दूर, ब्रह्माण्डके ऊपर परव्योममें रहनेवाले श्रीनारायण भी उत्कण्ठा वर्द्धित होती है। समस्त सौन्दर्य, ज्ञान, आदि श्रीकृष्णस्वरूपोंके मनको भी बलपूर्वक हरण ऐश्वर्य, वीर्य, यश और वैराग्यात्मक छः प्रकारके करता है। वेदोंमें जिन लक्ष्मियोंको एकमात्र ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण निज अतिशय-सौभाग्य श्रीकृष्णमें ही 'पतिव्रता-शिरोमणि' कहा गया है, वे भी श्रीकृष्णके नित्य अवस्थित है ॥ 104 ॥ सौन्दर्यसे आकर्षित होकर श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी अभिलाषा करती हैं ॥ 106 ॥ गोलोकके आश्रयवर्ग विषयके रूपसे मुग्ध और आकृष्ट :- “राधाजीके साथ सुशोभित होनेपर ही मदनमोहन" :- भूषणेर भूषण अङ्ग, ताँहे ललित त्रिभङ्ग, चढ़ि' गोपी-मनोरथे, मन्मथेर मन मथे, ताहार उपर भ्रूधनु-नर्त्तन। नाम धरे 'मदनमोहन'। तेरछे नेत्रान्ते बाण, तार दृढ़ सन्धान, जिनि' पञ्चशर-दर्प, स्वयं नवकन्दर्प, बिन्धे राधा-गोपीगण-मन ॥ 105 ॥ रास करे लञा गोपीगण ॥ 107 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 105 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 107 ॥ अनुभाष्य-अलङ्कार अङ्गोंके भूषण होते हैं, किन्तु अनुभाष्य-गोपियोंके अनुकूल चित्तवृत्तिरूप मनोरथ श्रीकृष्णके अङ्गोंकी शोभा इतनी अपूर्व और अद्भुत है पर चढ़कर उनके द्वारा अपनी सेवा स्वीकार करके । 309
[ 21/107-111 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला कन्दर्पके मनको मथकर श्रीकृष्ण 'मदनमोहन'के नामसे जाने जाते हैं। रूप-रस-गन्ध-शब्द-स्पर्शात्मक पाँच बाणोंवाले मदनके 'अपने सौन्दर्यके द्वारा नारी- विमोहनरूप अहङ्कार'को पैरोंके नीचे रौंदकर श्रीकृष्ण स्वयं नवकन्दर्प (व्रजमें अप्राकृत नवीन मदन) बनकर गोपियोंके साथ रासमें क्रीड़ा करते हैं॥ 107 ॥ श्रीकृष्णकी वेणु-माधुरीका वर्णन :- निज-सम सखा-सङ्गे, गोगण-चारण रङ्गे, वृन्दावने स्वच्छन्दे विहार। याँर वेणुध्वनि शुनि', स्थावर-जङ्गम प्राणी, पुलक, कम्प, अश्रु बहे धार॥ 108 ॥ अनुवाद - श्रीकृष्ण अपने समान सखाओंके साथ गैयाओंको आनन्दपूर्वक चराते हुए वृन्दावनमें स्वच्छन्दरूपसे विहार करते हैं। श्रीकृष्णकी वेणुकी ध्वनिको सुनकर स्थावर-जङ्गम (अचर-चर) सभी प्राणी पुलकित हो जाते हैं, उनके अङ्गोंमें कम्पन होने लगता है और उनके नेत्रोंसे अश्रुऑंकी धारा बहने लगती है॥ 108 ॥ श्रीकृष्णके रूपका वर्णन :- मुक्ताहार-वकपाँति, इन्द्रधनु-पिच्छ तथि, पीताम्बर-बिजली-सञ्चार। कृष्ण नव-जलधर, जगत्-शस्य-उपर, वरिषये लीलामृत-धार ॥ 109 ॥ अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 109 ॥ अनुभाष्य - श्रीकृष्णके कण्ठमें जो मुक्तामालाका हार है, वह सफेद बगुलोंकी श्रेणीके समान है, श्रीकृष्णके सिरपर जो मोर पंख है, वह इन्द्रधनुषके समान है और श्रीकृष्णका पीताम्बर विद्युतके समान है। श्रीकृष्ण नव-जलधर (नये-नये वर्षाके जलसे पूर्ण मेघ)के समान हैं और गोपियाँ जगत्की फसलके समान हैं। उस फसलके ऊपर मेघोंके जल बरसनेकी भाँति श्रीकृष्ण अपनी लीलामृत-धाराका वर्षण करके उनमें जीवनका सञ्चार करते हैं। वर्षाकालमें बगुले उड़ते हैं, इन्द्रधनुष और विद्युत भी दिखलायी देती है॥ 