श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1727, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/353-358 ] प्रकार आपके अवतारोंके विषयमें कुछ ज्ञान होता है॥ 353 ॥ अनुभाष्य-जब श्रीकृष्णने कृपा प्रकाशित करते हुए अर्जुनके युगल वृक्षोंको गिरा दिया, तब कुबेरके दो पुत्र नलकुबेर और मणिग्रीव श्रीकृष्णका स्तव कर रहे हैं- देहिषु (जीवेषु) असङ्गतैः (दुष्प्राप्यैः) अतुल्यातिशयैः (नास्ति तुल्यम् अतिशयम् आधिक्यं येभ्यः तैः) तैः तैः वीर्यैः (विभवैः) शरीरिषु (प्रपञ्चे देहिषु जीवेषु मध्ये) अशरीरिणः (प्राकृतशरीरवर्जितस्य अपि) यस्य (तव) अवताराः ज्ञायन्ते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 353 ॥ स्वरूप और तटस्थ लक्षणकी संज्ञा :- 'स्वरूप'-लक्षण, आर 'तटस्थ-लक्षण'। एइ दुइ लक्षणे 'वस्तु' जाने मुनिगण ॥ 354 ॥ आकृति, प्रकृति, स्वरूप, स्वरूप-लक्षण। कार्यद्वारा ज्ञान,-एइ तटस्थ-लक्षण ॥ 355 ॥ अनुवाद- 'स्वरूप'-लक्षण और 'तटस्थ'-लक्षण-इन दो लक्षणोंके द्वारा मुनिगण 'वस्तु'के विषयमें जानते हैं। आकृति, प्रकृति और स्वरूप-ये स्वरूप लक्षण हैं तथा कार्यके द्वारा जो ज्ञान होता है, उसे तटस्थ-लक्षण कहते हैं ॥ 354-355 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'आकृति'-आकार; 'प्रकृति'- स्वभाव; 'स्वरूप'-मूर्ति; 'स्वरूपलक्षण'-उस विग्रहका व्यवहार; 'तटस्थ लक्षण'-कार्यके द्वारा ज्ञान ॥ 355 ॥ अनुभाष्य-आकृति, प्रकृति और स्वरूप,-ये तीन ही 'स्वरूप' अथवा 'मुख्य' लक्षण हैं। कार्यके द्वारा ज्ञान ही 'तटस्थ' अथवा 'गौण' लक्षण है ॥ 355 ॥ श्रीमद्भागवतमें (1/1/1) श्लोकके मङ्गलाचरणके प्रारम्भमें स्वरूप और तटस्थ लक्षणसे परमेश्वर श्रीकृष्णका निरूपण :- भागवतारम्भे व्यास मङ्गलाचरणे। 'परमेश्वर' निरूपिल एइ दुइ लक्षणे ॥ 356 ॥ अनुवाद- श्रीमद्भागवतके आरम्भमें श्रीव्यासदेवने मङ्गलाचरणमें इन लक्षणोंके आधारपर ही 'परमेश्वर'का निरूपण किया है ॥ 356 ॥ अनुभाष्य-भागवतके 'जन्माद्यस्य' श्लोकमें 'सत्यं' और 'परं' नामक दो शब्द स्वरूप-लक्षण एवं विश्व-सृष्टि-स्थिति-लय, ब्रह्माके हृदयमें वस्तुज्ञान प्रकट करना और अर्थाभिज्ञता आदि तटस्थ लक्षण व्यक्त करके परमेश्वरका निरूपण किया गया है ॥ 356 ॥ श्रीमद्भागवत (1/1/1)में :- जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत् सूरयः। तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ 357 ॥ अनुवाद-इस विश्वका जन्म, स्थिति और लय जिससे होता है, ऐसा कहनेसे जो तत्त्व निश्चित हुआ है, अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा विचार करनेपर जो समस्त अर्थ अथवा कार्यमें एकमात्र परम 'ज्ञ-तत्त्व' अर्थात् 'स्वरूपतत्त्व' कहलाकर स्थिर होते हैं; जो दृश्यमान जगत्में एकमात्र स्वराट् अर्थात् स्वतन्त्र राजा हैं; जिन्होंने आदिकवि ब्रह्माको अन्तर्यामीके रूपमें ब्रह्मतत्त्वकी शिक्षा दी है; जिनके विषयमें समस्त बुद्धिमान पण्डितोंमें बारम्बार मोह उत्पन्न होता है; जिनसे अग्नि, जल और मिट्टी आदि भूतोंका विनिमय अर्थात् पृथक् रूपमें सत्ता है; जिनसे तीन प्रकारकी सृष्टि अर्थात् चिद्-उदयरूप सृष्टि, जीव-प्रकाट्यरूप सृष्टि और मायिक-ब्रह्माण्डरूप सृष्टि-सत्यरूपमें वर्तमान है; स्वरूपशक्तिके द्वारा नित्य-कपट-शून्य परमसत्य-तत्त्वरूप उन श्रीकृष्णका हम ध्यान करते हैं ॥ 357 ॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/266 संख्या देखें ॥ 357 ॥ इस प्रथम श्लोकमें परमेश्वरका (1) स्वरूप लक्षण :- एइ श्लोके 'परं'-शब्दे 'कृष्ण'-निरूपण। 'सत्यं' शब्दे कहे ताँर स्वरूप-लक्षण ॥ 358 ॥ । 281