भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1753

इक्कीसवाँ अध्याय 21/98-100 ] अनुवाद—श्रीकृष्णका ऐश्वर्य अपार अमृतका सिन्धु है। मैं उसमें डुबकी लगाकर स्नान नहीं कर सकता हूँ, इसलिये मैंने केवल उसकी एक बूँदको ही स्पर्श किया है॥”98॥ ऐश्वर्य-माधुरीका वर्णन करते हुए महाप्रभुकी श्रीकृष्णविग्रह-माधुरीकी स्फूर्ति :- ऐश्वर्य कहिते प्रभुर कृष्णस्फूर्ति हैल। माधुर्ये मजिल मन, एक श्लोक पड़िल॥99॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके ऐश्वर्यका वर्णन करते-करते महाप्रभुको श्रीकृष्णके माधुर्यकी स्फूर्ति हो आयी। उनका मन श्रीकृष्णके माधुर्यमें रम गया और उन्होंने एक श्लोक पढ़ा॥99॥ अपनी नरलीलाके उपयुक्त अलौकिक लीला-माधुर्यसे श्रीकृष्ण स्वयं ही मुग्ध :- श्रीमद्भागवत (3/2/12)में— “यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोगमाया- बलं दर्शयता गृहीतम्। विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम् ॥100॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 100॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वही श्रीकृष्णमूर्ति अपनी चिद्-शक्तिका बल प्रदर्शित करानेकी इच्छासे मर्त्यलीलाके उपयोगी, स्वयंमें भी विस्मय उत्पन्न कर देनेवाली एवं समस्त सौभाग्य-ऋद्धिके परमपद (पराकाष्ठा) और समस्त भूषणोंको भूषित करनेमें समर्थ है॥100॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णकी अप्रकट अवस्थामें श्रील उद्धव उनके विरहमें शोकसे कातर होकर श्रीविदुरसे श्रीकृष्णके अतुल रूप-माधुर्यका वर्णन कर रहे हैं— यत् (बिम्बं) मर्त्यलीलौपयिकं (मर्त्यलीलासु औपयिकं योग्यं नराकारं) स्वयोगमायाबलं (निजचिच्छक्तेः वीर्यं) दर्शयता (प्रकाशयता) [भगवता स्वयं] गृहीतं (स्वीकृतं) स्वस्य च (आत्मनः अपि) विस्मापनं (विस्मयजनकं) सौभगर्द्धेः (सौभाग्यातिशयस्य) परं पदं (पराकाष्ठा, प्रतिष्ठा) भूषणभूषणाङ्गं (भूषणानां भूषणानि अङ्गानि यस्मिन् तत् स्वबिम्बं) [प्रदर्श्य अन्तरधात् इति पूर्वेणान्वयः]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। 'प्रदर्श्य अन्तरधात्' पूर्व श्लोक (3/2/11) के साथ उसका अन्वय करें॥ 100 ॥ अमृतानुकणा—श्रीश्रीमद्रूप-गोस्वामी प्रभुपाद-कृत 'लघुभागवतामृत'में अपनी कारिकामें आलोच्य 'यन्मर्त्यलीलौपयिकं' इस श्रीमद्भागवतीय श्लोककी व्याख्या प्रदत्त हुई है। इसके पूर्वश्लोकमें कहे गये 'स्वबिम्बं'से यहाँपर 'यत्'-पदके द्वारा 'बिम्ब'-पदको कहा जा रहा है, अर्थात् जो बिम्ब (श्रीविग्रह) मर्त्यलीलासमूहके अतिशय उपयोगी है। अनेक प्रकार आश्चर्य, माधुर्य, वीर्य और ऐश्वर्यादिकी सम्पूर्ण प्रकाश होकर श्रीकृष्णकी मर्त्यलीला उनकी अन्यान्य देवलीलाओंकी अपेक्षा भी अतीव मनोहारिणी है। यहाँपर 'बिम्ब'-पदके द्वारा सद्गुणावलीसम्पन्न परव्योमनाथादि सभी स्व-स्वरूपगणोंके मूलतत्त्व जो श्रीकृष्ण हैं, वे ही लक्षित हुए हैं। इसलिये, सम्पूर्ण रूप और गुणोंके आश्रय हेतु वह बिम्ब जो विचित्र नरलीलाके अतिशय योग्य है, वही कथित हुआ है। *'स्वयोगमायाबलं'—*स्वयोगमाया अर्थात् चिद्-शक्ति, उनका 'बल' अर्थात् सामर्थ्य। चिद्-शक्तिके सामर्थ्यको ही 'दर्शयता गृहीतम्' अर्थात् साक्षात् करवानेके लिये (उन्होंने जो बिम्ब) प्रकट किया है। 'अहो! मेरी चिद्-शक्तिके अद्भुत प्रभावका दर्शन करो, जिसकी गन्धमात्र भी दिव्यातिदिव्य लोकसमूहमें सम्भवपर नहीं है'—इस प्रकारसे चिद्-शक्ति-प्रभाव दर्शन करवाते हुए श्रीकृष्णका इस प्रकार जगमोहन-रूप जो योगमायाके द्वारा आविष्कृत हुआ है, यही उस 'स्वयोगमाया' आदि पदका अभिप्राय है। *'विस्मापनं स्वस्य च'—*वही बिम्ब 'स्वस्य' अर्थात् स्वयंको और परव्योमनाथादि आत्मदर्शोको 'विस्मापन' अर्थात् नवनवायमानरूपमें परम चमत्कृत । 307