भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1741

इक्कीसवाँ अध्याय 21/19-26 ] श्रीकृष्णके द्वारा असंख्य गैयाओं और बछड़ोंको प्रकट करना :- “कृष्णवत्सैरसंख्यातैः”-शुकदेव-वाणी। कृष्ण-सङ्गे कत गोप संख्या नाहि जानि ॥ 19 ॥ अनुवाद-शुकदेव गोस्वामीने कहा है कि गोचारणमें जाते हुए श्रीकृष्णके साथ असंख्य बछड़े थे और उनके साथ कितने गोपबालक थे, उनकी भी गणना नहीं हो सकती अर्थात् वे भी असंख्य थे॥ 19 ॥ अनुभाष्य- “कृष्णवत्सैरसंख्यातैः”-भाः 10/12/3 श्लोकका प्रथम चरण॥ 19 ॥ एक एक गोप करे ये वत्स चारण। कोटि, अर्बुद, शङ्ख, पद्म, ताहार गणन ॥ 20 ॥ अनुवाद-एक-एक गोपबालक जितने बछड़ोंको चराते थे, उनकी संख्या भी करोड़, अरब, शङ्ख, पद्म आदि थी॥ 20 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णावतारमें ब्रह्माके द्वारा श्रीकृष्णकी महिमाकी परीक्षा करनेके लिये बछड़ों और गोपबालकोंको चुरानेपर श्रीकृष्णने अपनी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे प्राकृत एवं अप्राकृत वस्तुएँ, सभीको प्रकट किया था। उन्होंने चिन्मय गैयाओं, गोपबालकों और सम्पूर्ण वैकुण्ठतत्त्वको प्रकट करके अप्राकृत सृष्टिकी। अपने अपने ब्रह्माके साथ अनन्त ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करके प्राकृत सृष्टि की। इस अद्भुत कथाका श्रवण करनेसे चित्तका मल धुल जाता है। 'असंख्य कृष्णवत्स' इस शब्दके द्वारा श्रीकृष्णके साथ रहनेवाले सभी बछड़े एवं सभी गोपबालक असंख्य रूपमें प्रकट हुए॥ 17-20 ॥ अनुभाष्य- एकं दशं शतञ्चैव सहस्रमयुतं तथा। लक्षञ्च नियुतं चैव कोटिरर्बुदमेव च॥ वृन्दः खर्वो निखर्वश्च शङ्खपद्मौ च सागरः। अन्त्यं मध्यं परार्द्धञ्च दशवृद्ध्या यथाक्रमम्॥ [अर्थात् “दस-दस गुणा वृद्धिके द्वारा क्रमशः एक, दस, सौ, हजार, अयुत (दस-हजार), लाख, नियुत (दस लाख), करोड़, अर्बुद, वृन्द, खर्व, निखर्व, शङ्ख, पद्म, सागर, अन्त्य, मध्य और परार्द्ध संख्याकी गणना होती है।"] ॥ 20 ॥ वेत्र, वेणु, दल, शृङ्ग, वस्त्र, अलङ्कार। गोपगणेर यत, तार नाहि लेखा-पार ॥ 21 ॥ अनुवाद-गोप बालकोंके बेंत, वेणु, कमल-पुष्प, सींगा, वस्त्र और अलङ्कार आदि भी असंख्य थे॥ 21 ॥ श्रीकृष्णके द्वारा प्रकटित असंख्य वैकुण्ठनाथ और ब्रह्माण्डपतियोंके द्वारा श्रीकृष्ण-स्तुति :- सबे हैला चतुर्भुज वैकुण्ठेर पति। पृथक् पृथक् ब्रह्माण्डेर ब्रह्मा करे स्तुति ॥ 22 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णसे प्रकटित गोपबालक और बछड़े, सभी चतुर्भुज वैकुण्ठपति बन गये। अलग-अलग ब्रह्माण्डोंके ब्रह्मा श्रीकृष्णके साथ उन सब वैकुण्ठपतियोंकी स्तुति करने लगे ॥ 22 ॥ श्रीकृष्णसे लीलाका प्रकाश, श्रीकृष्णमें ही सङ्गोपन :- एक कृष्णदेह हैते सबार प्रकाशे। क्षणेके सबाइ सेइ शरीरे प्रवेशे ॥ 23 ॥ अनुवाद-वे सभी एक ही श्रीकृष्णकी देहसे प्रकाशित हुए और क्षणमात्रमें ही वे सभी उनके शरीरमें प्रवेश कर गये ॥ 23 ॥ ब्रह्माका विस्मय और मूर्च्छा, मूर्च्छाके बाद श्रीकृष्णकी कृपासे श्रीकृष्णके ऐश्वर्यसे अवगत होना :- इहा देखि' ब्रह्मा हैला मोहित, विस्मित। स्तुति करि' सेइ पाछे करिला निश्चित ॥ 24 ॥ अधोक्षज श्रीकृष्णवैभव-निर्णयमें अपनी अक्षमता-ज्ञापन :- “ये कहे, - 'कृष्णेर वैभव मुञि सब जानौं' । से जानुक, - काय्मने मुञि एइ मानौं ॥ 25 ॥ एइ ये तोमार अनन्त वैभवामृतसिन्धु। मोर वाङ्मानसेर गम्य नहे एक बिन्दु ॥ 26 ॥ । 295