109 ॥ श्रीकृष्णमाधुर्यरूपरी सर्वोत्कृष्ट भगवत्ता एकमात्र भागवतमें ही वर्णित :- माधुर्य भगवत्ता-सार, व्रजे कैल परचार, ताहा शुक-व्यासेर नन्दन। स्थाने स्थाने भागवते, वर्णियाछे जानाइते, ताहा शुनि' नाचे भक्तगण ॥"110 ॥ अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 110 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-माधुर्य भगवताका सार है, - समस्त ऐश्वर्य, समस्त वीर्य, समस्त यश, समस्त सौन्दर्य, समस्त ज्ञान, समस्त वैराग्य, - इन छः गुणोंको 'भगवत्ता' कहते हैं; उनमेंसे समस्त 'श्री' का नाम 'माधुर्य' है। वही छः प्रकारकी भगवताका सार है; उसीका दूसरा नाम 'माधुर्य' है। श्रीकृष्ण-मूर्तिमें माधुर्यप्रधान भगवत्ता और श्रीनारायण आदिमें ऐश्वर्यप्रधान भगवत्ता है॥ 110 ॥ अनुभाष्य-षडैश्वर्यपूर्ण भगवान्की भगवत्ताका सार ही माधुर्य है; यह माधुर्य व्रजमें ही प्रचारित हुआ है। कृष्णद्वैपायन वेदव्यासके पुत्र शुकदेवने भक्तोंके हृदयको उन्मादित कर देनेवाले उस माधुर्य-कणाका श्रीमद्भागवतके स्थान-स्थानपर वर्णन किया है। [उसके विषयमें सुनकर भक्तगण नृत्य करते हैं] ॥ 110 ॥ श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन करते हुए महाप्रभुके द्वारा गोपियोंके सौभाग्यका वर्णन :- कहिते कृष्णेर रसे, श्लोक पड़े प्रेमावेशे, प्रेमे सनातन-हात धरि'। गोपी-भाग्य, कृष्ण-गुण, ये करिल वर्णन, भावावेशे मथुरा-नागरी ॥ 111 ॥ अनुवाद - अनुभाष्य देखें ॥ 111 ॥ अनुभाष्य - मथुरावासिनी स्त्रियोंने गोपियोंके असामान्य सौभाग्य और श्रीकृष्णके अलौकिक गुणोंका भावपूर्ण 310 ।
इक्कीसवाँ अध्याय 21/111-112 ]
वर्णन जिस प्रकार किया है, श्रीगौरहरिने 'कृष्णरस'का वर्णन करते हुए प्रेमसे भरकर श्रीसनातनका हाथ पकड़कर प्रेमावेशमें उस श्लोकका उच्चारण किया॥ 111॥
श्रीमद्भागवत (10/44/14)में :- “गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं लावण्यसारमसमोर्द्धमनन्यसिद्धम्। दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप- मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य ॥ 112 ॥
अनुवाद-मथुरावासिनियाँ बोलीं,- “आहा! गोपियोंने ऐसी कौनसी तपस्या की ! वे समस्त श्री, ऐश्वर्य और यशके एकान्त आश्रय, दुर्लभ, स्वतःसिद्ध, असमोर्ध्व, लावण्यके साररूप इन श्रीकृष्णके मुखामृतका नेत्रोंके द्वारा निरन्तर पान करती रहती हैं॥” 112 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 4/156 संख्या देखें ॥ 112 ॥
अमृतानुकणिका-इस श्लोकमें-यश, वीर्य और ऐश्वर्य-भगवान्के छः गुणोंमें-से ये तीन गुण ही वर्णित हुए हैं, परन्तु इन तीन गुणोंके द्वारा छहों गुणोंको ही समझना चाहिये। इसलिये माथुर रमणियाँ श्रीकृष्णको ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य-इन सबके एकान्त धाम कह रही हैं। वे कैसे धाम है? ऐश्वर्य-लौकिक, नरवत् भावको अतिक्रमण करके जो भाव है उसको ऐश्वर्य कहते हैं अर्थात् साधारण व्यक्ति जिसे नहीं कर सकते, उसे ऐश्वर्य कहते हैं। गोवर्धनको धारण करना यह किसी भी मनुष्यके लिये सम्भव नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णका