श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1750, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 21/66-83 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सबको देखकर चतुर्मुख ब्रह्माकी बुद्धि स्तम्भित हो गयी। उनको ऐसा प्रतीत होने लगा मानो वे हाथियोंके झुण्डमें एक मच्छरके समान हैं। समस्त ब्रह्मा आकर जब श्रीकृष्णके चरणकमलोंके आगे दण्डवत् करते, तब उनके मुकुट उनकी पादुकाको स्पर्श करते। श्रीकृष्णकी अचिन्त्य शक्तिको कोई नहीं जान सकता। जितने भी ब्रह्मा थे, श्रीकृष्णने एक ही शरीरसे उतनी ही मूर्तियाँ बनकर उन सबके साथ वार्तालाप किया था। जब वे सब श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें प्रणाम कर रहे थे, तब इतनी भीड़के कारण उनके मुकुट आपसमें टकराकर बड़े जोरसे ध्वनि कर रहे थे और ऐसा लग रहा था वे मुकुट उस ध्वनिके द्वारा श्रीकृष्णकी स्तुति कर रहे हैं। हाथ जोड़कर ब्रह्मा-रुद्रादि श्रीकृष्णका स्तव करते हुए कहने लगे, — “हे प्रभो ! आपने बहुत कृपा करके अपने चरणोंका दर्शन प्रदान किया है। मेरा सौभाग्य है कि आपने मुझे अपने 'दास'के रूपमें अङ्गीकार करके मुझे बुलाया है। यदि आपकी कोई आज्ञा हो तो मैं उसे शिरोधार्य करना चाहता हूँ।” श्रीकृष्णने कहा, — “तुम सबसे मिलनेकी इच्छा हुई थी, इसलिये मैंने तुम्हें एकसाथ बुलाया है। तुम लोग सुखी तो हो, दैत्योंका कोई भय तो नहीं है?” उन्होंने कहा, — “आपकी कृपासे सर्वत्र ही जय है ॥”66-77॥ द्वारकादि विभूतिर एइ त' प्रमाण। 'आमारइ ब्रह्माण्डे कृष्ण' सबार हैल ज्ञान ॥ 78 ॥ कृष्ण-सह द्वारका-वैभव अनुभव हैल। एकत्र मिलने केह काहो ना देखिल ॥ 79 ॥ तबे कृष्ण सर्व-ब्रह्मागणे विदाय दिला। दण्डवत् हञा सबे निज घरे गेला ॥ 80 ॥ अनुवाद—द्वारकादिकी विभूतिका यही तो प्रमाण है कि सभीको यही लगा कि श्रीकृष्ण मेरे ही ब्रह्माण्डमें हैं। इस प्रकार सभीको श्रीकृष्णके साथमें द्वारकाके वैभवका अनुभव हुआ। यद्यपि वे सब एक साथ ही थे, तथापि किसीने भी किसी अन्यको नहीं देखा। तब श्रीकृष्णने समस्त ब्रह्मा-रुद्रादिको विदायी दी। श्रीकृष्णको दण्डवत् करके वे सभी अपने-अपने घर लौट गये ॥ 78-80 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण और द्वारका धामकी अलौकिक विभूतिको चतुर्मुख ब्रह्माने अनुभव किया। यद्यपि दस-सौ-हजार-दस हजार-लाख-करोड़ मुखोंवाले ब्रह्मा और रुद्र वहाँ एकत्रित हुए और इस मिलनको चतुर्मुख ब्रह्मा एवं श्रीकृष्णने ही देखा, तथापि श्रीकृष्णकी इच्छासे आये हुए बृहत् ब्रह्मा और बृहत् शिवोंका परस्परमें साक्षात्कार नहीं हुआ। अथवा, ब्रह्मा-शिवादिसमूहकी ऐसी भीड़ हुई कि उन्हें परस्पर देखने और बातचीत करनेका बिल्कुल भी अवसर ही नहीं मिला एवं किसीको भी किसीका आदर-सत्कार करनेका समय ही नहीं मिला ॥ 79 ॥ देखि' चतुर्मुख ब्रह्मार हैल चमत्कार। कृष्णेर चरणे आसि' कैला नमस्कार ॥ 81 ॥ ब्रह्मा बले, — “पूर्वे आमि ये निश्चय करिलूँ। तार उदाहरण आमि आजि त' देखिलूँ ॥ 82 ॥ अनुवाद—यह सब देखकर चतुर्मुख ब्रह्माको बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने श्रीकृष्णके चरणोंमें आकर प्रणाम किया। ब्रह्माने कहा, — “पहले मैंने अपने ज्ञानके विषयमें जो निश्चित किया था, उसका उदाहरण मैंने आज देखा है ॥ 81-82 ॥ श्रीमद्भागवत (10/14/38)में :— जानन्त एव जानन्तु किं बहूक्त्या न मे प्रभो। मनसो-वपुषो वाचो वैभवं तव गोचरः ॥ 83 ॥ अनुवाद—जो कहते हैं, — 'मैं श्रीकृष्णतत्त्व जानता हूँ', तो वे जानें, किन्तु मैं बहुत कुछ बोलना नहीं चाहता हूँ। प्रभो! मैं केवल इतना ही कहता हूँ कि आपका समस्त वैभव—मेरे मन, शरीर और वाणीके अगोचर है ॥ 83 ॥ 304 ।