भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1745

इक्कीसवाँ अध्याय 21/34-41 ] हैं। श्रीकृष्णसे बड़ा अथवा उनके समान अन्य कोई नहीं है॥ 34 ॥ ब्रह्मसंहिता (5/1) में :- ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥ 35 ॥ अनुवाद-सच्चिदानन्द-विग्रह श्रीकृष्ण ही परमेश्वर हैं; वे स्वयं अनादि और सभीके आदि एवं समस्त कारणोंके कारण हैं॥ 35 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 2/107 संख्या देखें ॥ 35 ॥ श्रीकृष्ण-(2) त्र्यधीश; (क) गुणावतारगत प्रथम (बाह्य) अर्थ :- ब्रह्मा, विष्णु, हर, -एइ सृष्ट्यादि-ईश्वर। तिने आज्ञाकारी कृष्णेर, कृष्ण-अधीश्वर ॥ 36 ॥ अनुवाद-ब्रह्मा, विष्णु, महेश-ये तीनों क्रमशः सृष्टि, स्थिति और प्रलयके ईश्वर हैं। ये तीनों भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करनेवाले हैं और श्रीकृष्ण इन तीनोंके नियन्ता होनेके कारण इनके अधीश्वर हैं॥ 36 ॥ अनुभाष्य-'ब्रह्मा'-जगत्की सृष्टि करनेवाले, 'विष्णु'-जगत्का पालन करनेवाले, 'हर'-जगत्का संहार करनेवाले, ये तीन कार्य करनेवाले श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करनेवाले दास हैं; श्रीकृष्ण ही एकमात्र सर्वेश्वर हैं॥ 36 ॥ श्रीमद्भागवत (2/6/32) में :- सृजामि तन्नियुक्तोऽहं हरो हरति तद्वशः। विश्वं पुरुषरूपेण परिपाति त्रिशक्तिधृक्॥ 37 ॥ अनुवाद-ब्रह्माने कहा-हरिके द्वारा नियुक्त होनेपर ही मैं सृष्टि करता हूँ, उनकी आज्ञासे ही शिव नाश करते हैं, (अन्तरङ्गा, बहिरङ्गा और तटस्था) तीन शक्तियोंको धारण करनेवाले वे हरि ही पुरुषरूपमें विश्वका पालन करते हैं॥ 37 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 20/318 संख्या देखें ॥ 37 ॥ (ख) पुरुषावतारगत दूसरा (बाह्य) अर्थ :- ए सामान्य, त्र्यधीश्वरेर शुन अर्थ आर। जगत्कारण तीन पुरुषावतार ॥ 38 ॥ महाविष्णु, पद्मनाभ, क्षीरोदकस्वामी। एइ तिन-स्थूल-सूक्ष्म-सर्व-अन्तर्यामी ॥ 39 ॥ एइ तिन-सर्वाश्रय, जगत्-ईश्वर। इँहो-कला-अंश याँर, कृष्ण-अधीश्वर ॥ 40 ॥ अनुवाद-मैंने त्र्यधीशका गुणावतारके सम्बन्धमें जो अर्थ पहले किया है, वह सामान्य अर्थ है। अब तुम त्र्यधीश्वरका अन्य अर्थ सुनो। तीनों पुरुषावतार जगत्के कारण हैं। महाविष्णु, पद्मनाभ और क्षीरोदकशायी विष्णु-ये तीनों ईश्वर क्रमशः सर्व-अन्तर्यामी, सूक्ष्म-अन्तर्यामी और स्थूल अन्तर्यामी हैं। ये तीनों सभीके आश्रय और जगत्के ईश्वर होनेपर भी स्वयं भगवान् श्रीकृष्णके कला तथा अंश है-इसलिये श्रीकृष्ण इन तीनोंके अधीश्वर हैं॥ 38-40 ॥ अनुभाष्य- 'महाविष्णु'-कारणोदशायी अर्थात् सर्वान्तर्यामी हैं; 'पद्मनाभ'-ब्रह्माकी सृष्टि करनेवाले गर्भोदशायी अर्थात् हिरण्यगर्भ, समष्टि अथवा सूक्ष्मान्तर्यामी हैं; और 'क्षीरोदकस्वामी'-विष्णु अर्थात् विराट, व्यष्टि स्थूलान्तर्यामी हैं॥ 39 ॥ ब्रह्मसंहिता (5/44)में :- यस्यैकनिश्वसितकालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः। विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ 41 ॥ अनुवाद-ब्रह्माण्डनाथ अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु-महेश, जिनके रोमकूपोंसे जन्म ग्रहण करते हैं और उनके निःश्वास-काल तक अवस्थित रहते हैं, वे महाविष्णु जिनके कला हैं, उन आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥ 41 ॥ । 299