श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1743, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय 21/31-33 ] भागवतेर एइ श्लोक पड़िला आपने। अर्थ आस्वादिते सुखे करेन व्याख्याने ॥ 32 ॥ अनुवाद—ऐश्वर्यकी बात कहते हुए महाप्रभुके मनमें श्रीकृष्णका ऐश्वर्य-सागर स्फुरित हो उठा, उनके मन तथा इन्द्रियाँ उसीमें डूब गये और वे मुग्ध हो गये। तब महाप्रभुने भागवतका एक श्लोक पढ़ा और उस श्लोकके अर्थका आस्वादन करनेके लिये स्वयं आनन्दपूर्वक उसकी व्याख्या करने लगे॥ 31-32॥ तीनों सर्गोंके अधीश्वर अद्वितीय अविनश्वर लोकपालोंके द्वारा पूजित विग्रह :- श्रीमद्भागवत (3/2/21)में— स्वयन्त्वसाम्यातिशयस्त्र्यधीशः स्वराज्यलक्ष्म्याप्तसमस्तकामः। बलिं हरद्भिश्चिरलोकपालैः किरीटकोटीड़ितपादपीठः॥ 33॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥ 33॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वे स्वयं ब्रह्मा, विष्णु और शिवके अधीश्वर हैं, इसलिये वे समान, हीन और अतिशयसे रहित हैं एवं स्वाराज्यलक्ष्मीके द्वारा उनकी समस्त कामनायें पूर्ण हुई हैं। चिरकालसे सभी लोकपाल उनकी पूजा करनेके लिये आकर उनकी पादपीठकी (चरणकमलोंकी) स्तुति करते हुए अपने मस्तकपर सुशोभित मुकुटोंको झुकाकर प्रार्थना किया करते हैं॥ 33॥ अनुभाष्य—लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डमें ‘श्रीकृष्ण —श्रीनारायणके विलास हैं’ इस पूर्वपक्षका खण्डन करते हुए उत्तरपक्ष वर्णनमें 302-323 संख्यामें इस श्लोककी व्याख्या और कारिका देखें। श्रीकृष्णके अप्रकट होनेपर श्रील उद्धव उनके वियोगमें शोकाकुल होकर श्रीविदुरसे श्रीकृष्णके बालचरित और परम-ऐश्वर्यका वर्णन कर रहे हैं— स्वयं [भगवान्] तु असाम्यातिशयः (न साम्यम् अतिशयश्च यस्मात् सः असमोर्ध्वः), त्र्यधीशः (गोलोकपरव्योमदेवीधाम्नां, गोकुल-मथुरा-द्वारकाधाम्नां वा, कारणं च समष्टिः हिरणयोगर्भो वा व्यष्टिः विराट् वेति सर्गत्रयाणां वा, सत्त्वरजस्तमोगुणाधिष्ठातृणां विष्णुब्रह्माशिवानां वा, चिज्जीवमायाशक्तीनां वा, भूर्भुवःस्वरिति व्याहृतित्रयाणां वा, स्वर्गमर्त्य-पाताल-लोकत्रयाणां वा ईशः अधिपतिः) स्वराज्यलक्ष्म्याप्तसमस्तकामः (परमचिदानन्दस्वरूप- सम्पत्त्या एव लब्धनिखिलभोगः) बलिं (करम् अर्हणं वा) हरद्भिः (समर्पयद्भिः) चिरलोकपालैः (चिरकालीनैः ब्रह्मरुद्राद्यैः) किरीट-कोटीड़ित-पादपीठः (किरीटकोटिभिः कोटि मुकुटाग्रैः ईड़ितं वन्दितं पादपीठं पादसिंहासनं यस्य सः-उग्रसेनं यत् न्यबोधयत्, तत् नः विग्लापयतीत्युत्तरेणान्वयः)। श्लोक-भावानुवाद—जो स्वयं भगवान् हैं, जिनके समान अथवा जिनकी अपेक्षा कोई बड़ा नहीं है, जो तीनों लोकों (गोलोक, परव्योम, देवीधाम; अथवा गोकुल, मथुरा, द्वारका; अथवा कारणोदकशायी, गर्भोदकशायी, पयोब्धीशायी नामक तीन पुरुषोंके; अथवा सतोगुण, रजोगुण, तमोगुणके अधिष्ठातृ देवता क्रमशः विष्णु, ब्रह्मा, शिवके; अथवा भूर्भुवःस्वःके; अथवा स्वर्ग-मर्त्य-पातालके) अधीश्वर हैं, परम चिदानन्द स्वरूप सम्पत्तिके द्वारा जिन्होंने समस्त काम्य वस्तुओंको प्राप्त किया है, पूजोपहार समर्पण करके ब्रह्मादि चिरलोकपाल करोड़ों-करोड़ों मुकुटोंके अग्रभागके द्वारा जिनकी पादपीठकी पूजा करते हैं, वे ही श्रीकृष्ण उग्रसेनके अनुवर्ती होकर चलेंगे, यही उनके दास—हमारे लिये अत्यन्त दुःखका विषय है। (इसका अगले श्लोक ‘तत् नः विग्लापयत्’ के साथ अन्वय करें।)।॥ 33 ॥ अमृतानुकणा—श्रीश्रीमद् रूप गोस्वामी प्रभुने उनके श्रीलघुभागवतामृत-ग्रन्थमें आलोच्य ‘स्वयन्त्वसाम्यातिशय- स्त्र्यधीशः’ (भाः 3/2/21)-श्लोककी जो व्याख्या अपनी कारिकामें प्रदान की है, वह इस प्रकार है,— ‘असाम्यातिशयः’—जिनका अन्यके साथ साम्य नहीं है और जिनसे आधिक्य नहीं है, इन दो विशेषणोंके द्वारा सभी भगवद्-स्वरूपोंसे श्रीकृष्णका उत्कर्ष निरूपित हुआ है, इसलिये यहाँपर परव्योमनाथकी अपेक्षा भी श्रीकृष्णका आधिक्य प्रदर्शित हुआ है। ‘स्वयं’—इस । 297