गोवर्धन धारण करना अलौकिक है। श्रीकृष्णने यशोदा माताको अपने मुखमें दो बार विराट रूप दिखाया, यशोदाजीने कृष्णके मुखमें असंख्य ब्रह्माण्ड देखे और स्वयंको उस मुखमें देखा। दुर्वासाजी और अर्जुनने भी ऐसा ही देखा। वृन्दावनकी प्रत्येक लीलामें श्रीकृष्णने बालक होकर भी बिना अस्त्र-शस्त्रके, बिना रूप बढ़ाये बड़े-बड़े असुरोंका संहार कर दिया। ये सब ऐश्वर्यकी लीलाएँ हैं। कुवलयापीड़ हाथीका वध करना भी अलौकिक है। कंस भी महाबलवान था। जरासन्ध कंसकी परीक्षा लेनेके लिये मथुरापर आक्रमण करने आया और उसने अपने सैनिकोंके साथ गोकुलमें डेरा जमाया। कंस मथुरासे ही हाथियोंके पैरोंको पकड़कर जरासन्धकी सेनाके ऊपर फेंकने लगा और उनके नीचे दबकर जरासन्धके अनेक सैनिक मर गये। इतने बलवान कंसको श्रीकृष्णने खेल-ही-खेलमें मार दिया। द्वारकामें श्रीकृष्णकी एक विशेष ऐश्वर्य लीलाका वर्णन एक पौराणिक उपख्यानमें देखा जाता है (इसी अध्यायकी पयार संख्या 59-89 देखें)। वैकुण्ठमें जितना ऐश्वर्य है उससे भी अधिक ऐश्वर्य श्रीकृष्णमें है। वैकुण्ठाधिपतिमें ऐश्वर्य है, किन्तु वे जन्म नहीं ले सकते-इस जगत्में किसीके पिता, पुत्र, पति नहीं हो सकते। श्रीकृष्णमें यह सब कुछ है। 'वीर्य' - श्रीकृष्णकी वीरताको समझनेके लिये कुछ प्रसङ्गोंका यहाँ वर्णन कर रहे हैं। भीष्म पितामह अद्वितीय वीर थे, उनके पास इच्छा-मृत्युका वरदान था। भगवान्के अवतार परशुराम भी उनको युद्धमें पराजित नहीं कर सके। श्रीकृष्णने प्रतिज्ञा की थी कि वे कुरुक्षेत्र युद्धमें अस्त्र-शस्त्र नहीं धारण करेंगे, किन्तु भीष्म पितामहने प्रतिज्ञा की थी कि मैं कुरुक्षेत्रके युद्धमें श्रीकृष्णसे अस्त्र धारण करवाऊँगा। एक दिन श्रीकृष्ण अर्जुनके रथका सञ्चालन कर रहे थे। अर्जुनने ऐसी प्रतिज्ञा की थी कि वे भीष्म पितामहको किसी वीरको नहीं मारने देंगे। प्रातःकालसे अर्जुन भीष्ममें युद्ध करते रहे। सायंकाल तक युद्ध चलता रहा और अर्जुनने भीष्म पितामहको सारा दिन इतना व्यस्त रखा कि वे किसी वीरको मार नहीं पाये। अर्जुन पसीनेसे तर-बतर हो गये और युद्ध-विरामसे थोड़ी देर पहले एक क्षणके लिये अपने हाथोंसे पसीनेको थोड़ासा पोंछा, इतनेमें ही भीष्म पितामहने दस हजार महारथियोंको मार दिया। श्रीकृष्णने देखा कि भीष्म पितामह तो अर्जुनका भी वध कर देंगे। उन्हें क्रोध आ गया और रथके चक्केको
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[ 21/112 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
चक्रकी भाँति उठाकर भीष्म पितामहकी ओर तीव्र गतिसे दौड़े। ब्रह्मादि देवता जो आकाशसे युद्धक्षेत्रको देख रहे थे, वे बोले कि आज अवश्य ही भीष्मकी मृत्यु होगी। यदि श्रीकृष्ण चक्र चला देते तो भीष्म पितामहकी मृत्यु अवश्यम्भावी थी। दुर्योधन, कर्णादि सभी लोग स्तम्भित हो गये। यदि चाहते तो श्रीकृष्ण एक ही दिनमें सबका संहार कर देते। तभी अर्जुनने दौड़कर उनके चरणोंको पकड़ लिया और बोले,—“हे प्रभो! आप अपनी प्रतिज्ञा भङ्ग मत कीजिये, मैं ही उनके लिये पर्याप्त हूँ।” और अर्जुनकी बहुत विनती सुनकर श्रीकृष्ण शान्त हुए।
