भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1761

इक्कीसवाँ अध्याय 21/116-121 ] अनुवाद-पतिव्रता स्त्रियोंकी उपास्य और श्रीनारायणकी अत्यन्त प्रियतमा लक्ष्मी ही इस विषयमें साक्षी हैं। उन लक्ष्मीने श्रीकृष्णके इसी माधुर्यके लोभसे सब प्रकारके काम-भोगोंको छोड़कर व्रत धारण करके तपस्या की थी॥ 116॥ अन्यान्य प्रकाश-विग्रहोंमें स्वेच्छाके अनुरूप प्रयोजनके अनुसार अपने स्वतःसिद्ध माधुर्यके अंशका प्रकाश :- सेइ त' माधुर्य-सार, अन्य-सिद्धि नाहि तार, तिँहो-माधुर्यादि-गुणखनि। आर सब प्रकाशे, ताँर दत्त गुण भासे, याँहा यत प्रकाशे कार्य जानि ॥ 117 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 117 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वह श्रीकृष्णमाधुर्य अनन्यसिद्ध अर्थात् स्वयं सिद्ध है, वह और किसी गुणके द्वारा सिद्ध नहीं होता। वह श्रीकृष्णमूर्ति अपने अन्य-अन्य प्रकाशमें अर्थात् श्रीनारायणादि मूर्तियोंमें अपने प्रकाशके द्वारा जो-जो कार्य होगा, उसके अनुरूप ऐश्वर्य-वीर्य आदि गुण प्रकट कराती है ॥ 117 ॥ श्रीकृष्णमाधुर्य और गोपीप्रेम, दोनों ही नित्य-नवनवायमान :- गोपीभाव-दरपण, नव नव क्षणे क्षण, तार आगे कृष्णेर माधुर्य। दोंहे करे हुड़ाहूड़ि, बाड़े मुख नाहि मुड़ि, नव नव दोंहार प्राचुर्य ॥ 118 ॥ अनुवाद-गोपियोंका भाव उस दर्पणके समान है, जिसके आगे श्रीकृष्णका माधुर्य क्षण-क्षणमें नव-नवायमान रूप धारण करता है। गोपियोंके भाव और श्रीकृष्णके माधुर्य-दोनोंमें होड़ सी लग जाती है, दोनों ही बढ़ते जाते हैं, कोई भी हार नहीं मानता, बल्कि दोनों ही नव-नवायमान होकर बढ़ते ही जाते हैं ॥ 118 ॥ रागानुगा भक्तिके बिना श्रीकृष्णमाधुर्य सुदुर्लभ :- कर्म, तप, योग, ज्ञान, विधि-भक्ति, जप, ध्यान, इँहा हैते माधुर्य दुर्लभ। केवल ये रागमार्गे, भजे कृष्णे अनुरागे, तारे कृष्ण-माधुर्य सुलभ ॥ 119 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 119 ॥ अनुभाष्य-कर्म, तप, योग, ज्ञान, वैधीभक्ति, जप, ध्यानादि साधनोंके द्वारा माधुर्यकी प्राप्ति नहीं होती; श्रीकृष्ण-माधुर्य केवलमात्र रागमार्गसे श्रीकृष्ण-नाम भजनमें अनुरागयुक्त व्यक्तिके लिये ही सुलभ है॥ 119 ॥ स्वयं-भगवान् व्रजेन्द्रनन्दनसे ही अन्यान्य भगवत्ता :- सेइरूप व्रजाश्रय, ऐश्वर्य-माधुर्यमय, दिव्यगुणगण-रत्नालय। आनेर वैभव-सत्ता, कृष्णदत्त भगवत्ता, कृष्ण-सर्व-अंशी, सर्वाश्रय ॥ 120 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णका सर्वाकर्षक रूप केवल व्रजमें ही विद्यमान है। वह रूप ऐश्वर्य-माधुर्यमय और दिव्य गुणरूपी रत्नोंका भण्डार है। अन्यान्य भगवदावतारोंकी वैभव-सत्ता और भगवत्ता श्रीकृष्णके द्वारा ही प्रदत्त है। श्रीकृष्ण सबके अंशी और सबके आश्रय हैं॥ 120 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनारायणादिकी जो वैभवसत्ता है, उसे श्रीकृष्णके द्वारा प्रदत्त भगवत्ता ही जानना होगा ॥ 120 ॥ श्रीकृष्ण-समस्त चिन्मय सद्गुणोंके समाश्रय :- श्री, लज्जा, दया, कीर्त्ति, धैर्य, वैशारदी मति, एइ सब कृष्णे प्रतिष्ठित। सुशील, मृदु, वदान्य, कृष्ण बिना नाहि अन्य, कृष्ण करे जगतेर हित ॥ 121 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 121 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीनारायणमें श्री, लज्जा, दया, कीर्ति, धैर्य, वैशारदी (निपुण) मतिरूपी जो सब । 315