श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1738, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 21/5-11 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भगवान्के समान षडैश्वर्योंसे परिपूर्ण हैं। परव्योमके एक प्रान्तमें ही असंख्य वैकुण्ठलोक स्थित हैं, इसलिये उस परव्योमके परिमाणको कौन माप सकता है? ॥ 5-6 ॥ गोलोक ही सहस्रदल-कमलके समान परव्योमकी कर्णिका :- अनन्त-वैकुण्ठ-परव्योम यार दलश्रेणी। सर्वोपरि कृष्णलोके 'कर्णिकार' गणि ॥ 7 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 7 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चिन्मय-जगत् एक कमलके स्वरूपका है; उस कमलके ऊपरी (बीचवाले) भाग 'कर्णिका' रूपी श्रीकृष्णलोकके चारों ओर पंखुड़ियोंके रूपमें अनन्त वैकुण्ठ परव्योममें विराजमान हैं ॥ 7 ॥ विष्णु और विष्णुधाम, दोनों ही अधोक्षज होनेके कारण ब्रह्मादिके लिये भी अगोचर :- एइमत षड़ैश्वर्य, स्थान, अवतार। ब्रह्मा, शिव अन्त ना पाय-जीव कोन् छार ॥ 8 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 8 ॥ अनुभाष्य-वैकुण्ठके षडैश्वर्यपूर्ण स्थान और षडैश्वर्ययुक्त अवतारोंकी सीमा मायिक राज्यके ईश्वर ब्रह्मा अथवा शिव आदिके भी गोचर नहीं हो सकती, माया वशीभूत जीवोंकी तो बात ही क्या है ॥ 8 ॥ अप्राकृत अतीन्द्रिय अधोक्षज विष्णु- मनोधर्मवालोंके लिये दुर्ज्ञेय :- श्रीमद्भागवत (10/14/21)- को वेत्ति भूमन् भगवन् परात्मन् योगेश्वरोतीर्भवतस्त्रिलोक्याम्। क्व वा कथं वा कति वा कदेति विस्तारयन् क्रीड़सि योगमायाम् ॥ 9 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 9 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे भूमन्, हे भगवन्, हे परात्मन्, हे योगेश्वर, इस त्रिभुवनमें आपकी लीला कहाँ, किस रूपमें, योगमायाका विस्तार करके आप कब क्रीड़ा करते हैं, यह कौन जान सकता है? ॥ 9 ॥ अनुभाष्य-गैयाओं और बछड़ोंके हरणके फलस्वरूप ब्रह्माका अभिमान श्रीकृष्णके द्वारा चूर्ण होनेपर ब्रह्मा श्रीकृष्णको परमेश्वर जानकर निम्नलिखित दो श्लोकोंके द्वारा उनका स्तव कर रहे हैं- हे भूमन् (विराट्), भगवन्, परात्मन्, योगेश्वर भवतः उतीः (लीलाः) क्व वा, कथं वा, कदा वा, कति वा, योगमायां विस्तारयन् क्रीड़सि, इति त्रिलोक्यां कः वेत्ति? [न कोऽपि जानात्यतोऽचिन्त्यं तव योगमायावैभवमिति भावः] । श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। [आपकी योगमायाके अचिन्त्य वैभवको कोई नहीं जान सकता-यह भाव है] ॥ 9 ॥ एइमत कृष्णेर दिव्य सद्गुण अनन्त। ब्रह्मा-शिव-सनकादि ना पाय याँर अन्त ॥ 10 ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीकृष्णके अनन्त दिव्य सद्गुण हैं, ब्रह्मा-शिव-सनकादि भी उनका पार नहीं पा सकते ॥ 10 ॥ विश्वके सबसे अधिक सूक्ष्म गणना करनेवाले भी विष्णुके गुणोंका परिमाण करनेमें असमर्थ :- श्रीमद्भागवत (10/14/7)- गुणात्मनस्तेऽपि गुणान् विमातुं हितावतीर्णस्य क ईशिरेऽस्य। कालेन येर्वा विमिताः सुकल्पै- र्भू-पांशवः खे मिहिका द्युभासः ॥ 11 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 11 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सभी पण्डितोंने भूमिके धूलिकणोंकी, आकाशके हिमकणोंकी और नक्षत्रों आदिके कालकी गणना की है; किन्तु क्या उनमेंसे कोई भी जगत्के हितके लिये अवतीर्ण और अनन्तगुणरूप जो आप हैं, आपके गुणोंकी गणना करनेमें समर्थ होता है? ॥ 11 ॥ 292 ।