श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1764, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 21/125-126 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला नहीं देखा। ऐसा होनेपर क्या इन सब शास्त्रोंको श्रील कविराज गोस्वामी नहीं जानते थे? यह भी सम्भव नहीं है, क्योंकि वे भ्रम-प्रमादादि दोषोंसे सर्वथा रहित हैं, यह सब जानते हैं। पुनः यदि उक्त मन्त्रमें मात्राहीन 'त'-कार (अर्थात् सबसे अन्तमें 'प्रचोदयात्'के 'त्') को अर्द्धाक्षर माना जाय, तो क्या श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने क्रमभङ्ग करके (अर्द्धचन्द्र) लिखा है? क्योंकि उक्त वर्णक्रमानुसार श्रीकृष्णके मुख-कपोल-चरणान्त इस क्रमसे सबसे अन्तमें जो श्रीचरण हैं, उसको परित्याग करके उन्होंने उन्होंने ललाटमें अर्द्धचन्द्र स्थापित किया है। वह जैसे—श्रीचैतन्यचरितामृतमें मध्यलीलामें इक्कीसवें अध्यायमें श्रीसनातन-शिक्षाके प्रसङ्गमें सम्बन्धतत्त्व विचारमें— “सखि हे, कृष्णमुख-द्विजराज-राज। कृष्णवपु-सिंहासने, वसि’ राज्यशासने, करे सङ्गे चन्द्रेर समाज॥ दुइ गण्ड सुचिक्कण, जिनि’ मणि-सुदर्पण, सेइ दुइ पूर्णचन्द्र जानि। ×× सब लोक करे आप्यायित॥” इस रूपमें दो प्रकार अनुवादके द्वारा बहुत विचार करनेपर भी मुझे कोई समाधान नहीं मिला। तब सब उपाय छोड़कर, अन्न-जलादि त्यागकर, मैं मनमें दुःखी होकर देहत्यागके अभिप्रायसे राधाकुण्डके तटपर आ गया। जब मन्त्राक्षर नहीं जानता हूँ, तब मन्त्रदेवता कैसे गोचर होंगे, इसलिये देह-त्याग करना ही कर्त्तव्य है (मैंने यह निश्चय किया)। उसके बाद रात्रिका द्वितीय प्रहर होनेपर तन्द्रा आनेपर मैंने देखा कि श्रीवृषभानुनन्दिनी आकर कह रही हैं,—'हे विश्वनाथ! हे हरिवल्लभ! तुम उठो। श्रीकृष्णदास कविराजने जो कुछ लिखा है, वही सत्य है। वह मेरी नर्मसखी है। मेरे अनुग्रहसे मेरे अन्तःकरणकी सभी भावनाओंको जानते हैं। इसलिये उनके वचनोंमें तनिक भी सन्देह मत करना। काम-गायत्री मेरी और मेरे प्राणवल्लभकी उपासनाका मन्त्र है। हमलोग मन्त्राक्षरके द्वारा भक्तोंके निकट प्रकाशित होते हैं। मेरे अनुग्रहके बिना हम दोनोंको कोई भी जाननेमें समर्थ नहीं है। ‘वर्णागम-भास्वत्’ नामक ग्रन्थमें अर्द्धाक्षरका निरूपण किया गया है, उसे देखकर ही श्रीकृष्णदास कविराजने लिखा है, वह सुनो। उसके बाद तुम इस ग्रन्थको देखकर सबके उपकारके लिये प्रमाण संग्रह करो।” यह सुनकर मैं शीघ्रतासे उठ गया। जाग्रत होकर सन्देह दूर होनेपर “हा राधे!” कहकर बार-बार विलाप करने लगा। फिर उनके आदेशको हृदयमें धारण करके उनकी आज्ञा पालनमें तत्पर हो गया। श्रीमती राधिकाने अर्द्धाक्षर निर्णय करनेके विषयमें जो इङ्गित दिया था— “व्यन्त-यकारोऽर्द्धाक्षरं ललाटेऽर्द्धचन्द्रबिम्बः तदितरं पूर्णाक्षरं पूर्णचन्द्रः।” उसके अनुसार उक्त मन्त्रमें ‘वि’के पूर्व जो ‘य’ है, वही अर्द्धाक्षर है (अर्थात् ‘कामदेवाय’- पदके ‘य’-कारके बाद ‘विद्महे’-पदका ‘वि’-अक्षर है, इसलिये उक्त ‘य’-कार अर्द्धाक्षर है)। वही ललाटमें अर्द्धचन्द्र-स्वरूप है। उसके अतिरिक्त अन्य सभी अक्षर पूर्णाक्षर या पूर्णचन्द्र हैं। ×בवर्णागम-भास्वत्’–का प्रमाण इस प्रकार है— “विकारान्त-यकारेण अर्द्धाक्षरं प्रकीर्त्तितम्॥”125॥ श्रीकृष्णके साढ़े चौबीस अङ्ग-चन्द्रके ऊपर श्रीमुखचन्द्रका राजत्व :— सखि हे, कृष्ण मुख—द्विजराज-राज। कृष्णवपु-सिंहासने, बसि’ राज्य-शासने, करे सङ्गे चन्द्रेर समाज॥ 126॥ ध्रु॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 126॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'द्विजराज-राज'—चन्द्रोंका राजा। [हे सखि,] वह श्रीकृष्णमुखचन्द्र राजा होकर, श्रीकृष्णशरीररूप सिंहासनपर बैठकर, (अङ्ग-प्रत्यङ्गादि) चन्द्रोंका समाज लेकर माधुर्य-राज्यपर शासन कर रहा है। कहाँ कौन सा चन्द्र है, वह बादमें बतलाया जा रहा है॥ 126॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णमुखमण्डल-चन्द्र ही चन्द्रराज है; 318 ।