भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1749

इक्कीसवाँ अध्याय 21/59-77 ] कृष्ण कहेन, — “कोन् ब्रह्मा, कि नाम ताहार ?” द्वारी आसि' ब्रह्मार पुछे आर बार ॥ ६० ॥ विस्मित हञा ब्रह्मा द्वारीके कहिला। 'कह गिया सनक-पिता चतुर्मुख आइला ॥' ६१ ॥ कृष्णे जानाञा द्वारी ब्रह्मार लञा गेला। कृष्णेर चरणे ब्रह्मा दण्डवत् कैला ॥ ६२ ॥ कृष्ण मान्य-पूजा करि' ताँरे प्रश्न कैल। “कि लागि' तोमार इँहा आगमन हैल?” ॥ ६३ ॥ ब्रह्मा कहे, — “ताहा पाछे करिब निवेदन। एक संशय मने हय, करह छेदन ॥ ६४ ॥ 'कोन् ब्रह्मा ?' पुछिले तुमि कोन् अभिप्रागे? आमा वइ जगते आर कोन् ब्रह्मा हये ?” ६५ ॥ अनुवाद—एकदिन चतुर्मुख ब्रह्मा श्रीकृष्णके दर्शनके लिये भौम-द्वारकामें आये और द्वारपालने उनके आनेका संवाद जाकर श्रीकृष्णको दिया। श्रीकृष्णने पूछा, — “कौनसे ब्रह्मा आये हैं, उनका नाम क्या है?” द्वारपालने आकर ब्रह्मासे वही प्रश्न पूछा। विस्मित होकर ब्रह्माने द्वारपालसे कहा, — ‘जाओ, और जाकर कहो कि सनकके पिता चतुर्मुख ब्रह्मा आये हैं।' द्वारपालने श्रीकृष्णको उनका परिचय दिया और श्रीकृष्णकी आज्ञासे द्वारपाल ब्रह्माको भीतर श्रीकृष्णके पास ले गये। चतुर्मुख ब्रह्माने श्रीकृष्णके चरणोंमें दण्डवत् प्रणाम किया। ब्रह्माके द्वारा श्रीकृष्णकी पूजा करनेके बाद श्रीकृष्णने उनसे पूछा, — “किस उद्देश्यसे आपका यहाँपर आगमन हुआ है?” ब्रह्माने कहा, — “उसके विषयमें मैं बादमें निवेदन करूँगा। मेरे मनमें एक संशय है, आप कृपया पहले उसे दूर करें। 'कौन ब्रह्मा?'—आपने किस अभिप्रायसे ऐसा पूछा था? क्या मेरे अतिरिक्त जगत्में अन्य कोई और ब्रह्मा भी है?” ॥ ५९-६५ ॥ शुनि' हासि' कृष्ण तबे करिलेन ध्याने। असंख्य ब्रह्मार गण आइला ततक्षणे ॥ ६६ ॥ दश-बिश-शत-सहस्र-अयुत-लक्ष-वदन। कोट्यर्बुद मुख कारो, ना याय गणन ॥ ६७ ॥ रुद्रगण आइला लक्ष-कोटि-वदन। इन्द्रगण आइला लक्ष-कोटि-नयन ॥ ६८ ॥ देखि' चतुर्मुख ब्रह्मा फाँपर हइला। हस्तिगण-मध्ये येन मशक रहिला ॥ ६९ ॥ आसि' सब ब्रह्मा कृष्णपादपीठ-आगे। दण्डवत् करिते मुकुट पादपीठे लागे ॥ ७० ॥ कृष्णेर अचिन्त्यशक्ति लिखिते केह नारे। यत ब्रह्मा, तत मूर्त्ति एकइ शरीरे ॥ ७१ ॥ पादपीठ-मुकुटाग्र-संघट्टे उठे ध्वनि। पादपीठे स्तुति करे मुकुट हेन जानि' ॥ ७२ ॥ योड़-हाते ब्रह्मा-रुद्रादि करये स्तवन। “बड़ कृपा करिला प्रभु, देखाइला चरण ॥ ७३ ॥ भाग्य, मोरे बोलाइला 'दास' अङ्गीकरि'। कोन् आज्ञा हय, ताहा करि' शिरे धरि' ॥ ”७४ ॥ कृष्ण कहे, — “तोमा-सबा देखिते चित्त हैल। ताहा लागि' एक ठाञि सबा बोलाइल ॥ ७५ ॥ सुखी हओ सबे, किछु नाहि दैत्य-भय ?” तारा कहे, — “तोमार प्रसादे सर्वत्रइ जय ॥ ७६ ॥ सम्प्रति पृथिवीते येबा हैयाछिल भार। अवतीर्ण हञा ताहा करिला संहार ॥ ”७७ ॥ अनुवाद—ब्रह्माकी बात सुनकर श्रीकृष्ण मुस्करा दिये और उन्होंने ध्यान किया। श्रीकृष्णके स्मरणमात्रसे ही असंख्य ब्रह्मा उसी समय वहाँपर आ गये। दस मुखवाले ब्रह्मा, बीस मुखवाले ब्रह्मा, इसी प्रकार सौ, हजार, दस हजार, एक लाख, एक करोड़, एक अरब मुखोंवाले ब्रह्मा जिनकी गणना नहीं की जा सकती, वहाँ उपस्थित हो गये। लाखों-करोड़ों मुखोंवाले रुद्र और लाखों-करोड़ों नेत्रोंवाले इन्द्र भी वहाँ आये। इन । 303