भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1754, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1754

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[ 21/100-103 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला करनेवाला है। वह बिम्ब 'सौभगर्द्धेः परं पदं'—'सौभगर्द्धि' अर्थात् महाश्चर्यमय सौन्दर्यकी पराकाष्ठाका 'परंपद' अर्थात् नित्य उत्कर्ष-सम्पत्तिका परमाश्रय है। 'भूषणभूषणाङ्गम्'—कौस्तुभ, मकर-कुण्डलादि जो भूषण हैं, उनके भी भूषणस्वरूप अर्थात् उनकी भी शोभाको वर्द्धन करनेवाले जिनके अङ्गसमूह हैं, उन श्रीविग्रहका असमोर्ध्वत्व ही यहाँपर वर्णित हुआ है। यहाँपर 'श्रीकृष्णका जो बिम्ब (श्रीविग्रह) स्वयंमें भी अत्यन्त विस्मयका उत्पादन करनेवाला है'—इस प्रकार वाक्यमें जो देह-देहीका भेद प्रतीत होता है, वह औपचारिक (आरोपित) मात्र है, क्योंकि भगवान् और भगवद्-विग्रह दोनों ही अभिन्न और सच्चिदानन्दघन हैं। कूर्मपुराणमें भी उसी प्रकार कहा गया है—"देह-देहि-भिदा चात्र नेश्वरे विद्यते क्वचित्"—परमेश्वरमें कभी भी देह-देहीका भेद नहीं होता॥100॥ द्विभुज चिरकिशोर मुरलीधर-विग्रह :- [यथा राग:] कृष्णेर यतेक खेला, सर्वोत्तम-नरलीला, नरवपु ताहार स्वरूप। गोपवेश, वेणुकर, नवकिशोर, नटवर, नरलीलार हय अनुरूप॥101॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी जितनी भी लीलाएँ हैं, उनमें सबसे सर्वोत्तम नरवत् लीला ही है। श्रीकृष्णका अनादिसिद्ध निज-स्वरूप ही नराकृति है। उनका गोपवेश, हाथमें वेणु धारण करना, नवकिशोर अवस्था, नटवर रूप नरलीलाके अनुरूप ही होता है॥101॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णकी गोकुल-लीला, वासुदेव- सङ्कर्षणादि परव्योम-लीला, कारणार्णवशायी आदि पुरुषावतार-लीला, मत्स्य-कूर्म आदि नैमित्तिक अवतार-लीला, ब्रह्मा-शिवादि गुणावतार-लीला, पृथु- व्यासादि आवेशावतार-लीला, सविशेष परमात्मादि-लीला, निर्विशेष ब्रह्म आदि अनन्त क्रीड़ामय भगवान्‌की लीलाओंमेंसे तारतम्य (श्रेष्ठ और निम्न)के विचारसे श्रीकृष्णकी नरलीला ही सर्वश्रेष्ठ है। श्रीकृष्णका स्वरूप—नरवपु, गोपवेश, वेणुधारी, नवकिशोर और नटवर है। श्रीकृष्णका स्वरूप—नरलीलाके समान है, किन्तु वह तुच्छ, मरणशील, अनित्य, अमङ्गलकारी, सीमित, छितराया हुआ (खण्डोंमें) अथवा विभाजित आदि प्राकृत विशेषणोंके मलसे युक्त नहीं है॥101॥ श्रीकृष्णकी श्रीविग्रहमाधुरीका वर्णन; श्रीकृष्णरूप—सभीको आकर्षित करनेवाला :- कृष्णेर मधुर रूप, शुन, सनातन। ये रूपेर एक कण, डुबाय ये त्रिभुवन, सर्वप्राणी करे आकर्षण॥102॥ध्रु॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥102॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके मधुररूपका एक कण गोकुल, मथुरा और द्वारका,—इन तीन भुवनोंको, अथवा अन्तःपुर गोलोक-वृन्दावन, मध्यम-आवास परव्योम और बाह्य-आवास देवीधाम,—इन तीन भुवनोंको डुबो देनेमें समर्थ है एवं उन तीनों भुवनोंके प्राणियोंको अपनी रूपमाधुरीसे आकर्षित करता है॥102॥ नित्यलीला प्रकट करनेमें योगमायाके प्रभावका प्रदर्शन :- योगमाया चिच्छक्ति, विशुद्धसत्त्व-परिणति, तार शक्ति लोके देखाइते। एइरूप रतन, भक्तगणेर गूढ़धन, प्रकट कैला नित्यलीला हैते॥103॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें॥103॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णमूर्ति उनकी चिद्-शक्ति- नामक योगमायाके सन्धिनीगत विशुद्धसत्त्व-तत्त्वका परिणामस्वरूप है॥103॥ अनुभाष्य—परव्योमादिमें विशुद्धसत्त्वकी परिणतिरूपा 308 |

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