श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1747, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय 21/49-53 ] अमृतप्रवाह भाष्य—गोलोक-नामक निज-धामके नीचे देवी, महेश और हरिके धामसमूहमें जिन्होंने उन समस्त प्रभावोंको स्थापित किया है, मैं उन आदिपुरुष गोविन्दका भजन करता हूँ॥49॥ अनुभाष्य— तस्य (कृष्णस्य) गोलोकनाम्नि निजधाम्नि तले (निम्नभागे) देवीमहेशहरिधामसु (पारम्पर्यक्रमेण वैकुण्ठ-शिवधाम-देवीधामसु) तेषु तेषु च येन (गोविन्देन) ते ते प्रभावनिचयाः (विक्रमसमूहाः) विहिताः (स्थापिताः) च, तम् आदिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके निजधाम गोलोकके नीचे यथाक्रमसे हरिधाम (वैकुण्ठ), महेश (शिव) धाम और देवी धाममें जिन्होंने यथायोग्यरूपसे अपने समस्त विक्रमको स्थापित किया है, उन आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥49॥ विरजामें अवस्थानका वर्णन :— पाद्मोत्तरखण्ड (255/57)में— प्रधान-परमव्योम्नोरन्तरे विरजा नदी। वेदाङ्गस्वेदजनितैस्तोयैः प्रस्राविता शुभा ॥50॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥50॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रधान अर्थात् मायिकतत्त्व और परव्योम, इन दोनोंके बीचमें विरजा-नदी है; वह नदी मङ्गलजनक वेदाङ्ग अर्थात् पुरुषके पसीनेसे उत्पन्न जलसे युक्त है॥50॥ अनुभाष्य— प्रधान-परमव्योम्नाः (देवीधाम-वैकुण्ठयोः) अन्तरे (मध्ये) वेदाङ्गस्वेदजनितैः (वेदाः अङ्गानि यस्य-“अस्य निश्वसितम्” इति श्रुतेः, तस्य भगवतः घर्मोद्भवैः) तोयैः (सलिलैः) प्रस्राविता (प्रवाहिता) शुभा (जड़क्रियाहीना नैष्कर्मरूपिणी चिन्मात्रमयी) विरजा नदी [वर्त्तते]। श्लोक-भावानुवाद—देवीधाम और वैकुण्ठके बीचमें [श्रुतिओंके अनुसार वेद जिनके निःश्वास उत्पन्न होनेके कारण जिनके अङ्ग हैं] उन भगवान्के पसीनेसे उत्पन्न जलके प्रवाहसे बनी मङ्गलजनक (जड़क्रियाहीन नैष्कर्मरूपी चिन्मात्रमयी) विरजा नदी है॥50॥ परव्योम अथवा वैकुण्ठमें अवस्थानका वर्णन :— पाद्मोत्तरखण्ड (255/58)में— तस्याः पारे परव्योम त्रिपाद्भूतं सनातनम्। अमृतं शाश्वतं नित्यमनन्तं परमं पदम्॥51॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥51॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उस विरजाके परे अमृत, नित्य, सनातन, अनन्त, परमपद-स्वरूप, त्रिपादभूत परव्योम है, तात्पर्य यह है कि परव्योम चिद्-जगत् है। इसलिये अशोक, अभय और अमृतरूप त्रिपाद-विभूति उसमें नित्य वर्तमान है। समस्त मायिक वस्तुएँ मिलकर श्रीकृष्णकी एकपाद विभूतिमात्र हैं॥51॥ अनुभाष्य— तस्याः (विरजायाः नद्याः) पारे (तटे) त्रिपाद्भूतं (तुरीयं) सनातनम् (नित्यवर्त्तमानम्) अमृतम् (अक्षयं) शाश्वतं नित्यम् अनन्तं परमं पदं परव्योम। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥51॥ (3) बाह्य आवास देवीधाम ही जीवके भोगका क्षेत्र मायाराज्य :— तार तले ‘बाह्यावास’ विरजार पार। अनन्त ब्रह्माण्ड याँहा कोठरि अपार ॥52॥ ‘देवीधाम’ नाम तार, जीव यार वासी। जगल्लक्ष्मी राखे, याँहा रहे मायादासी ॥53॥ अनुवाद—उस परव्योमके नीचे विरजाके इस पार श्रीकृष्णका बाह्य आवास है। अनन्त प्राकृत-ब्रह्माण्ड ही इस बाह्य-आवासके अनन्त कक्ष हैं। इसका नाम देवीधाम है। (श्रीकृष्णविमुख) बद्धजीव इस देवीधामके निवासी हैं। जगत्-लक्ष्मी इस जगत्के जीवोंकी रक्षा करती है और उनकी दासी माया ही इस जगत्की अधिष्ठात्री है॥52-53॥ । 301