श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1751, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुभाष्य-मध्यलीला 21/27 संख्या देखें ॥ 83 ॥ कृष्ण कहे,—“एइ ब्रह्माण्ड पञ्चाशत् कोटि योजन। अति क्षुद्र, ताते तोमार चारि वदन ॥ 84 ॥ कोन ब्रह्माण्ड शतकोटि, कोन लक्षकोटि। कोन नियुतकोटि, कोन कोटि-कोटि ॥ 85 ॥ ब्रह्माण्डानुरूप ब्रह्मार शरीर-वदन। एइरूपे पालि आमि ब्रह्माण्डेर-गण ॥” 86 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णने कहा,—“यह ब्रह्माण्ड पचास करोड़ योजनका है। यह ब्रह्माण्ड बहुत ही छोटा है, इसलिये तुम्हारे केवल चार ही मुख हैं। कोई ब्रह्माण्ड सौ करोड़ योजनका, कोई एक लाख करोड़ योजनका, कोई पचास लाख कोटि योजनका, तो कोई करोड़-करोड़ों योजनका है। ब्रह्माण्डके अनुरूप ही ब्रह्माका शरीर और मुख हैं। इस प्रकार ही मैं समस्त ब्रह्माण्डोंका पालन करता हूँ॥” 84-86 ॥ अनुभाष्य- ब्रह्माण्डको सौ करोड़ योजनका माननेपर उसका आधा पचास करोड़ योजन होता है। मनुने लिखा है- “स्वयमेवात्मनो ध्यानात् तदण्डमकरोद्द्विधा।” [अर्थात् “उन्होंने स्वयं अपने ध्यानसे उस ब्रह्माण्डको दो भागोंमें विभक्त किया।”] सूर्य्यसिद्धान्तके 12/90 श्लोकमें- “ख-व्योम-खत्रय-खसागर-षट्कनाग-व्योमाष्टशून्य-यमरूप- नगाष्टचन्द्राः। ब्रह्माण्डसम्पुट-परिभ्रमणं समन्तादभ्यन्तरे दिनकरस्य करप्रसारः॥” [अर्थात् “ब्रह्माण्डकी कक्षा 18,71,20,80,86,40,00,000 योजन है। इसके बीचमें सूर्यकी किरणोंका विस्तार है।”] सिद्धान्त-शिरोमणिमें ग्रहगणितमें मध्यमाधिकारमें कक्षा- प्रक्रममें और गोलाध्यायके भुवनकोशके 67 श्लोकमें- “कोटिघ्नैर्नखनन्दषट्क-नखभूभृद्भुजङ्गेन्दुभिर्ज्योतिः शास्त्रविदो वदन्ति नभसः कक्षामिमां योजनैः तद्-ब्रह्माण्ड-कटाहसम्पुटतटे केचिज्जगुर्वेष्टनं केचित् प्रोचुरदृश्य-दृश्यमगिरेिं पौराणिकां सुरयः॥” [अर्थात् “ज्योतिर्विद्याके विद्वान कहते हैं कि आकाश-कक्षाका परिमाण 18,71,20,69,20,00,00,000 योजन है। इस परिमाणको कोई-कोई पौराणिक पण्डित ब्रह्माण्डरूप कड़ाहेकी परिधि कहते हैं। कोई कोई कहते हैं कि यह लोकालोक पर्वतका परिमाण है।”] ॥ 84 ॥ 'एकपाद विभूति', इहार नाहि परिमाण। 'त्रिपाद विभूति'र केबा करे परिमाण ॥ 87 ॥ अनुवाद-मेरी इस एकपाद विभूतिको कोई माप नहीं सकता, तब फिर मेरी त्रिपाद विभूतिको कौन माप सकता है?॥ 87 ॥ पाद्मोत्तरखण्ड (255/58)में :- तस्याः पारे परव्योम त्रिपाद्भूतं सनातनम्। अमृतं शाश्वतं नित्यमनन्तं परमं पदम् ॥ 88 ॥ अनुवाद-उस विरजाके परे अमृत, नित्य, सनातन, अनन्त, परमपद-स्वरूप, त्रिपाद्भूत परव्योम है, तात्पर्य यह है कि परव्योम चिद्-जगत् है। इसलिये अशोक, अभय और अमृतरूप त्रिपाद-विभूति उसमें नित्य वर्तमान है। समस्त मायिक वस्तुएँ मिलकर श्रीकृष्णकी एकपाद विभूतिमात्र हैं॥ 88 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 21/51 श्लोक देखें ॥ 88 ॥ श्रीकृष्णका वैभव-दुर्ज्ञेय :- तबे कृष्ण ब्रह्नारे दिलेन विदाय। कृष्णेर विभूति-स्वरूप जानन ना याय ॥ 89 ॥ अनुवाद-तब श्रीकृष्णने चतुर्मुख ब्रह्माको विदायी दी। श्रीकृष्णके विभूति-स्वरूपको कोई जान नहीं सकता ॥ 89 ॥ अनुभाष्य-लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डमें 'श्रीकृष्ण- श्रीनारायणके विलास हैं', इस पूर्वपक्षका खण्डन करते हुए श्रीरूपकृत-व्याख्या और कारिकामें 313-323 संख्यामें यह उपाख्यान वर्णित है ॥ 59-89 ॥ । 305