रुक्मणी विवाहके समय वे कात्यायानी देवीकी पूजाके लिये गयीं और उनकी सुरक्षाके लिये अनेकों सैनिकोंने उन्हें घेर रखा था। शिशुपालको वर बनाया था और जरासन्ध, दुर्योधन, कर्ण, दुःशासनादि सब लोग आये थे कि श्रीकृष्ण किसी प्रकारसे रुक्मणीका हरण न कर लें। परन्तु श्रीकृष्ण अचानक उन वीरों बीच प्रकट हो गये और रुक्मिणीजीके हाथको पकड़कर उन्हें रथपर बिठा लिया। उन्होंने रथकी बागडोर रुक्मिणीजीके हाथोंमें दे दी और अपना धनुष-बाण लेकर खड़े हो गये और देखते-ही-देखते सबको परास्त करके रुक्मिणीजीका हरण कर लिया जैसे गरुड़ सर्पोंके बीचमेंसे अपने भागको उठा लेता है।
राजा नग्नजितकी प्रतिज्ञा थी कि मैं अपनी पुत्री नाग्नजितीका विवाह उससे करूँगा जो एक साथमें मेरे इन सातों साँडोंको नथ दे। दस-बीस बड़े-बड़े वीर मिलकर भी जिनमें-से एक साँडको भी नहीं बाँध सकते थे, ऐसे सात बड़े-बड़े साँडोंको एक साथ वशीभूत करके इन सबकी नाकमें नकेल डालकर श्रीकृष्ण इनको पकड़कर ऐसे खींचने लगे जैसे कोई बालक काठके बैलोंको घसीटता है।
नरकासुर, इन्द्र, पौण्ड्र अद्भुत वीरता दिखलायी देती है। महाभारत युद्धके समाप्त होनेके बाद अर्जुन और भीममें विवाद हो गया
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
कि उनमें-से किसके द्वारा युद्ध जीता गया। दोनोंमें झगड़ा होने लगा और भीमने अपनी गदा तथा अर्जुनने अपना गाण्डीव उठा लिया। श्रीकृष्णने उन्हें लड़नेसे रोक दिया और उन्हें बर्बरीकके पास ले जाकर कहा,—“बर्बरीक! तुम सम्पूर्ण युद्धके साक्षी हो, बताओ इन दोनोंमें-से किसके द्वारा महाभारतका युद्ध जीता गया।” बर्बरीक बोला,—“यह व्यर्थका विवाद है। मैंने देखा कि आपने ही दोनों सेनाओंका संहार किया। आपके अतिरिक्त अन्य कोई वीर ही नहीं था।”
‘यश’—अन्य भगवद्रूपोंका यश भी सर्वत्र देखा जाता है, किन्तु श्रीकृष्णके समान किसी औरका यश नहीं है।
‘ज्ञान’—भगवद्गीतामें जो ज्ञान बताया है अथवा श्रीमद्भागवतम्के दशम और एकादश स्कन्धमें उद्धव-सन्देश या उद्धव-संवादमें जो उद्धवजीको जो ज्ञान दिया है, ऐसा ज्ञान कहीं भी नहीं है, यहाँ तक कि उपनिषदों, वेदोंमें भी नहीं है।
‘वैराग्य’—शरद ऋतुमें पूर्णिमाकी रात्रि है और वृन्दावनकी प्राकृतिक सौन्दर्यके द्वारा यमुनाजीकी छटा निराली हो रही है। श्रीकृष्ण परम सुन्दरी, सर्वगुण-सम्पन्ना महाभाववती करोड़ों गोपियोंको रासमें अचानक छोड़कर अन्तर्धान हो गये। संसारमें ऐसा करना किसी भी पुरुषके लिये सम्भव नहीं है। मूसल लीलामें श्रीकृष्णके समस्त परिजन मारे गये और वे अविचलित, ग्लानिरहित होकर शान्त बैठकर सब देखते रहे।
त्याग, वैराग्य, रूप, गुण, लीलाएँ, उदारता आदि समस्त विषयोंमें श्रीकृष्ण निरूपम हैं, उनके समान कोई नहीं है। विशेषकर चार गुण—रूप-माधुरी, गुण-माधुरी, वेणु-माधुरी और प्रेम-माधुरी अन्य किसी भी भगवद्रूपमें भी नहीं है।
‘रूप’—वह सभीको आकर्षित करके उन्मत्त बना देता है, विशेषकर स्त्रियोंको परम मनोहर लगता है। श्रीकृष्णके रूपको देखकर मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जिस योनिमें जो भी, जहाँ भी है, स्त्रीजाति अधिक
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