भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1757, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1757

इक्कीसवाँ अध्याय 21/111-112 ]

वर्णन जिस प्रकार किया है, श्रीगौरहरिने 'कृष्णरस'का वर्णन करते हुए प्रेमसे भरकर श्रीसनातनका हाथ पकड़कर प्रेमावेशमें उस श्लोकका उच्चारण किया॥ 111॥

श्रीमद्भागवत (10/44/14)में :- “गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं लावण्यसारमसमोर्द्धमनन्यसिद्धम्। दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप- मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य ॥ 112 ॥

अनुवाद-मथुरावासिनियाँ बोलीं,- “आहा! गोपियोंने ऐसी कौनसी तपस्या की ! वे समस्त श्री, ऐश्वर्य और यशके एकान्त आश्रय, दुर्लभ, स्वतःसिद्ध, असमोर्ध्व, लावण्यके साररूप इन श्रीकृष्णके मुखामृतका नेत्रोंके द्वारा निरन्तर पान करती रहती हैं॥” 112 ॥

अनुभाष्य-आदिलीला 4/156 संख्या देखें ॥ 112 ॥

अमृतानुकणिका-इस श्लोकमें-यश, वीर्य और ऐश्वर्य-भगवान्के छः गुणोंमें-से ये तीन गुण ही वर्णित हुए हैं, परन्तु इन तीन गुणोंके द्वारा छहों गुणोंको ही समझना चाहिये। इसलिये माथुर रमणियाँ श्रीकृष्णको ऐश्वर्य, वीर्य, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य-इन सबके एकान्त धाम कह रही हैं। वे कैसे धाम है? ऐश्वर्य-लौकिक, नरवत् भावको अतिक्रमण करके जो भाव है उसको ऐश्वर्य कहते हैं अर्थात् साधारण व्यक्ति जिसे नहीं कर सकते, उसे ऐश्वर्य कहते हैं। गोवर्धनको धारण करना यह किसी भी मनुष्यके लिये सम्भव नहीं है, इसलिये श्रीकृष्णका गोवर्धन धारण करना अलौकिक है। श्रीकृष्णने यशोदा माताको अपने मुखमें दो बार विराट रूप दिखाया, यशोदाजीने कृष्णके मुखमें असंख्य ब्रह्माण्ड देखे और स्वयंको उस मुखमें देखा। दुर्वासाजी और अर्जुनने भी ऐसा ही देखा। वृन्दावनकी प्रत्येक लीलामें श्रीकृष्णने बालक होकर भी बिना अस्त्र-शस्त्रके, बिना रूप बढ़ाये बड़े-बड़े असुरोंका संहार कर दिया। ये सब ऐश्वर्यकी लीलाएँ हैं। कुवलयापीड़ हाथीका वध करना भी अलौकिक है। कंस भी महाबलवान था। जरासन्ध कंसकी परीक्षा लेनेके लिये मथुरापर आक्रमण करने आया और उसने अपने सैनिकोंके साथ गोकुलमें डेरा जमाया। कंस मथुरासे ही हाथियोंके पैरोंको पकड़कर जरासन्धकी सेनाके ऊपर फेंकने लगा और उनके नीचे दबकर जरासन्धके अनेक सैनिक मर गये। इतने बलवान कंसको श्रीकृष्णने खेल-ही-खेलमें मार दिया। द्वारकामें श्रीकृष्णकी एक विशेष ऐश्वर्य लीलाका वर्णन एक पौराणिक उपख्यानमें देखा जाता है (इसी अध्यायकी पयार संख्या 59-89 देखें)। वैकुण्ठमें जितना ऐश्वर्य है उससे भी अधिक ऐश्वर्य श्रीकृष्णमें है। वैकुण्ठाधिपतिमें ऐश्वर्य है, किन्तु वे जन्म नहीं ले सकते-इस जगत्में किसीके पिता, पुत्र, पति नहीं हो सकते। श्रीकृष्णमें यह सब कुछ है। 'वीर्य' - श्रीकृष्णकी वीरताको समझनेके लिये कुछ प्रसङ्गोंका यहाँ वर्णन कर रहे हैं। भीष्म पितामह अद्वितीय वीर थे, उनके पास इच्छा-मृत्युका वरदान था। भगवान्के अवतार परशुराम भी उनको युद्धमें पराजित नहीं कर सके। श्रीकृष्णने प्रतिज्ञा की थी कि वे कुरुक्षेत्र युद्धमें अस्त्र-शस्त्र नहीं धारण करेंगे, किन्तु भीष्म पितामहने प्रतिज्ञा की थी कि मैं कुरुक्षेत्रके युद्धमें श्रीकृष्णसे अस्त्र धारण करवाऊँगा। एक दिन श्रीकृष्ण अर्जुनके रथका सञ्चालन कर रहे थे। अर्जुनने ऐसी प्रतिज्ञा की थी कि वे भीष्म पितामहको किसी वीरको नहीं मारने देंगे। प्रातःकालसे अर्जुन भीष्ममें युद्ध करते रहे। सायंकाल तक युद्ध चलता रहा और अर्जुनने भीष्म पितामहको सारा दिन इतना व्यस्त रखा कि वे किसी वीरको मार नहीं पाये। अर्जुन पसीनेसे तर-बतर हो गये और युद्ध-विरामसे थोड़ी देर पहले एक क्षणके लिये अपने हाथोंसे पसीनेको थोड़ासा पोंछा, इतनेमें ही भीष्म पितामहने दस हजार महारथियोंको मार दिया। श्रीकृष्णने देखा कि भीष्म पितामह तो अर्जुनका भी वध कर देंगे। उन्हें क्रोध आ गया और रथके चक्केको

311