श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1746, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 21/41-49 শ্রীশ্রীচৈতন্যচরিতামৃত মধ্যলীলা अनुभाष्य— आदिलीला 5/71 संख्या देखें ॥ 41 ॥ (ग) श्रीकृष्णाधीन धामगत तीसरा (गुह्य) अर्थ :- एइ अर्थ—बाह्य, शुन 'गूढ़' अर्थ आर। तिन आवास-स्थान कृष्णेर, शास्त्रे ख्याति यार ॥ 42 ॥ अनुवाद— 'त्र्यधीश'-शब्दका उपरोक्त अर्थ भी बाह्य है। अब तुम गूढ़ अर्थ सुनो। शास्त्रोंमें ऐसी प्रसिद्धि है कि श्रीकृष्णके तीन आवास-स्थान हैं ॥ 42 ॥ अनुभाष्य— तिन आवास-स्थान'—(1) अन्तर-आवास गोलोक, (2) मध्यम-आवास परव्योम, (3) बाह्य-आवास देवीधाम ॥ 42 ॥ (1) अन्तर-आवास गोलोक-वृन्दावनका वर्णन :— 'अन्तःपुर'—गोलोक-श्रीवृन्दावन। याँहा नित्यस्थिति मातापिता-बन्धुगण ॥ 43 ॥ मधुर ऐश्वर्य-माधुर्य-कृपादि-भाण्डार। योगमाया—दासी, याँहा रासादि लीला-सार ॥ 44 ॥ अनुवाद— 'अन्तःपुर'—गोलोक-श्रीवृन्दावन है। वहाँपर श्रीकृष्णके माता-पिता-बन्धु-बान्धवोंका नित्य वास है। वह श्रीकृष्णके ऐश्वर्य, माधुर्य और कृपा आदिका भण्डार है। वहाँ योगमाया श्रीकृष्णकी दासीके रूपमें कार्य करती है और श्रीकृष्णकी समस्त लीलाओंकी सार रासलीला उसी वृन्दावनमें ही प्रकाशित होती है ॥ 44 ॥ गोस्वामिपादोक्त-श्लोक :— करुणानिकुरम्बकोमले मधुरैश्वर्यविशेषशालिनि। जयति व्रजराजनन्दने न हि चिन्ताकणिकाभ्युदेति नः॥ 45 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—करुणासमूहके द्वारा कोमल, विशेष माधुर्य-ऐश्वर्यसे युक्त व्रजराजनन्दनके जययुक्त होनेसे हमारी चिन्ताकणिकाका अर्थात् लेशमात्र चिन्ताका भी उदय नहीं हो सकता ॥ 45 ॥ अनुभाष्य— करुणानिकुरम्बकोमले (करुणासमूहेन कोमलः स्वभावः यस्य सः तस्मिन्) मधुरैश्वर्यविशेषशालिनि (माधुर्यैश्वर्य-विचित्र- सम्पत्तिसम्पन्ने) व्रजराजनन्दने (कृष्णे) जयति (सर्वोत्कर्षमाविष्कुर्वति) नः (अस्माकं) चिन्ताकणिका (चिन्तालेशमात्रम् अपि) न अभ्युदेति (आविर्भवति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 45 ॥ (2) मध्यम आवास विष्णुलोक वैकुण्ठ-वर्णन :— तार तले परव्योम— 'विष्णुलोक'—नाम। नारायण-आदि अनन्त स्वरूपेर धाम ॥ 46 ॥ 'मध्यम-आवास' कृष्णेर—षडैश्वर्य-भाण्डार। अनन्त स्वरूपे याँहा करेन विहार ॥ 47 ॥ अनन्त वैकुण्ठ याँहा—भाण्डार-कोठरि। पारिषदगणे षडैश्वर्ये आछे भरि' ॥ 48 ॥ अनुवाद—गोलोक-वृन्दावनके नीचे परव्योम है जिसे विष्णुलोक कहा जाता है। वह श्रीनारायणादि अनन्त भगवत्-स्वरूपोंका धाम है। षडैश्वर्योंका भण्डार परव्योम श्रीकृष्णका मध्यम-आवास है। परव्योममें असंख्य वैकुण्ठ लोक उस भण्डारके एक-एक कक्षके समान हैं और वे सभी समस्त ऐश्वर्योंसे युक्त हैं। उन असंख्य वैकुण्ठ लोकोंमें भगवान्के अनन्त स्वरूपोंके नित्य पार्षद उनके साथ वास करते हैं और वे सभी षडैश्वर्योंसे परिपूर्ण हैं ॥ 46-48 ॥ ब्रह्मसंहिता (5/43) में :— गोलोकनाम्नि निजधाम्नि तले च तस्य देवी-महेश-हरिधामसु तेषु तेषु। ते ते प्रभावनिचया विहिताश्च येन गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ 49 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 49 ॥ 300 ।