श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1759, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय 21/112 ] आकृष्ट होती है। श्रीरामका, श्रीनारायणका रूप भी बहुत सुन्दर है, किन्तु श्रीकृष्णके जैसा किसीका रूप नहीं है। श्रीरूपगोस्वामी विरचित श्रीगान्धर्वासंप्रार्थनाष्टकम् श्लोक-३- श्यामे! रमारमण-सुन्दरता-वरिष्ठ- सौन्दर्य-मोहित-समस्त-जगज्जनस्य। श्यामस्य वामभुज-बद्धतनुं कदाहं त्वामिन्दिरा-विरल-रूपभरां भजामि ?॥ अर्थात् “हे श्रीमती श्यामे! आपका श्रीविग्रह, नारायण भगवान्की सुन्दरतासे भी श्रेष्ठ, अपने सौन्दर्यके द्वारा समस्त जगत्जनोंको मोहित करनेवाले श्यामसुन्दरकी बायीं भुजासे निबद्ध है, अर्थात् आप श्रीकृष्णके वामाङ्गमें विराजमान हैं एवं आपके रूपकी समता प्राप्ति लक्ष्मीदेवीके लिये भी दुर्लभ है मैं तुम्हारी इस प्रकारकी छविका कब भजन किया करूँगा ?” माथुर रमणियाँ कह रही हैं- 'दृग्भिः पिबन्त्यनुसवं' गोपियोंने अपने नेत्रोंके द्वारा मदिरा (अमृत)का पान किया। वह अमृत क्या था? वह था श्रीकृष्णका रूप-प्रेमादि। 'दुराप-मेकान्तधाम'- जो अन्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ है, अपने प्रेमके द्वारा गोपियोंने अपने नेत्रोंसे श्रीकृष्णकी असमोर्ध्व रूपमाधुरीका पान किया। 'लावण्यसारमसमोर्ध्वम्'- लावण्य अर्थात् कान्ति। एक काला व्यक्ति भी लावण्यके कारण सुन्दर दिखता है और गोरा व्यक्ति भी यदि शरीरपर लावण्य न रहे तो उतना सुन्दर नहीं दिखता है। श्रीकृष्ण श्याम वर्ण होनेपर भी निराले लावण्यसे युक्त हैं। मोती श्वेत होता है और उसमेंसे ज्योति निकलती है, यही ज्योति ही लावण्य-सार है। उसी प्रकार श्रीकृष्णके शरीरसे भी ऐसी दीप्ति या लावण्य निकलता है जिसे देखते ही सभी लोग मुग्ध हो जाते हैं। श्रीकृष्णका लावण्य-सार असमोर्ध्व है। अर्थात् श्रीकृष्णके समान भी किसीके भी रूपका आकर्षण नहीं है, उससे अधिक होनेका तो किसीमें सामर्थ्य ही नहीं है। वह अतुलनीय है। यद्यपि श्रीकृष्णके मुखारविन्दकी कमलसे तुलना की गयी है, तो क्या कमलका सौन्दर्य श्रीकृष्णके मुखके सौन्दर्यके समान हो सकता है, यह कदापि सम्भव नहीं है। त्रिजगत्में ऐसा कोई नहीं है जिससे उनके मुखारविन्दकी तुलना की जाय, इसलिये उपमा-अलङ्कार ही दिया गया है। 'अनन्यसिद्धम्'- किसी थोड़े कुरूप व्यक्तिको भी उबटन लगाकर स्नानके बाद शृङ्गारकर अनेक प्रकारके अलङ्कारोंसे अलंकृत किया जाय, तो वह भी सुन्दर दिखने लगता है। उबटन-अलङ्कारोंकी सहायतासे वह व्यक्ति कुछ सुन्दर प्रतीत होता है। किन्तु श्रीकृष्णका सौन्दर्य कैसा है ? सायंकालमें गोचारणसे लौटते हुए उनके शरीरपर लाखों गायोंके खुरोंसे उड़ी धूल पड़ी है, परन्तु धूल-धूसरित श्रीकृष्णका सौन्दर्य और भी वर्द्धित हो रहा है। पाठशालासे लौटकर आ रहे महाप्रभुजीके गालोंपर स्याही लगी है और वे परम सुन्दर अथवा सुन्दरसे भी सुन्दर बन गये। यदि श्रीकृष्ण निवस्त्र चल रहे हों, तो भी बड़े सुन्दर लगते हैं। यशोदा माता श्रीकृष्णका शृङ्गार करना चाहती हैं, उनकी आँखोंमें काजल लगाना चाहती हैं, उनकी कमरमें सोनेकी करधनी लगाना चाहती हैं। श्रीकृष्ण मचलकर भागे और यशोदाजी पीछे-पीछे दौड़ीं। वे उनको कोई भी अलङ्कार धारण नहीं करा सकीं। श्रीकृष्ण भागते जा रहे हैं और उनको देखकर ऋषि-महर्षि लोग और गोपियाँ एक दम मुग्ध हो गये। ऐसा किसीका रूप नहीं है। बिना अलङ्कारके वे ऐसे सुन्दर लगते हैं। उनके द्वारा अलङ्कार धारण करनेपर अलङ्कारोंकी शोभा होती है। श्रीमद्भागवत (3/2/12) में उद्धव-वचन 'परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्' अर्थात् “वह श्रीमूर्त्ति समस्त लौकिक दृश्योंमें भी परम अलौकिक तथा समस्त भूषणोंकी भी भूषणस्वरूप थी।” अहो! गोपियोंने ऐसा कौन सा तप किया? 'गोप्यस्तपः किमचरन्'- मथुरा रमणियाँ विचार रही हैं,-“ओह! क्या किसी भी प्रकारके तपसे ऐसी रूप-माधुरीका पान किया जा सकता है?” किन्तु किसी भी तपस्याके द्वारा श्रीकृष्णकी ऐसी । 313