भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1737, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1737

इक्कीसवाँ अध्याय कथासार—इस अध्यायमें महाप्रभुने श्रीकृष्णलोक-तत्त्व, परव्योम-तत्त्व, कारणसमुद्र-तत्त्व और मायिक ब्रह्माण्ड-तत्त्व वर्णन करके द्वारकामें ब्रह्माके गर्वका हरण करनेवाली श्रीकृष्णकी एक लीलाका वर्णन किया है। उसके बाद ग्रन्थकारने महाप्रभुके वचन कहकर श्रीकृष्ण-रूपके सौन्दर्य-प्रकाशक कुछेक मधुर पद्य लिखे हैं। यहाँ तक सम्बन्ध-तत्त्व कहा गया है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) ग्रन्थकारके द्वारा श्रीगौरकृष्णके माधुर्य-ऐश्वर्यका वर्णन करते हुए मङ्गलाचरण :- अगत्येकगतिं नत्वा हीनार्थाधिकसाधकम्। श्रीचैतन्यं लिखाम्यस्य माधुर्यैश्वर्य-शीकरम्॥ १॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ १॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गतिहीनकी गति और हीन व्यक्तियोंके प्रति अधिक अर्थ-प्रदाता अथवा उपकार करनेवाले श्रीचैतन्यको प्रणाम करके उनके माधुर्य- ऐश्वर्यके कणका वर्णन कर रहा हूँ॥ १॥ अनुभाष्य— अगत्येकगतिं (गतिहीनानाम् एकावलम्बनं) हीनार्थाधिकसाधकं (हीनानां कृष्णप्रेम-दरिद्राणां ये अर्थाः प्रयोजनानि तेषाम् अधिकं यथा स्यात्तथा साधकं) श्रीचैतन्यं नत्वा (प्रणम्य) अस्य भगवतः (चैतन्यदेवस्य) माधुर्यैश्वर्यशीकरं (माधुर्यं यदैश्वर्यं, माधुर्यम् ऐश्वर्यञ्च वा, तयोः शीकरं कणं) लिखामि। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। हीन व्यक्ति अर्थात् श्रीकृष्णप्रेमरूपी धनहीन दरिद्र॥ १॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ २॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥ २॥ परव्योममें सभी विष्णु-विग्रहोंके अनन्त वैकुण्ठ-धाम :- “सर्वस्वरूपेर धाम—परव्योम-धामे। पृथक् पृथक् वैकुण्ठ, नाहिक गणने॥ ३॥ शत, सहस्र, अयुत, लक्ष, कोटि-योजन। एक एक वैकुण्ठेर विस्तार वर्णन॥ ४॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्णके प्रकाश और विलासादि अनन्त स्वरूपोंका परव्योममें पृथक् पृथक् अपना वैकुण्ठ धाम है, जिनकी गणना नहीं की जा सकती। एक-एक वैकुण्ठका परिमाण सौ, हजार, दस हजार, लाख, करोड़ योजन है [परन्तु प्राकृत जगत्के मापके अनुसार उनके परिमाणको मापा नहीं जा सकता]॥ ३-४॥ अनुभाष्य—वैकुण्ठका परिमाण मायिक ब्रह्माण्डके समान नहीं है। वैकुण्ठ—सैकड़ों, हजारों, दस हजारों, लाखों, करोड़ों अथवा असंख्य योजनवाला है। जिसमें किसी प्रकारके परिमाणसे युक्त कुण्ठाधर्म नहीं है, वही 'वैकुण्ठ' है॥४॥ परव्योममें आधार और विषय-वस्तु, धाम और विग्रह—अभिन्न शुद्धसत्त्वचिद्विलासमय भगवद्-विग्रह :- सब वैकुण्ठ—व्यापक, आनन्द-चिन्मय। पार्षद-षडैश्वर्य-पूर्ण सब हय॥ ५॥ अनन्त वैकुण्ठ एक एक देशे यार। से परव्योमेर केबा गणये विस्तार॥ ६॥ अनुवाद—सभी वैकुण्ठ व्यापक हैं, चिन्मय-आनन्दसे बने हैं। वैकुण्ठवासी भगवान्के परिकर हैं और वे । 291