भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1722

[ 20/319–328 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अमृतप्रवाह भाष्य और आदिलीला 3/7-9 संख्याका अनुभाष्य तथा मध्यलीला 20/167 संख्याका अनुभाष्य देखें ॥ 319 ॥ मन्वन्तरावतारका काल :- ब्रह्मार एकदिने हय चौद्द मन्वन्तर। ए चौद्द अवतार ताँहा करेन ईश्वर ॥ 320 ॥ अनुवाद-ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मन्वन्तर होते हैं अर्थात् क्रमश: चौदह मनुओंका अधिकार काल होता है। इन चौदह मन्वन्तरोंमें भगवान् चौदह अवतार ग्रहण करते हैं ॥ 320 ॥ संख्या-निर्देश :- चौद्द एक दिने, मासे चारिशत बिश। ब्रह्मार वत्सरे पञ्चसहस्र चल्लिश ॥ 321 ॥ शतेक वत्सर हय 'जीवन' ब्रह्मार। पञ्चलक्ष चारिसहस्र मन्वन्तरावतार ॥ 322 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 321-322 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'मन्वन्तरावतार'-ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मन्वन्तर होते हैं और उनमें चौदह अवतार होते हैं। ब्रह्माके एक मासमें चार सौ बीस और एक वर्ष (तीन सौ साठ दिनों)में पाँच हजार चालीस अवतार तथा ब्रह्माके जीवनमें पाँच लाख चालीस हजार मन्वन्तरावतार होते हैं ॥ 321-322 ॥ कारणाब्धिशायीके सांस छोड़नेसे लेकर सांस भीतर लेने तक ही ब्रह्माका जीवन :- अनन्त ब्रह्माण्डे ऐछे करह गणन। महाविष्णु एकश्वासे ब्रह्मार जीवन ॥ 323 ॥ अनुवाद-यह तो मैंने एक ब्रह्माण्डमें मन्वन्तर अवतारोंकी गणना बतलायी, इसी प्रकार अनन्त ब्रह्माण्डोंमें होनेवाले ऐसे अवतारोंकी गणनाकी कल्पना करो। कारणाब्धिशायी महाविष्णुके एक सांस छोड़नेसे सांस ग्रहण करनेके समय तक ही ये ब्रह्मा और ब्रह्माण्ड रहते हैं ॥ 323 ॥ महाविष्णुर्निश्वासेर नाहिक पर्यन्त। एक मन्वन्तरावतारेर देख लेखा अन्त ॥ 324 ॥ अनुवाद-महाविष्णुके निश्वासोंकी कोई सीमा नहीं है। देखो, मन्वन्तरावतारोंके विषयमें बतलाना ही कितना कठिन है ॥ 324 ॥ चौदह मन्वन्तरावतारोंके नाम :- स्वायम्भुवे 'यज्ञ', स्वारोचिषे 'विभु' नाम। उत्तमे 'सत्यसेन', तामसे 'हरि' अभिधान ॥ 325 ॥ रैवते 'वैकुण्ठ', चाक्षुषे 'अजित', वैवस्वते 'वामन'। सावर्ण्ये 'सार्वभौम', दक्षसावर्ण्ये 'ऋषभ' गणन ॥ 326 ॥ ब्रह्मसावर्ण्ये 'विष्वक्सेन', 'धर्मसेतु' धर्मसावर्ण्ये। रुद्रसावर्ण्ये 'सुधामा', 'योगेश्वर' देवसावर्ण्ये ॥ 327 ॥ इन्द्रसावर्ण्ये 'बृहद्भानु' अभिधान। एक चौद्द मन्वन्तरे चौद्द 'अवतार' नाम ॥ 328 ॥ अनुवाद-चौदह मन्वन्तरोंमें चौदह अवतारोंके ये नाम हैं-स्वायम्भुव मन्वन्तरमें 'यज्ञ', स्वरोचिष मन्वन्तरमें 'विभु', उत्तम मन्वन्तरमें 'सत्यसेन', तामस मन्वन्तरमें 'हरि', रैवत मन्वन्तरमें 'वैकुण्ठ', चाक्षुष मन्वन्तरमें 'अजित', वैवस्वत मन्वन्तरमें 'वामन', सावर्ण्य मन्वन्तरमें 'सार्वभौम', दक्षसावर्ण्यमें 'ऋषभ', ब्रह्मसावर्ण्यमें 'विष्वक्सेन', धर्मसावर्ण्यमें 'धर्मसेतु', रुद्रसावर्ण्यमें 'सुधामा', देवसावर्ण्यमें 'योगेश्वर' और इन्द्रसावर्ण्यमें 'बृहद्भानु' ॥ 325-328 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'स्वायम्भुवेमं'-स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें 'यज्ञ'-अवतार, स्वरोचिष-मन्वन्तरमें 'विभु' आदि चौदह मन्वन्तरोंमें चौदह अवतार हैं ॥ 325 ॥ अनुभाष्य-मनुगण-जैसे (1) स्वायम्भुव,-स्वयम्भु ब्रह्माके पुत्र; (2) स्वारोचिष,-स्वरोचिः अथवा अग्निके पुत्र; (3) उत्तम-प्रियव्रतके पुत्र; (4) तामस-उत्तमके 276 ।