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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 1758

[ 21/112 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

चक्रकी भाँति उठाकर भीष्म पितामहकी ओर तीव्र गतिसे दौड़े। ब्रह्मादि देवता जो आकाशसे युद्धक्षेत्रको देख रहे थे, वे बोले कि आज अवश्य ही भीष्मकी मृत्यु होगी। यदि श्रीकृष्ण चक्र चला देते तो भीष्म पितामहकी मृत्यु अवश्यम्भावी थी। दुर्योधन, कर्णादि सभी लोग स्तम्भित हो गये। यदि चाहते तो श्रीकृष्ण एक ही दिनमें सबका संहार कर देते। तभी अर्जुनने दौड़कर उनके चरणोंको पकड़ लिया और बोले,—“हे प्रभो! आप अपनी प्रतिज्ञा भङ्ग मत कीजिये, मैं ही उनके लिये पर्याप्त हूँ।” और अर्जुनकी बहुत विनती सुनकर श्रीकृष्ण शान्त हुए।

रुक्मणी विवाहके समय वे कात्यायानी देवीकी पूजाके लिये गयीं और उनकी सुरक्षाके लिये अनेकों सैनिकोंने उन्हें घेर रखा था। शिशुपालको वर बनाया था और जरासन्ध, दुर्योधन, कर्ण, दुःशासनादि सब लोग आये थे कि श्रीकृष्ण किसी प्रकारसे रुक्मणीका हरण न कर लें। परन्तु श्रीकृष्ण अचानक उन वीरों बीच प्रकट हो गये और रुक्मिणीजीके हाथको पकड़कर उन्हें रथपर बिठा लिया। उन्होंने रथकी बागडोर रुक्मिणीजीके हाथोंमें दे दी और अपना धनुष-बाण लेकर खड़े हो गये और देखते-ही-देखते सबको परास्त करके रुक्मिणीजीका हरण कर लिया जैसे गरुड़ सर्पोंके बीचमेंसे अपने भागको उठा लेता है।

राजा नग्नजितकी प्रतिज्ञा थी कि मैं अपनी पुत्री नाग्नजितीका विवाह उससे करूँगा जो एक साथमें मेरे इन सातों साँडोंको नथ दे। दस-बीस बड़े-बड़े वीर मिलकर भी जिनमें-से एक साँडको भी नहीं बाँध सकते थे, ऐसे सात बड़े-बड़े साँडोंको एक साथ वशीभूत करके इन सबकी नाकमें नकेल डालकर श्रीकृष्ण इनको पकड़कर ऐसे खींचने लगे जैसे कोई बालक काठके बैलोंको घसीटता है।

नरकासुर, इन्द्र, पौण्ड्र अद्भुत वीरता दिखलायी देती है। महाभारत युद्धके समाप्त होनेके बाद अर्जुन और भीममें विवाद हो गया


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

कि उनमें-से किसके द्वारा युद्ध जीता गया। दोनोंमें झगड़ा होने लगा और भीमने अपनी गदा तथा अर्जुनने अपना गाण्डीव उठा लिया। श्रीकृष्णने उन्हें लड़नेसे रोक दिया और उन्हें बर्बरीकके पास ले जाकर कहा,—“बर्बरीक! तुम सम्पूर्ण युद्धके साक्षी हो, बताओ इन दोनोंमें-से किसके द्वारा महाभारतका युद्ध जीता गया।” बर्बरीक बोला,—“यह व्यर्थका विवाद है। मैंने देखा कि आपने ही दोनों सेनाओंका संहार किया। आपके अतिरिक्त अन्य कोई वीर ही नहीं था।”

‘यश’—अन्य भगवद्रूपोंका यश भी सर्वत्र देखा जाता है, किन्तु श्रीकृष्णके समान किसी औरका यश नहीं है।

‘ज्ञान’—भगवद्गीतामें जो ज्ञान बताया है अथवा श्रीमद्भागवतम्के दशम और एकादश स्कन्धमें उद्धव-सन्देश या उद्धव-संवादमें जो उद्धवजीको जो ज्ञान दिया है, ऐसा ज्ञान कहीं भी नहीं है, यहाँ तक कि उपनिषदों, वेदोंमें भी नहीं है।

‘वैराग्य’—शरद ऋतुमें पूर्णिमाकी रात्रि है और वृन्दावनकी प्राकृतिक सौन्दर्यके द्वारा यमुनाजीकी छटा निराली हो रही है। श्रीकृष्ण परम सुन्दरी, सर्वगुण-सम्पन्ना महाभाववती करोड़ों गोपियोंको रासमें अचानक छोड़कर अन्तर्धान हो गये। संसारमें ऐसा करना किसी भी पुरुषके लिये सम्भव नहीं है। मूसल लीलामें श्रीकृष्णके समस्त परिजन मारे गये और वे अविचलित, ग्लानिरहित होकर शान्त बैठकर सब देखते रहे।

त्याग, वैराग्य, रूप, गुण, लीलाएँ, उदारता आदि समस्त विषयोंमें श्रीकृष्ण निरूपम हैं, उनके समान कोई नहीं है। विशेषकर चार गुण—रूप-माधुरी, गुण-माधुरी, वेणु-माधुरी और प्रेम-माधुरी अन्य किसी भी भगवद्रूपमें भी नहीं है।

‘रूप’—वह सभीको आकर्षित करके उन्मत्त बना देता है, विशेषकर स्त्रियोंको परम मनोहर लगता है। श्रीकृष्णके रूपको देखकर मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जिस योनिमें जो भी, जहाँ भी है, स्त्रीजाति अधिक


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