भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1721

बीसवाँ अध्याय 20/314-319 ] शुद्धसत्त्वरूपी गुणके दर्शनसे उन्हें मायाके गुणोंके अतीत कहना होगा। विष्णु अंश हैं और श्रीकृष्ण उनके अंशी है, इसलिये श्रीकृष्णके जैसे विष्णु स्वरूप-ऐश्वर्यसे पूर्ण हैं—[वेद इस प्रकार वर्णन करते हैं] ॥ 314-315॥ दीपकका दृष्टान्त :- ब्रह्मसंहिता (5/46)में- दीपार्च्चिरेव हि दशान्तरमभ्युपेत्य दीपायते विवृतहेतुसमानधर्मा। यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभाति गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥ 316॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 316॥ अमृतप्रवाह भाष्य-दीपककी किरण जिस प्रकार दूसरे आधारमें पृथक् दीपककी भाँति कार्य करती हैं अर्थात् पहलेवाले दीपककी भाँति समान धर्मसे युक्त होती है, उसी प्रकार जो आदिपुरुष गोविन्द 'विष्णु' होकर प्रकाशित हो रहे हैं, उनका मैं भजन करता हूँ॥ 316॥ अनुभाष्य- [यतः] हि दीपार्च्चिः (प्रदीपशिखा) एव दशान्तरं (महादीपात् क्रमपरम्परया अन्यदीपम्) अभ्युपेत्य विवृतहेतुसमानधर्मा (प्राकट्य-कारण-मूलदीपेन सह समधर्मयुक्तः अर्थात् ज्योतीरूपत्वांशे यथा तेन सह समः) दीपायते (भाति), तादृक् एव यः पुरुषः हि विष्णुतया (गर्भोदशायिनः विलासरूप-क्षीरोदशायित्वेन) च विभाति (दिव्यति) तम् आदिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 316॥ ब्रह्मा और शिव-वश्य-तत्त्व और श्रीकृष्णसे भिन्न-आकृति; विष्णु-ईश-तत्त्व और श्रीकृष्णके समान आकृतिवाले :- ब्रह्मा, शिव-आज्ञाकारी भक्त-अवतार। पालनार्थे विष्णु-कृष्णेर स्वरूप-आकार॥ 317॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें ॥ 317 ॥ अनुभाष्य-पालनशक्तिसे युक्त विष्णु श्रीकृष्णसे भिन्न वस्तु नहीं हैं; वे श्रीकृष्णस्वरूप ही हैं, परन्तु ब्रह्मा अथवा शिव उनके आज्ञाकारी भक्तावतार दास हैं॥ 317॥ श्रीमद्भागवत (2/6/32)में :- सृजामि तन्नियुक्तोऽहं हरो हरति तद्वशः। विश्वं पुरुषरूपेण परिपाति त्रिशक्तिधृक् ॥ 318॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 318॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ब्रह्माने कहा-हरिके द्वारा नियुक्त होनेपर ही मैं सृष्टि करता हूँ, उनकी आज्ञासे ही शिव नाश करते हैं, (अन्तरङ्गा, बहिरङ्गा और तटस्था) तीन शक्तियोंको धारण करनेवाले वे हरि ही पुरुषरूपमें विश्वका पालन करते हैं॥ 318॥ अनुभाष्य-देवर्षि नारदके द्वारा अपने गुरु ब्रह्मासे उनके भी आराध्य सर्वश्रेष्ठ-तत्त्व परमात्मा श्रीहरिके सम्बन्धमें जाननेकी इच्छा करनेपर, ब्रह्मा उनको भगवान्‌के विश्वरूपका वर्णन करनेके बाद अद्वयज्ञान विष्णुके परमेश्वर होनेका वर्णन कर रहे हैं- अहं (ब्रह्मा) तन्नियुक्तः (तेन प्रयोजितः सन् तस्य हरेः अनुज्ञया विश्वं) सृजामि; हरः (शिवः) तद्वशः (तन्नियुक्तः सन् तस्य हरेरनुज्ञया विश्वं) हरति (विनाशयति); त्रिशक्तिधृक् (त्रिशक्तिः त्रिगुण-मायाशक्तिः, अन्तरङ्गा, बहिरङ्गा, तटस्था- शक्तिः वा, तां धरति यः सः ईश्वरः स्वयंम् एव) पुरुषरूपेण (क्षीरोदशायि-विष्णुरूपेण) परिपाति (पालयति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 318॥ (घ) मन्वन्तरावतार वर्णन :- मन्वन्तरावतार एबे, शुन सनातन। असंख्य गणन ताँर, शुनह कारण॥ 319॥ अनुवाद-हे सनातन, अब मन्वन्तरावतारके विवरणको सुनो। वे असंख्य हैं, कोई उनकी गणना नहीं कर सकता। उनके प्रकट होनेके विषयमें सुनो॥ 319॥ अनुभाष्य-'मन्वन्तरावतार'-आदिलीला 2/97 संख्याका । 275