भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1728, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1728

[ 20/358-366 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—इस श्लोकमें 'परं' शब्दके द्वारा श्रीकृष्णका निरूपण और 'सत्यं' शब्दके द्वारा उनके स्वरूप लक्षणको बतलाया गया है॥358॥ (2) तटस्थ लक्षण :- विश्वसृष्ट्यादि कैल, वेद ब्रह्माके पड़ाइल। अर्थाभिज्ञता, स्वरूपशक्त्ये माया दूर कैल॥359॥ एइसब कार्य—ताँर तटस्थ-लक्षण। अन्य अवतार ऐछे जाने मुनिगण॥360॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण विश्वकी सृष्टि-स्थिति-प्रलयादि करते हैं, उन्होंने ब्रह्माको वेद पढ़ाया, उन्हें पूर्ण प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ज्ञान है तथा उन्होंने स्वरूपशक्तिके प्रभावसे मायाको दूर रखा है—ये सब कार्य उनके तटस्थ लक्षण हैं। मुनिगण इन्हीं स्वरूप और तटस्थ लक्षणोंके द्वारा श्रीकृष्ण और अन्यान्य सभी अवतारोंके विषयमें भी जान लेते हैं॥359-360॥ जाननेवालोंके द्वारा उक्त दो लक्षणोंके द्वारा ही सभी अवतारोंका निर्णय :- अवतारकाले हय जगतेर गोचर। एइ दुइ लक्षणे केह जानेन ईश्वर॥”361॥ अनुवाद—भगवान् जब अवतार लेते हैं तो वे जगत्में जीवोंके दृष्टिगोचर तो होते हैं, परन्तु उपरोक्त स्वरूप और तटस्थ, इन दो लक्षणोंके द्वारा कुछ भक्त ही उन्हें ईश्वरके रूपमें जान पाते हैं॥”361॥ भजनमें चतुर भक्तोंके निकट भगवान्‌का गुप्त स्वभाव व्यक्त :- सनातन कहे,—“याते ईश्वर-लक्षण। पीतवर्ण, कार्य—प्रेमदान-सङ्कीर्त्तन॥362॥ सनातनके द्वारा महाप्रभुकी लीलाकी व्याख्याको श्रवण करनेकी अभिलाषा :- कलिकाले सेइ 'कृष्णावतार' निश्चय। सुदृढ़ करिया कह, याउक संशय॥”363॥ अनुवाद—श्रीसनातनने कहा,—“जिनमें ईश्वरके लक्षण हैं, वे पीतवर्णके हैं और जो श्रीकृष्णनाम सङ्कीर्त्तनके द्वारा जीवोंमें श्रीकृष्णप्रेमका दान करते हैं, कलिकालमें वह श्रीकृष्णकावतार अवश्य ही होगा। आप मुझे निश्चित रूपसे बतलाइये, जिससे मेरे सभी संशय दूर हो जाँय॥”362-363॥ अनुभाष्य—कलिकालमें युगावतारका स्वरूप- लक्षण—पीतवर्ण आकार है, तटस्थ-लक्षण—प्रेमदान और सङ्कीर्त्तनरूपी कार्य है॥362॥ भक्तकी जीत, भगवान्‌की पराजय :- प्रभु कहे,—“चतुरालि छाड़, सनातन। शक्त्यावेशावताररे शुन विवरण॥364॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“हे सनातन, अपनी चतुरायी छोड़ो और अब शक्त्यावेशावतारोंका वर्णन सुनो॥364॥ अनुभाष्य—'चतुरालि'—कौशलसे मनोगत अभिप्रायको स्थापित करना, निपुणता-प्रदर्शित करना, बुद्धिमत्ता प्रकाशित करना॥364॥ श्रीकृष्णके छः प्रकारके विलास और तीन प्रकारके रूपोंमेंसे एक (ग) शक्त्यावेशावतारका वर्णन :- शक्त्यावेशावतार कृष्णेर असंख्य गणन। दिग्दर्शन करि मुख्य मुख्य जन॥365॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके असंख्य शक्त्यावेशावतार हैं, मैं केवल मुख्य-मुख्य शक्त्यावेशावतारोंका वर्णन करके उनका दिग्दर्शन कराऊँगा॥365॥ दो प्रकारके शक्त्यावेश—साक्षात् शक्त्याविष्ट मुख्य- 'अवतार' और शक्त्याभासाविष्ट गौण-'विभूति' संज्ञा :- शक्त्यावेश दुइरूप—'मुख्य', 'गौण' देखि। साक्षात्शक्त्ये 'अवतार', आभासे 'विभूति' लिखि॥366॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥366॥ 282 ।