भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1766, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1766

[ 21/131-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला लीलाका वासस्थान है और वह सभीके नेत्रोंके लिये रसायन स्वरूप है॥131॥ अमृतप्रवाह भाष्य-अति विस्तृत लालिमायुक्त दो नयन-उन श्रीकृष्णमुखरूप राजाके मन्त्री हैं, वे मदनके मदको नष्ट करते हैं॥131॥ श्रीकृष्णमुखचन्द्रके दर्शनसे गोपियोंकी नवनवायमान, नित्य वर्द्धित होनेवाली, परम-चमत्कारमयी चिन्मयी अतृप्ति, उसके लिये विधिकी निन्दा :- याँर पुण्यपुञ्ज-फले, से मुख दर्शन मिले, दुइ आँखि कि करिबे पाने? द्विगुण बाड़े तृष्णा-लोभ, पिते नारे-मनःक्षोभ, दुःखे करे विधिर निन्दने॥132॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥132॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'दुइ आँखि कि करिबे पाने' -दर्शकके दो नेत्र किस प्रकार उस अमृतसमुद्रका पान कर सकते हैं?॥132॥ अनुभाष्य-भक्तिजनित अनुष्ठानसे ही भक्ति-उन्मुखी 'सुकृति' उत्पन्न होती है। देखनेवाले व्यक्तिके दो नेत्रोंके द्वारा ऐसे श्रीकृष्णमुखका कितना पान करना सम्भव है? उसकी तृष्णा और लोभ दो गुणा वर्द्धित होनेपर भी अभिलषित परिमाणके अनुसार पान नहीं कर पानेपर अपनी अयोग्यता और अभावके कारण उसका मन विशेषरूपसे क्षुब्ध होता है; द्रष्टा तब दुःखी चित्तसे अपने सृष्टिकर्त्ताको दोष देता है॥132॥ विधि-श्रीकृष्णमाधुरी-रससे अनभिज्ञ :- ना दिनेक लक्ष कोटि, सबे दिला आँखि दुटि, ताते दिला निमिष-आच्छादन। विधि-जड़ तपोधन, रसशून्य तार मन, नाहि जाने योग्य सृजन॥133॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥133॥ अनुभाष्य-अतृप्त द्रष्टा तब खेदपूर्वक कहता है,-मेरे लाख-करोड़ नेत्र नहीं है, केवलमात्र दो ही हैं और वे भी पलकोंसे ढके हुए हैं। बीच-बीचमें जब अति अल्प समयके लिये भी पलकें गिरती है, उस समयमें भी पुनः श्रीकृष्ण-दर्शनमें बाधा होती है। इसलिये शरीरका निर्माण-कर्त्ता ब्रह्मा अत्यन्त अज्ञानी है और श्रीकृष्णदर्शनकी सेवाको छोड़कर तुच्छ तपस्यामें रत होनेके कारण बिल्कुल भी 'रसज्ञ' नहीं है, सृष्टि आदि शुष्क कार्योंको ही करनेवाला है-कहाँ किस प्रकारका विधान करना उचित है, इस विषयमें वह सम्पूर्ण रूपसे अनभिज्ञ है॥133॥ विधिको परामर्श और उपदेश-प्रदान :- ये देखिबे कृष्णानन, तार करे द्वि-नयन, विधि हञा हेन अविचार। मोर यदि बोल धरे, कोटी आँखि तार करे, तबे जानि योग्य सृष्टि तार॥134॥ अनुवाद-विधाताने विचारहीन होकर श्रीकृष्णमुखके दर्शनके लिये भी सभीको केवल दो ही नेत्र दिये हैं। आगे अनुभाष्य देखें॥134॥ अनुभाष्य-मेरे परामर्शको स्वीकार करके विधाता यदि श्रीकृष्णमुखके दर्शन करनेवालेको करोड़ों नेत्र प्रदान करे, तभी मैं उसको सृष्टि रचनाके विषयमें योग्य समझूँगा॥134॥ श्रीकृष्णकी अङ्ग-माधुरी, मुख-माधुरी और हास्य-माधुरीमें गोपीभावयुक्त महाप्रभुका लोभ :- कृष्णाङ्ग-माधुर्य-सिन्धु, सुमधुर मुख-इन्दु, अति-मधु स्मित-सुकिरण। ए तिने लागिल मन, लोभे करे आस्वादन, श्लोक पड़े, स्वहस्त-चालन॥135॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥135॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'ए तिने लागिल मन'-श्रीकृष्णके अङ्गोंका माधुर्य मानो समुद्र है, उनका सुमधुर मुख 320 ।