भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1752

[ 21/90–98 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (घ) श्रीकृष्णके तद्रूपवैभव-धामगत चौथा (गूढ़) अर्थ :- 'त्र्यधीश्वर'-शब्देर अर्थ 'गूढ़' आर हय। 'त्रि'-शब्दे कृष्णेर तिन लोक कय॥90॥ अनुवाद—'त्र्यधीश्वर'-शब्दका अन्य और भी गूढ़ अर्थ है, 'त्रि'-शब्द श्रीकृष्णके तीन लोकोंके विषयमें बतलाता है॥90॥ श्रीकृष्णके तीन धाम :- गोलोकाख्य गोकुल, मथुरा, द्वारावती। एइ तिन लोके कृष्णेर सहजे नित्यस्थिति॥91॥ अनुवाद—गोलोक अर्थात् गोकुल, मथुरा और द्वारका—इन तीन लोकोंमें श्रीकृष्ण स्वाभाविक रूपसे नित्य ही वास करते हैं॥91॥ अनुभाष्य—गोलोकके तीन प्रकोष्ठ—(1) गोकुल, (2) मथुरा, (3) द्वारका। श्रीकृष्णलीलाके तीन प्रकोष्ठोंकी भाँति श्रीगौरलीलामें भी अन्तरङ्ग पूर्णैश्वर्यमय तीन प्रकोष्ठ हैं—(1) नवद्वीप-मण्डल, (2) श्रीक्षेत्रमण्डल, (दाक्षिणात्य?) और (3) व्रजमण्डल॥91॥ स्वयं श्रीकृष्ण ही तीनों धामोंके सम्राट् :- अन्तरङ्ग-पूर्णैश्वर्यपूर्ण तिन धाम। तिनेर अधीश्वर कृष्ण—स्वयं भगवान्॥92॥ अनुवाद—ये तीनों धाम अन्तरङ्ग-पूर्णैश्वर्योंसे परिपूर्ण हैं। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण इन तीनों धामोंके अधीश्वर हैं॥92॥ अनन्त वैकुण्ठ, ब्रह्माण्ड और दिशाओंके अधिपतियोंके द्वारा वन्दित-चरण श्रीकृष्ण :- पूर्व-उक्त ब्रह्माण्डरे यत दिक्पाल। अनन्त वैकुण्ठावरण, चिरलोकपाल॥93॥ ताँ-सबार मुकुट कृष्णपादपीठ-आगे। दण्डवत्काले तार मणि पीठे लागे॥94॥ मणि-पीठे ठेकाठेकि, उठे झन्झनि। पीठेर स्तुति करे मुकुट हेन जानि॥95॥ अनुवाद—पहले कहे गये ब्रह्माण्डोंके जितने भी दिक्पाल और अनन्त वैकुण्ठोंके आवरणोंमें रहनेवाले जितने चिरलोकपाल हैं, श्रीकृष्ण-पादपीठके आगे दण्डवत् करते समय उन सबके मुकुटोंकी मणियाँ श्रीकृष्णके सिंहासन और पादपीठको स्पर्श करती हैं। मणियोंके पादपीठसे टकरानेपर झनझनकी ध्वनि होती है और वह ध्वनि ऐसी लगती है मानो मुकुट पादपीठकी स्तुति कर रहे हों॥93–95॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 21/58 संख्या देखें॥93॥ स्वाराज्य-लक्ष्मीका अर्थ :- निज-चिच्छक्त्ये कृष्ण नित्य विराजमान। चिच्छक्ति-सम्पत्तिर 'षडैश्वर्य' नाम॥96॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥96॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण स्वाराज्यलक्ष्मीरूप अपनी चिद्-शक्तिसे युक्त होकर नित्य विराजमान हैं। भगवान्‌की चिद्-शक्ति-सम्पत्तिको ही 'षडैश्वर्य' कहते हैं। 'चिच्छक्ति'—चिद्-शक्तिमद्-विग्रह श्रीकृष्णकी अपनी शक्ति और सेविका है॥96॥ वे—श्रीकृष्णकी सेविका :- सेइ स्वाराज्यलक्ष्मी करे नित्य पूर्ण काम। अतएव वेदे कहे 'स्वयं भगवान्'॥97॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी स्वाराज्यलक्ष्मी ही नित्य श्रीकृष्णकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करती है, इसलिये वेद श्रीकृष्णको 'स्वयं भगवान्' कहते हैं॥97॥ श्रीकृष्णका ऐश्वर्य—अगाध अमृतका समुद्र :- कृष्णेर ऐश्वर्य—अपार अमृतेर सिन्धु। अवगाहिते नारि, तार छुँइल एक बिन्दु॥”98॥ 306 |