श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1765, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंइक्कीसवाँ अध्याय 21/126-131 ] (1) मुखचन्द्र, (2) बायाँ कपोलचन्द्र, (3) दायाँ कपोलचन्द्र, (4) चन्दनबिन्दुचन्द्र, (5-14) हाथोंके नखचन्द्र, (15-24) पाँवोंके नखचन्द्र, (24 ½) ललाटका अर्द्धचन्द्र;—इन साढ़े चौबीस चन्द्रोंके समाजको लेकर श्रीकृष्णमुख-चन्द्रराजा श्रीकृष्ण देहरूप सिंहासनपर बैठकर राजत्व कर रहा है ॥ 126 ॥ दुइ गण्ड सुचिक्वण, जिनि' मणि-सुदर्पण, सेइ दुइ पूर्णचन्द्र जानि। ललाटे अष्टमी-इन्दु, ताहाते चन्दन-बिन्दु, सेह एक पूर्णचन्द्र मानि ॥ 127 ॥ करनख-चान्देर ठाट, वंशी-उपर करे नाट, तार गीत मुरलीर तान। पदनख-चन्द्रगण, तले करे नर्त्तन, नूपुरेरे ध्वनि यार गान ॥ 128 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके दो अत्यन्त उज्ज्वल कपोल दो पूर्ण चन्द्र हैं, ये चमकती मणियोंकी शोभाको भी तिरस्कृत कर देनेवाले हैं। उनके ललाटपर अष्टमीका चन्द्र अर्द्धचन्द्र और उसमें चन्दनका बिन्दु एक पूर्णचन्द्र है। श्रीकृष्णके हाथोंके नख एक-एक पूर्ण चन्द्र हैं और उनके हाथोंमें धारण की हुई वंशीके ऊपर वे नृत्य करते हैं, उनका गीत ही मुरलीकी तान है। उनके चरणोंके नख भी पूर्ण चन्द्र हैं और वे पृथ्वीपर नृत्य करते हैं, तब नूपूरकी ध्वनि ही उनका गान है॥ 127-128 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'अष्टमी-इन्दु'—अर्द्धचन्द्र ॥ 127 ॥ अनुभाष्य—'ठाट'—स्थिति; 'नाट'—नाट्य ॥ 128 ॥ विलासमैं मत्त क्षत्रियकी भाँति श्रीकृष्णमुखकमल— गोपियोंके चित्तको बींध देनेवाला :— नाचे मकर-कुण्डल, नेत्र—लीला-कमल, विलासी राजा सतत नाचाय। भ्रू-धनु, नेत्र-बाण, धनुर्गुण-दुई काण, नारीमन-लक्ष्य बिन्धे ताय ॥ 129 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 129 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णमुखचन्द्र विलासी राजा है; वह मुखचन्द्र मकर-कुण्डलों और नेत्रकमलोंको सदा नृत्य कराता है। भौंहे-धनुषके समान हैं, नेत्र उसके बाण हैं; दोनों कान-धनुषकी रस्सीसे बँधे हुए हैं; कानों तक विस्तृत नेत्ररूपी बाणोंके द्वारा श्रीकृष्ण गोपनारियोंके मनरूपी लक्ष्य-वस्तुको बींधते हैं ॥ 129 ॥ महादान्यरूपमें सबको अङ्ग-चन्द्रसमूहसे अमृत-वितरण :— एइ चान्देर बड़ नाट, पसारि' चान्देर हाट, बिनिमूले बिलाय निजामृत। काँहो स्मित-ज्योत्स्नामृते, काँहारे अधरामृते, सब लोक करे आप्यायित ॥ 130 ॥ अनुवाद—अनुभाष्य देखें ॥ 130 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्ण मुखचन्द्रका नाट्य (नृत्य) सभीका ही अतिक्रम करता है और अन्य साढ़े तेईस चन्द्ररूपी बिक्री किये जानेवाले द्रव्योंके द्वारा हाटका विस्तार करके अपने अमृतको बिना मूल्यके वितरण करता है। किसी ग्राहकको मधुर हास्यरूप ज्योत्स्नामृतके द्वारा, किसी ग्राहकको अधरामृतके द्वारा और अन्यान्य सभीको किसी अन्य प्रकारसे प्रसन्न करता है ॥ 130 ॥ कामक्रीड़ामत्त मुखचन्द्र-राजाके मन्त्री और प्रमोदविलास-भवन आदिका वर्णन :— विपुलायतारुण, मदन-मद-घूर्णन, मन्त्री यार ए दुइ नयन। लावण्य-केलि-सदन, जन-नेत्र-रसायन, सुखमय गोविन्द-वदन ॥ 131 ॥ अनुवाद—लालिमायुक्त दो नयन जिनके कोर कानों तक प्राय विस्तृत हैं, उस श्रीकृष्णमुखरूप राजाके मन्त्री हैं और वे मदनके मदको नष्ट करते हैं। गोविन्दका मुखकमल जो आनन्दसे परिपूर्ण है, वह लावण्यकी । 319