श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1740, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 21/15-18 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ख इव रजांसि वान्ति वयसा सह यच्छ्रुतय- स्त्वयि हि फलन्त्यतन्निरसनेन भवन्निधनाः ॥ 15 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 15 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-आप—अनन्त हैं, इसलिये वे देवता भी आपका अन्त नहीं पा पाये। आप स्वयं भी अपने गुणोंका अन्त नहीं पाते। आकाशमें परमाणुओंकी भाँति आवरणसहित सभी ब्रह्माण्ड कालके साथ घूम रहे हैं। इस कारण हम श्रुतियाँ आपका अनुसन्धान करते हुए जिसे भी लक्ष्य करती हैं, वे आप नहीं हैं-ऐसा करते-करते [अन्तमें] सब कुछ ही आपमें पर्यवसित (समाप्त) होता है; इस प्रकार स्थिर करके आप ही सभीके आधार हैं,- ऐसा सिद्धान्त करती हैं॥ 15 ॥ अनुभाष्य-जनलोकमें ब्रह्मसत्रयज्ञमें श्रवणके इच्छुक ऋषियोंसे चतुःसनमेंसे एक ब्रह्मर्षि सनन्दनने श्रुतियोंके द्वारा की गयी इस भगवद्-स्तुतिका गान किया था, उसीका पुनः आदि ऋषि श्रीनारायणने देवर्षि नारदसे बादमें वर्णन किया था- हे भगवन्, द्युपतयः (स्वर्गाधिपाः लोकपतयः ब्रह्मादयः) एव (अपि) ते (तव) अनन्ततया (अन्ताभावेन) अन्तं (गुणसीमा) न ययुः (प्रापुः-यत् अन्तवद्वस्तु, तत् किमपि त्वं न भवसीत्यर्थः); [आस्तां द्युपतयः,] यद् (यस्मात्) त्वमपि [स्वयम् आत्मनः अन्तम् अनन्ततया न यासि]; ननु (अहो) यद् (यस्य तव) अन्तरा (मध्ये) सावरणाः (उत्तरोत्तरं दशगुणसप्तावरणसमन्विताः) अण्डनिचयाः (ब्रह्माण्ड-गणाः) वयसा (कालचक्रेण) खे (आकाशे) रजांसि इव सह [एकदैव न तु पर्यायेण] वान्ति (परिभ्रमन्ति); यद् (यस्मात्) श्रुतयः अतन्निरसनेन (निरन्तरं जड़निषेधेन) भवन्निधनाः (भवति त्वयि निधनं समाप्तिः यासां ताः सत्यः) त्वयि (चिद्विलास-विशेषमये) हि फलन्ति (पर्यवसन्ति)। श्लोक-भावानुवाद-हे भगवन्! स्वर्गादिके लोकपाल ब्रह्मादि भी आपके गुणोंका अन्त नहीं पाते, और स्वयं अनन्त होनेपर आप भी अपना अन्त नहीं पा पाते। अहो! आकाशमें धूलिके कण जिस प्रकार घूमते रहते हैं, उसी प्रकार आपमें भी (आपके रोमकूपोंमें) आवरणसहित (उत्तरोत्तर दस गुणा बड़े सात आवरणयुक्त) ब्रह्माण्डसमूह कालचक्रके द्वारा परिभ्रमण कर रहे हैं। इसलिये श्रुतियाँ आपके अतिरिक्त अन्यान्य सभी वस्तुओंको निषेध करते-करते अन्तमें आपके विशेष चिद्-विलास विग्रहमें ही पर्यवसित होती हैं॥ 15 ॥ व्रजमें श्रीकृष्णकी अद्भुत गोचारण-लीलाका वर्णन :- सेह रहु-व्रजे यबे कृष्ण-अवतार। ताँर चरित्र विचारिते मन ना पाय पार॥ 16 ॥ अनुवाद-वैकुण्ठादिमें श्रीकृष्णके ऐश्वर्य और उनके अनन्त गुणोंकी बात तो एक ओर रहे, व्रजमें जब श्रीकृष्णने अवतार लेकर ब्रह्म-विमोहनादि जो अद्भुत लीलाएँ कीं, उनका विचार करके मन और बुद्धिसे उन सबका पार नहीं पाया जा सकता॥ 16 ॥ बछड़ोंको चुरानेके कारण अपने चिद्विलासको प्रकट करके ब्रह्माके अहङ्कारका नाश :- प्राकृताप्राकृत सृष्टि कैला एकक्षणे। अशेष वैकुण्ठाण्ड स्व-स्व-नाथ-सने ॥ 17 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 17 ॥ अनुभाष्य-एक क्षणमें ही श्रीकृष्णने परव्योमनाथके साथ असंख्य अप्राकृत वैकुण्ठ लोकोंकी और अनेक ब्रह्मादिके साथ असंख्य प्राकृत ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि की ॥ 17 ॥ उस लीलाकी परम-चमत्कारिता :- एमत अन्यत्र नाहि शुनिये अद्भुत। याहार श्रवणे चित्त हय अवधूत ॥ 18 ॥ अनुवाद-ऐसी अद्भुत लीलाके विषयमें अन्यत्र कहीं भी नहीं सुना जाता, जिसे सुनने मात्रसे चित्त अभिभूत और शुद्ध हो जाता है॥ 18 ॥ अनुभाष्य-'अवधूत'-कम्पित, आन्दोलित, उद्वेलित, अभिभूत, पराहत। पाठान्तरमें, "याँहार श्रवणे चित्त-मल हय धूत।” अर्थात् जिसके श्रवणमात्रसे चित्तका मल धुल जाता है॥ 18 ॥ 294