भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1755, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1755

इक्कीसवाँ अध्याय 21/103-107 ] चिच्छक्ति योगमायाकी अवस्थिति नहीं है। उस योगमायाके कि श्रीकृष्णके अङ्ग मानो अलङ्कारोंके भी अलङ्कार हैं। अपूर्व असामान्य शक्तिके कार्यको दिखलानेके लिये वैसी अङ्गोंकी शोभा होनेपर भी ललित-त्रिभङ्ग मुद्रासे ही श्रीकृष्णने भक्तोंके लिये अत्यन्त गोपनीय और तो शोभा अधिक परिमाणमें वर्द्धित हो जाती है। उसपर आदरणीय रत्नस्वरूप नित्यलीला गोलोकसे प्रपञ्चमें भी नेत्रोंके ऊपरी भागमें धनुष जैसी भ्रू (भौंहें) नृत्य प्रकट की ॥ 103 ॥ कर रही हैं। श्रीकृष्ण तिरछे भावसे अपाङ्ग-दृष्टिरूप बाण भ्रू-रूपी धनुषपर चढ़ाकर श्रीराधा एवं उनकी अपने रूपके भोगकी स्वयंकी ही तीव्र आsub/आकांक्षा :- अनुगत गोपियोंके मनको बिद्ध (घायल) करनेके रूप देखि' आपनार, कृष्णेर हैल चमत्कार, उद्देश्यसे दृढ़ रूपमें सन्धान कर रहे हैं ॥ 105 ॥ आस्वादिते मने उठे काम। श्रीकृष्णके रूपसे परव्योमके श्रीनारायण 'स्वसौभाग्य' याँर नाम, सौन्दर्यादि-गुणग्राम, और लक्ष्मियाँ भी आकृष्ट :- एइरूप नित्य तार धाम ॥ 104 ॥ ब्रह्माण्डोपरि परव्योम, ताँहा ये स्वरूपगण, ताँ-सबार बले हरे मन। अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 104 ॥ पतिव्रता-शिरोमणि, याँरे कहे वेदवाणी, अमृतप्रवाह भाष्य-सौन्दर्य आदि गुणसमूह जिस आकर्षये सेइ लक्ष्मीगण ॥ 106 ॥ चिद्-तत्त्वका परम सौभाग्य है, वह इस श्रीकृष्णरूपमें नित्य अवस्थित है ॥ 104 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 106 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णरूपकी असामान्य चमत्कारिता अनुभाष्य-श्रीकृष्णका रूप इतना मनोरम है कि ऐसी है कि वह स्वयं श्रीकृष्णमें ही विस्मय उत्पन्न वह प्राकृत जगत्के सभी प्राणियों और देवताओंकी बात करती है एवं उसे आस्वादन करनेके लिये श्रीकृष्णकी तो दूर, ब्रह्माण्डके ऊपर परव्योममें रहनेवाले श्रीनारायण भी उत्कण्ठा वर्द्धित होती है। समस्त सौन्दर्य, ज्ञान, आदि श्रीकृष्णस्वरूपोंके मनको भी बलपूर्वक हरण ऐश्वर्य, वीर्य, यश और वैराग्यात्मक छः प्रकारके करता है। वेदोंमें जिन लक्ष्मियोंको एकमात्र ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण निज अतिशय-सौभाग्य श्रीकृष्णमें ही 'पतिव्रता-शिरोमणि' कहा गया है, वे भी श्रीकृष्णके नित्य अवस्थित है ॥ 104 ॥ सौन्दर्यसे आकर्षित होकर श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी अभिलाषा करती हैं ॥ 106 ॥ गोलोकके आश्रयवर्ग विषयके रूपसे मुग्ध और आकृष्ट :- “राधाजीके साथ सुशोभित होनेपर ही मदनमोहन" :- भूषणेर भूषण अङ्ग, ताँहे ललित त्रिभङ्ग, चढ़ि' गोपी-मनोरथे, मन्मथेर मन मथे, ताहार उपर भ्रूधनु-नर्त्तन। नाम धरे 'मदनमोहन'। तेरछे नेत्रान्ते बाण, तार दृढ़ सन्धान, जिनि' पञ्चशर-दर्प, स्वयं नवकन्दर्प, बिन्धे राधा-गोपीगण-मन ॥ 105 ॥ रास करे लञा गोपीगण ॥ 107 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 105 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 107 ॥ अनुभाष्य-अलङ्कार अङ्गोंके भूषण होते हैं, किन्तु अनुभाष्य-गोपियोंके अनुकूल चित्तवृत्तिरूप मनोरथ श्रीकृष्णके अङ्गोंकी शोभा इतनी अपूर्व और अद्भुत है पर चढ़कर उनके द्वारा अपनी सेवा स्वीकार करके । 309

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