श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1760, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 21/1112-116 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला रूप-माधुरीका पूर्ण रूपसे आस्वादन नहीं किया जा अमृतप्रवाह भाष्य—नित्य तरुणतारूप महासमुद्रकी सकता। सौभरि ऋषिने भी बड़ी कठोर तपस्या की थी, तरङ्गकी भाँति लावण्यका सार श्रीकृष्णके शरीरमें किन्तु उन्हें श्रीकृष्णके परम मधुर रूपके दर्शन नहीं लक्षित होता है। उसमें भावोंका उदय आवर्त्त अर्थात् हुए। हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, रावण, कुम्भकर्ण आदिने भँवर है और वंशीध्वनि बवण्डर है; ऐसी अवस्थामें भी बड़ी कठोर तपस्या की थी, किन्तु उस तपस्यासे स्त्रियोंका चित्त तिनकोंकी भाँति उसमें फंसकर उसके उन्हें श्रीकृष्णके दर्शन नहीं प्राप्त हुए। यहाँ तक कि चक्रसे निकल नहीं पाता ॥113॥ लक्ष्मीजीने भी कठोर तपस्या की, परन्तु उन्हें भी अनुभाष्य—‘चक्रवात’—गोलाकार चक्र जैसी घूमती श्रीकृष्णके असमोर्ध्व लावण्यसार रूप मुखामृत पान हुई वायु (बवण्डर) ॥113॥ करनेका सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ। इसलिये तपके द्वारा श्रीकृष्णरूपके अमृतपानसे गोपियाँ कृतकृतार्थ :- तो यह असम्भव है? यदि तप नहीं किया तो क्या सखि हे, कोन् तप कैल गोपीगण। किया? क्या गङ्गाजल या तीर्थोंके स्नानसे श्रीकृष्णकी कृष्णरूप-सुमाधुरी, पिबि’ पिबि’ नेत्र भरि’, ऐसी दुर्लभ और अनुपम रूप-राशिका पान किया जा श्लाघ्य करे जन्म-तनु-मन ॥114॥ध्रु॥ सकता है? यह कभी भी सम्भव नहीं है? अनुवाद—हे सखि, गोपियोंने कौन सी तपस्या की इसलिये श्रीचैतन्य महाप्रभुने कहा है कि गोपियोंके है जिसके फलस्वरूप वे श्रीकृष्णके रूपकी सुमाधुरीको आनुगत्यमें भजन किये बिना किसी भी तपस्या, नेत्रोंके द्वारा छक-छककर पान करके अपने जन्म, भजनके द्वारा यह सम्भव नहीं है। श्रुतियाँ जब इस तन और मनको सफल बनाती हैं॥114॥ बातसे अवगत हुईं, तब उन्होंने गोपियोंके आनुगत्यमें श्रीकृष्णरूप-माधुर्य-असमोर्ध्व, भजन करके अपने मनोभीष्टको प्राप्त किया। श्रीनारायणमें भी उसका अभाव :- माथुर रमणियाँ कह रही हैं कि यह गोपियोंका परम ये माधुरीर ऊर्द्ध आन, नाहि यार समान, सौभाग्य है कि वे श्रीकृष्णके ऐसे असमोर्ध्व परम परव्योमे स्वरूपेर गणे। मनोहर रूपका दर्शन करती हैं। और हम कैसी अभागी यिँहो सर्व-अवतारी, परव्योम-अधिकारी, है कि हम यहाँ श्रीकृष्णका जो रूप देख रही हैं वह ए माधुर्य नाहि नारायणे ॥115॥ किशोरस्वरूप रहनेपर भी क्रोधमें आविष्ट है और यह अनुवाद—जिस माधुरीसे श्रेष्ठ और जिस माधुरीके असुर उनको मारनेके लिये तत्पर है। इसलिये हम समान परव्योमके अन्यान्य भगवद्-स्वरूपोंका तो कहना परम दुर्भागिनी हैं।—"श्रील भक्तिवेदान्त नारायण गोस्वामी ही क्या, जो उन सबके अवतारी तथा परव्योमके महाराज" ॥112॥ अधिपति श्रीनारायण हैं—यह माधुरी उनमें भी नहीं श्रीकृष्णके तारुण्यामृत-सिन्धुकी लावण्यामृत-तरङ्गोंमें है॥115॥ गोपियोंका नित्य अवगाहन करना :- प्रमाण,—नारायणी लक्ष्मीमें भी श्रीकृष्णके तारुण्यामृत—पारापार, तरङ्ग—लावण्यसार, माधुर्यके प्रति लोभ :- ताते से आवर्त्त भावोद्गम। ताते साक्षी सेइ रमा, नारायणेर प्रियतमा, वंशीध्वनि—चक्रवात, नारीर मन—तृणपात, पतिव्रतागणेर उपास्या। ताहा डुबाय, ना हय उद्गम ॥113॥ तिँहो ये माधुर्यलोभे, छाड़ि’ सब कामभोगे, अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥113॥ व्रत करि’ करिला तपस्या ॥116॥ 314 ।