भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1744, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1744

[ 21/33-34 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला पदके द्वारा अन्य किसीकी भी अपेक्षा करके श्रीकृष्णका स्वरूपादि प्रकाशित नहीं हुआ है, यही यहाँ कहा गया है। श्रीमद्भागवतमें श्रीदशरथ-नन्दन श्रीरामचन्द्रके सम्बन्धमें भी कहा गया है,- 'अधिकसाम्यविमुक्तधाम्नः' (भाः 9/11/20)-उनका प्रभाव आधिक्य और साम्यरहित है। किन्तु ऐसा होनेपर भी 'स्वयं' यह पद प्रयोग नहीं हुआ है। इसलिये श्रीकृष्णके साथ श्रीरामका ऐक्य होनेके कारण ही उक्त 'अधिकसाम्यविमुक्तधाम्नः' विशेषण प्रयोग हुआ है, ऐसा जानना होगा, क्योंकि श्रीकृष्ण और श्रीरामके बीचमें नरलीला, नराकार, नरस्वभावका साम्य है और उसी कारण ही श्रीकृष्णको श्रीरामरूप अतिशय प्रिय हैं। ब्रह्माण्डपुराणमें श्रीकृष्णवाक्यमें भी यह व्यक्त हुआ है,- "अन्तरङ्गस्वरूपा से मत्स्य-कूर्मादयस्त्वमी। सर्वात्मनायमत्रापि श्रीमद्दशरथात्मजः ॥" अर्थात् 'मत्स्य- कूर्मादि अवतारसमूह मेरे अन्तरङ्गस्वरूप हैं, इनमेंसे भी दशरथपुत्र श्रीराम-स्वरूप ही सभी प्रकारसे अर्थात् नरलीलादि-साम्यसे मेरे अतिशय प्रिय हैं।' “स्वयन्त्वसाम्यातिशयः", "कृष्णस्तु भगवान् स्वयं" (भाः 1/3/28)-इन दो श्लोकोंमें श्रीकृष्णके विशेष परमेश्वरत्वके वर्णनमें जो 'स्वयं'-पद दो बार कहा गया है, यह श्रीकृष्णके अन्य स्वरूपके सहित समान धर्मके ऐक्यके कारण नहीं है, उनका आधिक्य स्वतःसिद्ध है। “त्र्यधीशः”-गोलोक, मथुरा और द्वारका-नामक जो तीन धाम हैं, उनके अधिपति होनेसे श्रीकृष्ण अधीश्वर हैं; अथवा प्रकृतिपर ईक्षण करनेवाले (नियन्ता) कारणोदशायी, विराटके अन्तर्यामी गर्भोदशायी और क्षीरोदशायी-इन तीन पुरुषावतारोंके ऊपर स्थित ईश्वर होनेके कारण वे 'त्र्यधीश' हैं। 'स्वराज्यलक्ष्म्या आप्तसमस्तकामः'-स्वराज्य-लक्ष्मीके कारण समस्त कामनायें जिनकी पूर्ण हुई हैं। वे 'स्व'-द्वारा अर्थात् आत्मके द्वारा अथवा आत्मभूता श्रेष्ठ शक्तिके द्वारा विराज करते हैं, इसलिये वे 'स्वराट्' हैं। वह स्वराट्जनित भाव (धर्म) ही 'स्वाराज्य'के नामसे कहा जाता है। वह स्वाराज्य ही लक्ष्मी अर्थात् सबसे भी बहुत अधिक सम्पत्ति है। इसी कारण उनकी समस्त कामनायें पूर्ण हुई हैं। 'समस्तकाम'-शब्दसे अभीष्ट विषयोंकी सम्पूर्ण सिद्धिको समझना होगा। 'चिरलोकपाल'-अर्थात् चिरजीवी (दीर्घजीवी), लोकपाल-पद्मज ब्रह्मादि; उन लोकपालगणोंके करोड़ों मुकुटोंके द्वारा अर्थात् सैकड़ों-सैकड़ों अर्बुद मुकुटोंके द्वारा जिनकी दो पादपीठ (दो पादुकायें) पूजित अर्थात् संस्तुत हुई हैं, वे श्रीकृष्ण हैं। हीरे आदि रत्नमय मुकुटसमूहके द्वारा पादपीठके निकट एकत्रित लोकपालोंकी भीड़में प्रकटित जो शब्द-परम्परा होती है, वही 'स्तुति'-रूपमें प्रकाशित हुई है। 'बलिं हरद्भिः'-अपने अपने कार्यमें अवस्थित ब्रह्मादि लोकपालोंके द्वारा भगवान्की आज्ञा पालनको ही यहाँपर 'बलिहरण' कहा गया है। अनेक प्रकारके अनन्त विचित्र ब्रह्माण्ड भगवद्- शक्तिसे प्रकाशमान होते हैं। श्रीहरिकी शक्तिकी विचित्रताके कारण कुछ ब्रह्माण्डोंका परिमाण सौ करोड़ योजन, कुछ ब्रह्माण्डोंका परिमाण निखर्व योजन, कुछ ब्रह्माण्डोंका परिमाण पद्मायुत योजन, और कुछका परिमाण सौ परार्द्ध योजन होता है। उनमें किसी ब्रह्माण्डमें बीस भुवन, किसी ब्रह्माण्डमें पचास, किसी ब्रह्माण्डमें सौ, किसी ब्रह्माण्डमें हजार, किसी ब्रह्माण्डमें दस हजार और किसी ब्रह्माण्डमें एक लाख भुवन हैं। उन सब ब्रह्माण्डोंमें ब्रह्मा-इन्द्रादि लोकपालगण अनेक रूपोंमें विराजमान हैं। उन्हें 'चिरलोकपाल' कहा जाता है। उनके करोड़ों-करोड़ों मुकुटोंके द्वारा श्रीकृष्णकी इस पादपीठकी स्तुति होती है॥ 33 ॥ श्रीकृष्ण-(1) असमोर्ध्व :- परम ईश्वर कृष्ण स्वयं भगवान्। ताते बड़, ताँर सम केह नाहि आन ॥ 34 ॥ अनुवाद-[महाप्रभु उपरोक्त श्लोककी व्याख्या करते हुए कह रहे हैं-] परम ईश्वर श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् 298 ।

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