श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1762, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 21/121-124 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [बायाँ स्तम्भ] उज्ज्वल गुण समूह दिखलायी देते हैं, वे सब श्रीकृष्णके द्वारा उनमें प्रतिष्ठित हुए हैं। किन्तु सुशीलता, मृदुता और वदान्यता—श्रीकृष्णके अतिरिक्त और किसी भी प्रकाशमें दिखलायी नहीं पड़ती। [श्रीकृष्ण ही जगत्का हित करते हैं।]॥ 121 ॥ श्रीकृष्णके रूप-माधुर्यका पान करनेके लिये पलकरहित चक्षुओंकी आकाङ्क्षा :— कृष्ण देखि' यत जन, कैल निमिषे निन्दन, व्रजे विधि निन्दे गोपीगण॥” सेइ सब श्लोक पड़ि', महाप्रभु अर्थ करि', सुखे माधुर्य करे आस्वादन॥ 122 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके रूप माधुर्यको देखकर अनेक लोगोंने अपनी पलकोंके झपकनेकी निन्दा की है। ब्रजमें गोपियोंने तो पलकोंको बनानेवाले विधाता (ब्रह्मा)की भी निन्दा की है।” महाप्रभु श्रीमद्भागवतके ऐसे और भी श्लोकोंको पढ़कर और उनके अर्थोंको प्रकाशित करके आनन्दपूर्वक श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन करने लगे॥ 122 ॥ अनुभाष्य—'निमिषे निन्दन'—नेत्रको ढकनेवाले अङ्गको 'पलक' कहते हैं, नेत्रके ऊपर लगी होनेके कारण वह देखनेमें बाधा देती है, इसलिये वह निन्दनीय है॥ 122 ॥ श्रीकृष्णके मुखकमलका मधुपान करनेसे जड़सुलभ तृप्ति नहीं; प्रतिक्षण गोपियोंके आनन्दरूपी समुद्रकी वृद्धि :— श्रीमद्भागवत (9/24/65)में— “यस्याननं मकरकुण्डलचारुकर्ण- भ्राजत्कपोलसुभगं सविलासहासम्। नित्योत्सवं न ततृपुर्दृशिभिः पिबन्त्यो नार्यो नराश्च मुदिताः कुपिता निमेेश्च॥ 123 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 123 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनके मुखचन्द्र, मकरकुण्डलसे सुशोभित कर्ण (कान), शोभायमान कपोल (गाल), [दायाँ स्तम्भ] सौन्दर्य, विलासपूर्ण मुस्कराहट—इन समस्त नित्य उत्सवोंको नेत्रोंके द्वारा पान करके नर-नारी परम आनन्दित होते हैं और दर्शनमें बाधा देनेवाली नेत्रोंकी पलकोंके प्रति क्रोधित होते हैं॥ 123 ॥ अनुभाष्य—श्रील शुकदेव महाराज परीक्षितको यदुवंशका वर्णन करते-करते श्रीकृष्णके अवतारोंके उद्देश्य और उनके सर्वलोक-मनोहर अतुल सुन्दर रूप-माधुर्यका वर्णन कर रहे हैं— यस्य (कृष्णस्य) मकरकुण्डलचारुकर्णभ्राजत्कपोलसुभगं (मकरकुण्डलाभ्यां चारू शोभितौ कर्णौ ताभ्यां भ्राजन्तौ समुज्ज्वलौ यौ कपोलौ गण्डदेशौ, ताभ्यां सुभगं कमनीयं) सविलासहासं (सविलासः सलीलः हासः यस्मिन् तत्) नित्योत्सवं (नित्यम् उत्सवः आनन्दः यस्मिन् तत्) आननं (मुखपद्मं) नार्यः नराः दृशिभिः (नेत्रैः) पिबन्त्यः [अपि] न तु ततृपुः (तृप्ताः) [निमेषोन्मेषमात्रव्यवधानमप्यसहमानास्तत्कर्तुः] निमेः (विधातुः) कुपिताः (क्रुधाः च बभूवुः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। पलक झपकनेके समय दर्शनमें जो बाधा होती है, वह उनके लिये असहनीय होती है॥ 123 ॥ श्रीमद्भागवत (10/31/15)में :— अटति यद्भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्। कुटिलकुन्तलं श्रीमुखञ्च ते जड़ उदीक्षतां पक्ष्मकृद्दृशाम्॥ 124 ॥ अनुवाद—गोपियाँ बोलीं,—“हे कृष्ण! दिनके समयमें जब तुम वनमें चले जाते हो, तब तुम्हारे घुँघराले केशोंसे सुशोभित श्रीमुखको न देखकर हमारा एक-एक त्रुटिकाल भी युगके समान प्रतीत होता है। तुम्हारे मुखारविन्दका दर्शन करानेवाले हमारे नेत्रोंपर जिस विधाताने पलकोंकी सृष्टि की है, उसे हम मूर्ख मानती हैं॥” 124 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 4/153 संख्या देखें॥ 124 ॥ 316 |