भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1720

[ 20/311-315 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला सम्बन्धित विशेष तत्त्व हैं। अपनी भागवत-सत्तानुभूतिमें शिवकी मायापति अथवा मायाभोक्ता माननेवाली बुद्धिके दूर होनेपर ही उनका हरिजन होनेका गुण प्रकट होता है॥ 311 ॥ व्यावहारिक रूपसे रुद्र सदैव गुणमायासे मिलित :- श्रीमद्भागवत (10/88/3, 5)में- शिवः शक्तियुक्तः शश्वत् त्रिलिङ्गो गुणसंवृतः। वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिधा ॥ 312 ॥ विष्णुका गुण-मायासे अतीत और अधोक्षज होना :- हरिर्हि निर्गुणः साक्षात् पुरुषः प्रकृतेः परः। स सर्वदृगुपद्रष्टा तं भजन्निर्गुणो भवेत् ॥ 313 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 312-313 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-वैकारिक, तैजस और तामस,- इन तीन प्रकारके अहङ्कारोंके द्वारा आच्छादित और सदा मायाशक्तियुक्त तत्त्व ही 'शिव' हैं। 'श्रीहरि'-प्रकृतिसे अतीत साक्षात् निर्गुण पुरुष हैं; वे सभी वस्तुओंको भीतर और बाहरसे देखनेवाले हैं, इसलिये वे सबके साक्षी हैं; उनका भजन करनेसे जीव निर्गुण होता है॥ 312-313 ॥ अनुभाष्य-रुद्र और विष्णुके उपासकोंकी विरुद्ध गतिके विषयमें जिज्ञासा करनेपर परीक्षितके प्रति श्रीशुकदेवकी निम्नलिखित दो उक्तियाँ- शिवः शश्वत् (नित्यं) शक्तियुतः (स्वेच्छा-गृहीतया गुणसाम्यावस्थया मायाशक्त्या समन्वितः) वैकारिकः (सात्त्विकः) तैजसः (राजसः) तामसः च इति अहं (अहङ्कार-तत्त्वं)-त्रिधा (अन्योऽन्योपमर्द्देन तमसबैविध्यात्) त्रिलिङ्गः (गुणत्रयोपाधिविशिष्टः) गुणसंवृतः (प्रकटैश्च सद्भिः तैः गुणैः दूरतः संवृतः तदधिष्ठाता)। हरिः हि (खलु) प्रकृते परः (न तु ब्रह्माशिवादिवत् प्राकृतगुणमिश्रः, अधोक्षजत्वात्) साक्षात् (अनावृतः) निर्गुणः (सङ्कल्पेनैव सत्त्वस्य प्रवर्त्तनात्) पुरुषः (पुरुषोत्तमः); सः (हरिः) सर्वदृक् (सर्वेषां ब्रह्माशिवादीनां दृक् मोक्षहेतुर्ज्ञानं यस्मात् सः, सर्वं पश्यतीति वा, अतः) उपद्रष्टा (सन्निधौ मुक्तान् पश्यति, मुक्तगम्यः, आदिसाक्षी वा अतः) तं (हरिं) भजन् निर्गुणो (स्वरूपस्थः) भवेत्। श्लोक-भावानुवाद-शिव नित्य ही अपनी इच्छासे ग्रहण की गयी गुणसाम्यावस्थावाली मायाशक्तिसे युक्त हैं, वे सात्त्विक, राजस और तामस, इन तीन प्रकारके अहं-तत्त्वोंसे युक्त हैं। यह तमोगुण अन्यान्य गुणोंको दबाते हुए तीन प्रकारका होता है, इस प्रकार शिव त्रिगुण उपाधिसे विशिष्ट हैं और प्रकटरूपमें दिखनेवाले (सद्भिः) इन गुणोंसे दूर रहते हुए उनके अधिष्ठाता हैं (संवृतः)। किन्तु भगवान् श्रीहरि प्रकृतिसे परे हैं (वे शिव-ब्रह्मादिकी भाँति प्राकृत गुणोंसे मिश्रित नहीं होते हैं, क्योंकि वे अधोक्षज हैं)। वे तमोगुणसे आवृत नहीं होनेके कारण साक्षात् हैं तथा सत्त्वगुणका सङ्कल्पमात्रसे प्रवर्तन करनेके कारण निर्गुण भी हैं। वे पुरुषोत्तम (पुरुष) हैं तथा ब्रह्मा-शिवादि सभीको मोक्षरूप ज्ञान देनेके कारण सर्वदृक् हैं अथवा सब कुछ देखनेवाले हैं। अपने निकट मुक्तजनोंके ऊपर भी अनुग्रह करनेके कारण वे मुक्तगम्य अथवा साक्षी हैं, अतः उपद्रष्टा कहलाते हैं। उन हरिका भजन करते हुए साधक (भक्त) निर्गुण (अपने स्वरूपमें स्थित) हो जाता है॥ 312-313 ॥ (3) सत्त्वगुणमें विष्णु गर्भोदशायीके ही विलास, श्रीकृष्णकी कला :- पालनार्थ स्वांश विष्णुरूपे अवतार। सत्त्वगुण दृष्टान्त, ताते गुणमाया-पार ॥ 314 ॥ स्वरूप-ऐश्वर्यपूर्ण, कृष्णसम प्राय। कृष्ण अंशी, तेंहो अंश, वेदे हेन गाय ॥ 315 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 314-315 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-[ब्रह्मा शक्त्यावेश होनेपर भी गुणावतार हैं। रुद्र भेदाभेद होनेपर भी गुणावतार हैं।] किन्तु विष्णु स्वांशरूपमें गुणावतार होनेपर भी उनके 274 |