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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1748

[ 21/53-59 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अनुभाष्य- 'जीव'-भोग परायण बद्धजीव देवीधाममें वास करते हैं; स्वराज्यलक्ष्मी श्रीकृष्ण सेविका होकर श्रीकृष्णकी अभिलाषाएँ पूर्ण करती हैं, जगत्-लक्ष्मी देवीधामवासी जीवोंकी रक्षा करती हैं। 'याँहा'-इस देवीधाममें जगत्-लक्ष्मीकी दासी माया ही अधिष्ठात्री हैं॥ 53 ॥

एइ तिन धामेर हय कृष्ण अधीश्वर। गोलोक-परव्योम-प्रकृतिर पर ॥ 54 ॥

अनुवाद-[गोलोक, परव्योम और देवीधाम-] इन तीनों धामोंके श्रीकृष्ण ही अधीश्वर हैं। गोलोक और परव्योम प्रकृति अथवा मायासे अतीत चिन्मय धाम हैं॥ 54 ॥

अनुभाष्य- 'तीन धाम'-सर्वोपरिधाम गोलोक, हरिधाम-परव्योम और देवीधाम हैं। देवीधामसे मुक्त जीव परव्योममें हरिसेवा प्राप्त नहीं करनेपर महेश-धाम प्राप्त करते हैं। देवीधामसे ऊपर होनेपर भी वह (महेश-धाम) हरिधाम-परव्योम नहीं है॥ 54 ॥

शुद्धसत्त्वमय चिद्-शक्ति विलास तद्-रूपवैभव-श्रीकृष्णकी तीन पाद विभूति, देवीधाम-एकपाद-विभूति :- चिच्छक्तिविभूति-धाम-त्रिपादैश्वर्य-नाम। मायिक विभूति-एकपाद अभिधान ॥ 55 ॥

अनुवाद-भगवान्‌की चिद्-शक्तिकी विभूति चिन्मय-जगत्‌को त्रिपाद-ऐश्वर्यके नामसे जाना जाता है (इसमें भगवान्‌की तीन चौथाई शक्ति और ऐश्वर्य विराजमान हैं)। भगवान्‌की मायिक विभूति मायिक जगत्‌को एकपाद विभूति कहा जाता है (इसमें भगवान्‌की एक चौथाई शक्ति विराजमान है) ॥ 55 ॥

अनुभाष्य-हरिधाम-परव्योम और गोलोक-अप्राकृत चिद्-शक्ति-विभूतिसे युक्त धाम हैं और उन्हें 'त्रिपाद- ऐश्वर्य'के नामसे कहा जाता है। मायिक-विभूतिसे युक्त देवीधाम, 'एकपाद'-नामसे प्रसिद्ध है॥ 55 ॥

त्रिपादविभूति-मायातीता और एकपादविभूति-मायिक :- लघुभागवतामृत (1/563)में- त्रिपाद्विभूतेर्धामत्वात् त्रिपाद्भूतं हि तत् पदम्। विभूतिर्मायिकी सर्वा प्रोक्ता पादात्मिका यतः ॥ 56 ॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 56 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'त्रिपादविभूति' धाम होनेके कारण उस पदको त्रिपादभूत कहते हैं, और समस्त मायिक विभूति-एकपादमात्र है ॥ 56 ॥

अनुभाष्य- तत्पदं त्रिपादविभूतेर्धामत्वात् त्रिपादभूतं हि (त्रिचरणात्मकम् एव उच्यते); यतः सर्वा मायिकी विभूतिः पादात्मिका (एकचरणा) प्रोक्ता (कथिता)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 56 ॥

एकपादविभूति देवीधामका वर्णन :- त्रिपादविभूति कृष्णेर-वाक्य-अगोचर। एकपाद विभूतिर शुनह विस्तार ॥ 57 ॥ 'चिरलोकपाल'-शब्दका अर्थ :- अनन्त ब्रह्माण्डेर यत ब्रह्मा-रुद्रगण। चिरलोकपाल-शब्दे ताँहार गणन ॥ 58 ॥

अनुवाद-भगवान् श्रीकृष्णकी तीन पाद विभूति अनन्त होनेके कारण वर्णनसे परे है। हे सनातन! तुम एकपाद विभूतिके विस्तारके विषयमें श्रवण करो। अनन्त ब्रह्माण्डोंके जितने ब्रह्मा-रुद्रादि लोकपाल हैं, उन्हें 'चिरलोकपाल' कहा जाता है ॥ 57-58 ॥

अनुभाष्य- 'चिरलोकपाल'-ब्रह्माण्डके आधिकारिक चिरस्थायी-कार्यकारक ब्रह्मा-रुद्रादि हैं। लोकपाल शब्दसे साधारणतः आठ दिक्पाल-इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, निर्ऋति, वायु, कुबेर और शिवको समझा जाता है॥ 58 ॥

श्रीकृष्णके ऐश्वर्यके दर्शनके लिये आये ब्रह्माके अहङ्कारके नाशके सम्बन्धमें एक पौराणिक-उपाख्यान :- एकदिन द्वारकाते कृष्ण देखिबारे। ब्रह्मा आइला,-द्वारपाल जानाइल कृष्णेरे ॥ 59 ॥

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